डॉ. मधुसूदन साहा का दोहा–मुक्तक ‘पल भर का मृदु प्यार’ : परंपरा का नवोन्मेष - - अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
डॉ. मधुसूदन साहा का दोहा–मुक्तक ‘पल भर
का मृदु प्यार’ : परंपरा का नवोन्मेष
- अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
डॉ. मधुसूदन साहा (जन्म : 15 जुलाई, 1940; जन्मस्थल : धमसाई, चपरी, गोड्डा, झारखंड) समकालीन हिंदी साहित्य के उन बहुविध रचनाकारों में हैं, जिनकी साहित्यिक यात्रा सात दशकों से अधिक समय में विस्तृत होकर एक विशिष्ट सर्जनात्मक परंपरा का रूप ले चुकी है। ग्रामीण सांस्कृतिक परिवेश से निकलकर उन्होंने हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। माता स्व. रामसखी देवी और पिता स्व. रामेश्वर प्रसाद साहा के संस्कारों से पोषित यह रचनात्मक चेतना जीवन–अनुभव और लोकसंवेदना से निरंतर अनुप्राणित रही है।
उच्च शिक्षा के स्तर पर एम.ए. (हिन्दी) भागलपुर विश्वविद्यालय (बिहार) तथा
पीएच.डी. संबलपुर विश्वविद्यालय (ओडिशा) से अर्जित कर उन्होंने अकादमिक गंभीरता को
अपनी सृजनशीलता के साथ जोड़ा। ‘विद्यासागर’ (डी.लिट्) की उपाधि उनके दीर्घ
साहित्य–साधना की औपचारिक मान्यता है। अध्यापन और राउरकेला इस्पात संयंत्र में
राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने प्रशासनिक दायित्व और
साहित्यिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन साधा—यह संतुलन उनकी रचनाओं की अनुशासित
संरचना में भी परिलक्षित होता है।
रचनात्मक विधाओं की दृष्टि से डॉ. साहा बहुआयामी साहित्यकार हैं। गीत, नवगीत, दोहा, मुक्तक, ग़ज़ल, दोहामुक्तक, कहानी, उपन्यास, आलेख, समीक्षा तथा
ओड़िया से हिंदी अनुवाद—इन सभी क्षेत्रों में उनका लेखन सक्रिय और उल्लेखनीय रहा
है। विशेषतः नवगीत और दोहा–विधा में उनकी पहचान एक सजग साधक और अनुशासित शिल्पकार
की है। ‘महुआ-महावर’ और ‘सपने शैवाल के’ जैसे नवगीत संग्रहों को
प्राप्त सम्मान इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वे केवल विपुल लेखक नहीं, बल्कि गुणवत्तापरक
सर्जक हैं। ‘हर पल हँसती धूप’ (दोहा संग्रह) और ‘मुट्ठी भर मकरंद’
(मुक्तक संग्रह) उनकी सूक्तिपरक अभिव्यक्ति और लयात्मक संयम के उदाहरण हैं।
उनकी रचनाएँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं
और अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में उनका समावेश हुआ है—जो यह दर्शाता है कि वे
समकालीन काव्य–विमर्श का सक्रिय हिस्सा रहे हैं। संपादन–क्षेत्र में भी उन्होंने
गंभीर कार्य किया है—मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला और रामधारी
सिंह ‘दिनकर’ जैसे साहित्य–पुरुषों पर केंद्रित कृतियों का संपादन उनके आलोचनात्मक
विवेक और साहित्य–इतिहास के प्रति सजग दृष्टि का प्रमाण है।
डॉ. साहा को प्राप्त ‘सौहार्द सम्मान’ (उ.प्र. हिंदी संस्थान), ‘विशिष्ट साहित्यिक
सेवा सम्मान’, ‘भारती सेवा भूषण उपाधि’ आदि अनेक सम्मान उनकी
साहित्य–सेवा की सार्वजनिक स्वीकृति हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित
स्वतंत्र पुस्तकें प्रकाशित होना इस बात का संकेत है कि वे केवल सर्जक नहीं, अध्ययन और अनुशीलन
के विषय भी बन चुके हैं।
समालोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. मधुसूदन साहा की रचनात्मकता की सबसे
बड़ी विशेषता उसकी संतुलित संवेदना और अनुशासित शिल्प है। वे परंपरा के प्रति आदर
रखते हुए भी अतीत–निष्ठ नहीं होते; उनकी कविता समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ करती है, किंतु शोर या
अतिशयोक्ति का सहारा नहीं लेती। उनके यहाँ लोक–बोध, नैतिक चेतना और
सामाजिक अवलोकन एक संयमित भाषा में अभिव्यक्त होते हैं।
इस प्रकार डॉ. मधुसूदन साहा हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जिनकी साधना विविध
विधाओं में फैली हुई होने पर भी मूलतः काव्य–चेतना के केंद्र से संचालित है। उनकी
साहित्यिक यात्रा निरंतरता, श्रम और प्रतिबद्धता की यात्रा है—और यही उनकी नवीन
कृति ‘पल भर का मृदु प्यार’ के मूल्यांकन के लिए एक महत्त्वपूर्ण पृष्ठभूमि
प्रदान करती है।
यहाँ यदि डॉ. साहा के ‘अपनी बात’ के सन्दर्भ लिए जाएँ तो आधुनिक दोहा–लेखन में देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के योगदान को
डॉ. साहा पुनरुत्थानकारी मानते हैं; उन्होंने समसामयिक संवेदना को
दोहा–छंद में प्रतिष्ठित कर नई पीढ़ी को प्रेरित किया। दोहाग़ज़ल के
प्रवर्तक ज़हीर कुरैशी से डॉ. साहा का संवाद उनके रचनात्मक विकास की महत्वपूर्ण
कड़ी है। इस साहित्यिक विनिमय ने दोहा और शेर के साम्य–वैषम्य, तथा दोहाग़ज़ल और दोहामुक्तक की संभावनाओं पर गंभीर चिंतन का अवसर प्रदान
किया। कुरैशी के असामयिक अवसान के कारण नियोजित भूमिका संभव न हो सकी, किंतु उनकी प्रेरणा डॉ. साहा के लिए रचनात्मक संबल बनी रही। गीतकार संजीव
गुप्ता ‘तनहा’ के “दोहाग़ज़ल विधान” और “दोहामुक्तक विधान” ने उनके
लेखन को शास्त्रीय आधार प्रदान किया। संग्रह के सभी दोहामुक्तक निर्धारित
मात्रा–विधान, यति, लय और तुकांत के अनुशासन में रचे गए
हैं। यहाँ शिल्प प्रदर्शन का उपकरण नहीं, बल्कि कथ्य को धार देने वाला माध्यम
है। डॉ. साहा का स्पष्ट मत है कि दोहामुक्तक–रचना से पूर्व शुद्ध दोहा–सृजन में
दक्षता अनिवार्य है; अतः वे छंद–शुद्धता, गण–विधान और भाषिक स्पष्टता पर विशेष बल देते हैं। वे मात्रा-गणना और
गण-विन्यास पर भी आवश्यक विमर्श करते हैं, जिससे पाठकों को
केवल मार्गदर्शन ही नहीं, बल्कि विधागत संवेदनशीलता और रुचि भी विकसित होती है।
उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में दोहा–मुक्तक ‘पल भर का मृदु प्यार’ पर विचार करने से पूर्व ‘दोहा’ विधा की ऐतिहासिक, काव्यात्मक और वैचारिक पृष्ठभूमि का संक्षिप्त किंतु सम्यक् अवलोकन आवश्यक है।
हिंदी काव्य–परंपरा में दोहा केवल एक मात्रिक छंद नहीं, बल्कि संक्षिप्त, सघन और सूक्तिपरक
अभिव्यक्ति की दीर्घजीवी परंपरा का प्रतिनिधि रूप है। इसकी जड़ें अपभ्रंश (प्राकृत
भाषाओं के बाद विकसित वह लोकाभिमुख भाषा-रूप, जो संस्कृत से
जनभाषाओं की ओर संक्रमण का चरण माना जाता है) और अवहट्ट (अपभ्रंश से विकसित
उत्तरवर्ती साहित्यिक भाषा-रूप, जिसे प्राचीन हिंदी का आरंभिक रूप
भी माना जाता है) की काव्यभूमि में प्रतिष्ठित हैं। इसी भाषिक भूमि पर दोहा का बीज
अंकुरित हुआ, जिसने कालान्तर में संत साहित्य की वैचारिक
ज्वाला, रीतिकालीन शिल्प–परिपक्वता और आधुनिक जनधर्मी चेतना तक निरंतर
अपने कथ्य और प्रयोजन का पुनर्निर्माण किया।
सिद्ध और नाथ परंपरा—सरहपा, कन्हपा, गोरखनाथ आदि—की वाणियों में दोहे का आरंभिक रूप स्पष्ट रूप से उपलब्ध होता है। इन दोहों में आध्यात्मिक अनुभूति, प्रतीकात्मक भाषा और दार्शनिक संक्षिप्तता का विलक्षण संयोग है। यहाँ दोहा केवल छंद–अनुशासन नहीं, बल्कि अनुभूति की तीव्रतम अभिव्यक्ति का माध्यम है; एक ऐसा माध्यम जिसमें रहस्यवाद, साधना और आत्मानुभूति सघन प्रतीकों में अभिव्यक्त होती है।
मध्यकालीन संत परंपरा में दोहा अपने उत्कर्ष पर
पहुँचता है। कबीर ने दोहे को आत्मालोचन, सामाजिक प्रतिरोध और आध्यात्मिक सत्य के निर्भीक
उद्घाटन का औजार बनाया—
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्या
कोय।
जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
यहाँ दोहा प्रतिरोध की भाषा है, रूढ़ि–भंजन का स्वर है और आत्मचिंतन का दर्पण भी। रैदास, दादू, नानक, मलूकदास आदि संत कवियों ने भी दोहे को लोकचेतना और आध्यात्मिक समता का वाहक बनाया। इस काल में दोहा लोक और दर्शन के अद्भुत सेतु के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
रीतिकाल में काव्य–दृष्टि का केंद्र बदलकर शृंगार और अलंकार–प्रधानता की ओर उन्मुख हुआ, किंतु दोहा अप्रासंगिक नहीं हुआ। बिहारीलाल की सतसई इसका सर्वाधिक सशक्त उदाहरण है—
दृग उलझत टूटत कुटुंब, जुरत चतुर चित
प्रीति।
परत गाँठ दुर्जन हिये, दई नई यह रीति॥
यहाँ दोहा सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक बोध, अल्प शब्दों में गहन भाव–विन्यास और शिल्प–संतुलन का अनुपम उदाहरण बन जाता है। संत परंपरा का वैचारिक तीखापन जहाँ एक ध्रुव पर है, वहीं रीतिकालीन दोहा सौंदर्य–चेतना और काव्य–कौशल का उत्कर्ष दिखाता है।
आधुनिक काल में यद्यपि छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता और मुक्तछंद का विस्तार हुआ, तथापि दोहा पूरी तरह विस्मृत नहीं हुआ। भारतेन्दु हरिश्चंद्र से लेकर बहुसंख्य कवियों तक अनेक कवियों ने प्रसंगानुकूल दोहे का प्रयोग किया। स्वतंत्रता–उत्तर काल में जनपक्षधर और लोकधर्मी रचनाकारों ने दोहे को पुनः सामाजिक यथार्थ, विडंबना और समकालीन चेतना से जोड़ा। इस प्रकार दोहा ने समयानुकूल स्वयं को रूपांतरित करते हुए अपनी जीवंतता बनाए रखी।
इस संयमित संरचना में लय, संतुलन और समापन का स्वाभाविक अनुशासन निहित है। सीमित शब्द–परिसर में अर्थ–घनत्व, सूक्तिपरकता और स्मरणीयता का सृजन ही दोहाकार की साधना है। यही कारण है कि दोहा सहजता से कंठस्थ हो जाता है और लोक–स्मृति में दीर्घकाल तक जीवित रहता है। प्रत्येक दोहा अपने आप में पूर्ण अर्थ और स्पष्ट संदेश समेटे होता है, किसी आख्यान या शृंखला पर आश्रित नहीं। मात्रा–विधान, यति, तुकांत और लय के प्रति सजगता के साथ-साथ विषय–वस्तु की व्यापकता—आस्था, कर्म–फल, सामाजिक विडंबना, राजनीतिक व्यंग्य और मानवीय संवेदना—इन सबका समन्वय इसे समीक्षा और विचार के दृष्टिकोण से गंभीर विषय बनाता है।
सारतः, संत काव्य में दोहा प्रतिरोध और आत्मबोध की वाणी बना; रीतिकाल में वह
सौंदर्य और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता का वाहक हुआ; और आधुनिक काल में
उसने पुनः सामाजिक यथार्थ के साथ संवाद स्थापित किया। दोहा का वर्चस्व हिंदी
साहित्य के विविध कालखंडों में भिन्न-भिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होता है। कथ्य, भाषा और
बिंब-विधान समयानुसार परिवर्तित होते रहे, परंतु उसकी मूल
शक्ति—संक्षिप्तता में सघन अर्थाभिव्यक्ति—अक्षुण्ण रही।
इसी ऐतिहासिक
प्रवाह में “दोहा–मुक्तक”
का उभरना देखा जाना चाहिए—जहाँ दोहा केवल छंदानुशासन का पालन नहीं करता,
बल्कि स्वतंत्र,
आत्मनिर्भर और पूर्ण काव्य–वक्तव्य
बन जाता है।
डॉ.
मधुसूदन सहा के अनुसार यह विधा पर संभवतः पहली कृति है। यह आकस्मिक प्रयोग नहीं, बल्कि
संत परंपरा की सूक्तिमयता, रीतिकाल की शिल्प–सिद्धि और आधुनिक मुक्तक–बोध का
संगम है। यदि केवल मुक्तक की दृष्टि से देखा जाए, तो इसमें कोई
छंद–निरपेक्ष चमत्कार नहीं है—क्योंकि मुक्तक में कोई भी छंद और लय प्रयोग योग्य
है। परंतु विशेष महत्त्व इस तथ्य में है कि यह संग्रह दोहे की पारंपरिक सौंदर्य, व्यंजना
और शिल्प–संवेदना को स्वतंत्र, पूर्ण और समकालीन रूप में प्रस्तुत करता है।
एक सम्यक समीक्षा के लिए यह आवश्यक है कि इन दोहा–मुक्तकों को केवल भावात्मक स्तर पर न पढ़ा जाए, बल्कि तीन प्रमुख आयामों पर परखा जाए—
1. छंद–शिल्प की शुद्धता और अनुशासन,
2. विषय–वस्तु की वैचारिक गहराई और समकालीनता,
3. सूक्ति–संक्षेप में अर्थ–घनत्व और व्यंजना–शक्ति।
तो आइए, एक बार इन बिन्दुओं पर दृष्टि डालते हैं—
1. छंद–शिल्प की शुद्धता और अनुशासन
दोहा छंद 13–11 मात्रा योजना पर आधारित है; पहले और तीसरे चरण में 13, दूसरे और चौथे में 11 मात्राएँ
अपेक्षित होती हैं। साथ ही यति, लय और स्वाभाविक प्रवाह इसकी
प्राण-तत्व हैं।
(क) शुद्ध एवं सघन उदाहरण: “ऊँचाई पर मत करो, इतना कभी घमंड। … ज़मींदोज़ होता सदा, पलभर में पाखंड॥ “ (5) यहाँ
मात्रा-संतुलन, लय और कथ्य—तीनों में संतुलन है। अंतिम चरण ‘पलभर में
पाखंड’ मारकता लिए हुए है। छंद की कसावट प्रभाव उत्पन्न करती है। “जला-जला कर
थक गये, रावण को हर साल…” (240) यह दोहा ध्वनि-संरचना, पुनरुक्ति-अनुप्रास और व्यंग्यात्मक लय से समृद्ध है। ‘रावण’ और ‘बैताल’ जैसे
प्रतीक छंद को अर्थ-घनत्व प्रदान करते हैं।“बिरवा बोया आम का, उपजा मगर बबूल…” (3) संरचना सुगठित है; लोक-लय और कथ्य का संतुलन प्रभावी
है।
(ख) आंशिक शिथिलता के उदाहरण: कुछ दोहों में भाषा थोड़ी गद्यात्मक हो जाती है— जाति, धर्म से आदमी, होता नहीं महान…” (227) भाव सशक्त है, किंतु कथन की प्रत्यक्षता के कारण लयात्मक सघनता अपेक्षाकृत कम हो जाती है।
यहाँ सूक्ति अधिक है, काव्य-उड़ान कम। “करना है तो कुछ करो, जग में अच्छा काम…” (232) यहाँ संदेश प्रमुख है; छंद बना है, पर मारक संक्षिप्तता कुछ शिथिल लगती है।
समग्रतः अधिकांश दोहे छंदानुशासन का पालन करते हैं।
कहीं-कहीं पद-विस्तार या कथ्य-प्रधानता से कसाव थोड़ा कम हुआ है, पर व्यापक स्तर पर छंद–साधना संतोषजनक है। यह रचनाकार की विधागत पर पकड़ का
प्रमाण है।
2. विषय–वस्तु की वैचारिक गहराई और समकालीनता
संग्रह का एक प्रमुख गुण विषय-विविधता है—भक्ति, राजनीति, सामाजिक विडंबना, पर्यावरण, स्त्री-विमर्श, आध्यात्मिक आत्मालोचन आदि।
(क) वैचारिक गहराई वाले दोहे: “बिरवा बोया आम का…” (3) यह कर्मफल-सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न है।
व्यवस्था-जनित विसंगति का संकेत है। यहाँ दार्शनिक द्वंद्व उपस्थित है—जो गहराई का
सूचक है। “सभी जानते छोड़ कर, जाना है उस पार…” (222) यह अस्तित्ववादी प्रश्न है—माया-मोह की
अनिवार्यता पर चिंतन। यहाँ नीति से अधिक दार्शनिकता है। “एक-एक कर सब गये, दाँत, आँत, बल, दीठ…” (236) जीवन की
जर्जरता और अस्तित्व की विडंबना का यथार्थ चित्रण। आत्मानुभूति का मार्मिक स्वर।
(ख) समकालीन चेतना: (212) लोकतंत्र में लेन-देन का खेल। (240) रावण-दहन की
प्रतीकात्मक आलोचना। (241) अंतरिक्ष अभियान पर राष्ट्रीय गर्व। (243) हिन्दी की
उपेक्षा का प्रश्न। (244) “ऑपरेशन सिंदूर” — प्रत्यक्ष राजनीतिक-सामरिक
संदर्भ। ये दोहे समय-बोध को दर्ज करते हैं। रचनाकार अपने परिवेश से सजग संवाद करता
है।
(ग) सीमाएँ: कुछ दोहे तात्कालिक घटनाओं से अत्यधिक जुड़े हैं (जैसे
241, 244), जिससे उनकी दीर्घकालिक सार्वकालिकता
पर प्रश्न उठ सकता है। बेटी-श्रृंखला (213–220) में भाव-पुनरावृत्ति अधिक है; संघर्षशील या स्वायत्त स्त्री-चेतना का स्वर अपेक्षाकृत सीमित है।
निष्कर्षतः विषयगत विस्तार संग्रह की प्रमुख शक्ति है।
वैचारिक स्तर पर नीति, सामाजिक आलोचना और दार्शनिकता तीनों उपस्थित हैं। जहाँ
प्रश्न उठते हैं, वहाँ गहराई है; जहाँ उपदेश प्रत्यक्ष है, वहाँ चिंतन की परतें अपेक्षाकृत कम
हो जाती हैं।
3. सूक्ति–संक्षेप में अर्थ–घनत्व और व्यंजना–शक्ति
दोहा की श्रेष्ठता उसकी संक्षिप्तता में अर्थ-विस्तार की क्षमता से आँकी जाती
है।
(क) सशक्त सूक्तियाँ: “टिकता कभी न दंभ…” (5) — सार्वकालिक
नीति-सूत्र। “कर्म बनाता है उसे…” (227) — नैतिक उद्घोष। “डर से डरना है
मना…”(237) — प्रेरक सूक्ति। “रावण को हर साल…”(240) — प्रतीकात्मक व्यंग्य। इन पंक्तियों में
स्मरणीयता है; वे उद्धरणीय बनती हैं।
(ख) व्यंजना-प्रधान उदाहरण: (3) और (240) में प्रतीकात्मकता गहरी है। “जिन
हाथों को चाहिए, कोई नई किताब /
उनको क्यों होने लगी, अब पत्थर की खोज।” (7) — यहाँ शिक्षा बनाम हिंसा का संकेत अत्यंत
प्रभावशाली है। यह संग्रह के सर्वश्रेष्ठ व्यंजना-प्रधान दोहों में से एक है।
(ग) जहाँ अर्थ-घनत्व कम हुआ: कुछ दोहों में कथ्य स्पष्ट है पर व्यंजना सीमित—जैसे पर्यावरण या नैतिक उपदेश संबंधी दोहे (232 आदि)। ये सार्थक हैं, पर सूक्ति की धार थोड़ी कम तीक्ष्ण है।
समग्रतः छंद–शिल्प : व्यापक रूप से संतुलित और अनुशासित; कुछ स्थानों पर कथ्य-प्रधानता से लयात्मक कसाव कम हुआ है। विषय–वस्तु : अत्यंत विविध; सामाजिक और समकालीन चेतना प्रबल। दार्शनिक प्रश्न उठाने वाले दोहे संग्रह को ऊँचाई देते हैं। सूक्ति–संक्षेप : अनेक दोहे-मुक्तक स्मरणीय और उद्धरणीय हैं; विशेषतः (3), (5), (7), (240) अत्यंत प्रभावशाली।
दोहा–मुक्तक की वास्तविक शक्ति उसकी स्मरणीयता और अर्थ–संक्षेप में निहित है। वह पाठक को तत्काल प्रभाव देता है, परंतु उसका मूल्य तभी स्थायी बनता है जब वह पुनर्पाठ की संभावनाएँ भी निर्मित करे। इसी कसौटी पर किसी भी दोहा–मुक्तक–कृति का मूल्यांकन अपेक्षित है—कि वह परंपरा का मात्र पुनरावर्तन है या समकालीन चेतना के साथ उसका सृजनात्मक संवाद स्थापित करती है।
यह दोहा–मुक्तक–संग्रह परंपरा और समकालीनता के बीच सेतु का कार्य करता है। जहाँ रचनाकार प्रश्न उठाता है, वहाँ काव्य ऊँचा उठता है; जहाँ वह प्रत्यक्ष उपदेश देता है, वहाँ प्रभाव कुछ सीमित हो जाता है। फिर भी समग्र रूप में यह कृति दोहा–विधा की जीवंतता, सामाजिक प्रासंगिकता और नैतिक चेतना का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करती है। इसकी प्रमुख उपलब्धि यह है कि यह दोहा को केवल छंद तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे विचार और विवेक की सक्रिय विधा में रूपांतरित करती है।
इसी पृष्ठभूमि में डॉ. मधुसूदन साहा के दोहा–मुक्तक–संग्रह “पल भर का मृदु प्यार” की समीक्षा आरंभ करना समीचीन होगा, क्योंकि यह कृति न केवल भावात्मक संवेदनाओं का संक्षिप्त किंतु प्रभावी विन्यास प्रस्तुत करती है, बल्कि परंपरा और समकालीन यथार्थ के मध्य सर्जनात्मक संतुलन स्थापित करने का भी प्रयास करती है।
डॉ. मधुसूदन साहा के प्रस्तुत दोहा–मुक्तक (1–250) समकालीन हिंदी दोहा-परंपरा में एक व्यापक, बहुआयामी और लोक-संवेद्य हस्तक्षेप के रूप में देखे जा सकते हैं। इनकी विषयवस्तु अत्यंत विस्तृत है—भक्ति से लेकर राजनीति, नैतिकता से लेकर स्त्री-विमर्श, पर्यावरण से लेकर समसामयिक घटनाओं तक। यह संग्रह केवल छंदाभ्यास नहीं, बल्कि समय-साक्ष्य के रूप में भी महत्वपूर्ण है। निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर इनका समालोचनात्मक अवलोकन प्रस्तुत है—
1. विषयवस्तु :
बहुआयामी जीवन–दृष्टि
इस दोहा–मुक्तक–संग्रह की विषयवस्तु अत्यंत व्यापक और बहुस्तरीय है। प्रारंभिक दोहे (1–3) भक्ति, साधना और आत्मालोचन की आधारभूमि पर प्रतिष्ठित हैं, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कवि अपनी काव्य–यात्रा को आध्यात्मिक विनय और नैतिक अनुशासन के साथ आरंभ करता है।
(1–2) में सरस्वती–वंदना के माध्यम से लेखन–साधना की
गंभीरता रेखांकित होती है—
“हंस वाहिनी माँ तुझे, करता विनत प्रणाम।
तेरे ही आशीष से, शब्द हुए अभिराम॥” (1)
यहाँ काव्य–लेखन को ईश्वरीय अनुग्रह से जोड़ते हुए कवि
अहंकार–त्याग का परिचय देता है। “शब्द हुए अभिराम” में काव्य–सौंदर्य का श्रेय
स्वयं को न देकर माँ सरस्वती को अर्पित किया गया है। यह विनयशीलता और
परंपरा–निष्ठता का द्योतक है।
“सिद्धि साधना के बिना, आती कभी न हाथ…
लेखन को समझो नहीं, तुम बच्चों का खेल॥” (2)
यह दोहा साहित्य को तपश्चर्या के रूप में स्थापित करता है। यहाँ स्पष्ट नीति–वचन है—रचना–कर्म साधना–धर्म से जुड़ा हुआ है। यह भाव कबीर–रहीम की नीतिपरक परंपरा का स्मरण कराता है, जहाँ शब्द केवल अलंकार नहीं, बल्कि साधना का फल होते हैं।
(3) में कर्म और परिणाम के अंतर्विरोध पर प्रश्न उठाया गया है, जो दार्शनिक आत्मपरीक्षण की दिशा में संकेत करता है। इस प्रकार आरंभिक दोहे ही संग्रह की वैचारिक आधारशिला निर्मित कर देते हैं। मध्य भाग (4–12, 212, 226 आदि) में कवि सामाजिक–राजनीतिक यथार्थ पर तीखा व्यंग्य करता है। (4) में राजनीति की नैतिक शिथिलता पर कटाक्ष है। (12) “लोकतंत्र में हो रहा, लेन–देन का खेल”—समकालीन लोकतांत्रिक विडंबना को उद्घाटित करता है। (226) में सामाजिक हिंसा और मर्यादा–भंग पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
यहाँ दोहा समसामयिक विवेक का माध्यम बनकर उभरता है, जहाँ कविता सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ती है। संग्रह का एक महत्वपूर्ण आयाम आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन है (221–222, 225, 237, 242 आदि)। इन दोहों में जीवन की अनित्यता, आत्मचिंतन, अहंकार–त्याग और नैतिक अनुशासन की ओर उन्मुख दृष्टि दिखाई देती है। (222) माया–मोह की दार्शनिक समीक्षा करता है। (225) आत्म–परिचय की साधना का संदेश देता है।
इस प्रकार विषयगत स्तर पर यह संग्रह भक्ति से आरंभ होकर सामाजिक यथार्थ, नैतिक चेतना और दार्शनिक मनन तक विस्तृत है। जीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों का यह समन्वय इसे “समग्र जीवन–दृष्टि” का काव्य सिद्ध करता है—जहाँ कविता केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन–मूल्यों की बहुआयामी प्रस्तुति है।
2. कर्म-दर्शन और
आत्मालोचन : प्रतीक और दार्शनिक प्रश्न
“बिरवा बोया आम का, उपजा
मगर बबूल।
जाने कैसे हो गई, मुझसे ऐसी भूल।
सदा बाग़बाँ बन रहा, जीवन भर मुस्तैद,
फिर भी फल क्यों कर मिला, कर्मों के प्रतिकूल॥” (3)
यह दोहा कर्म और फल के संबंध पर केंद्रित है। ‘आम’ और
‘बबूल’ का बिंब भारतीय काव्य-परंपरा में गुणात्मक अंतर का प्रतीक रहा है—आम मधुरता, अपेक्षित फल और सकारात्मक परिणाम का द्योतक है; बबूल कठोरता, पीड़ा और प्रतिकूलता का। यहाँ कवि ने अपेक्षा (आम) और
परिणाम (बबूल) के बीच के विरोध को प्रश्नवाची रूप में प्रस्तुत किया है।
1. कर्म–फल के सिद्धांत पर प्रश्न: भारतीय दार्शनिक परंपरा—विशेषतः गीता और उपनिषदों—में
कर्म और फल का संबंध नैतिक व्यवस्था के रूप में प्रतिपादित है। सामान्य धारणा यह
है कि शुभ कर्म का फल शुभ होगा। परंतु इस दोहे में कवि कहता है कि उसने ‘आम’ बोया, फिर भी ‘बबूल’ उगा। यह कथन कर्म-सिद्धांत के सरलीकृत संस्करण पर प्रश्नचिह्न
लगाता है। यहाँ आत्मालोचन का स्वर है—“जाने कैसे हो गई, मुझसे ऐसी भूल।” दोष बाह्य परिस्थितियों पर नहीं डाला गया, बल्कि स्वयं पर केंद्रित है। यह दृष्टि दार्शनिक है, क्योंकि वह परिणाम की विडंबना को पहले आत्म-निरीक्षण से जोड़ती है।
2. ‘बाग़बाँ’ का बिंब : सजगता और असफलता का द्वंद्व: “सदा बाग़बाँ बन रहा, जीवन भर मुस्तैद”—यहाँ कर्ता की सजगता, श्रम और निरंतरता का संकेत है। वह निष्क्रिय नहीं था; उसने अपने कर्म-क्षेत्र में प्रयास किया। फिर भी परिणाम प्रतिकूल रहा। यह
द्वंद्व आधुनिक जीवन की यथार्थपरक अनुभूति है—जहाँ श्रम और सफलता का सीधा समीकरण
हर बार सिद्ध नहीं होता। इस प्रकार दोहा केवल दार्शनिक कथन नहीं, अनुभवजन्य सत्य को भी अभिव्यक्त करता है।
3. आत्मालोचन बनाम भाग्यवाद: अंतिम पंक्ति—“फिर भी फल क्यों कर मिला, कर्मों के प्रतिकूल”—प्रश्नवाची है। यह न तो पूर्ण भाग्यवाद है, न ही पूर्ण विद्रोह। यह जिज्ञासा है। यहाँ कवि नियति को अंतिम सत्य घोषित नहीं
करता, बल्कि कर्म की प्रक्रिया, उसकी शुद्धता, अथवा उसके अप्रकट आयामों पर विचार की आवश्यकता को
रेखांकित करता है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह दोहा कर्म-सिद्धांत की जटिलता
को सरल प्रतीक में व्यक्त करता है। यह गीता के कर्मयोग का प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं, बल्कि उसके नैतिक ढाँचे के भीतर उठता एक अनुभवात्मक प्रश्न है।
4. दोहा-मुक्तक के व्यापक संदर्भ में: समूचे संग्रह में जहाँ नीति, भक्ति, सामाजिक व्यंग्य और समसामयिकता के स्वर हैं, वहाँ यह दोहा आत्ममंथन का आंतरिक आयाम जोड़ता है। यह बाह्य समाज की आलोचना नहीं करता, बल्कि व्यक्ति को स्वयं के भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है। इस दृष्टि से यह संग्रह के नैतिक-विमर्श को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।
अतः तथ्यात्मक और आलोचनात्मक रूप से कहा जा सकता है कि यह दोहा-मुक्तक कर्म-दर्शन को प्रश्नवाची मुद्रा में प्रस्तुत करता है। ‘आम’ और ‘बबूल’ का प्रतीक अपेक्षा और परिणाम के अंतर्विरोध को सरल, बोधगम्य रूप देता है। यहाँ उपदेश नहीं, आत्म-संशय है; निष्कर्ष नहीं, आत्ममंथन है। यही इसकी शक्ति है—यह पाठक को तैयार उत्तर नहीं देता, बल्कि उसे अपने जीवन के ‘आम’ और ‘बबूल’ की समीक्षा करने के लिए प्रेरित करता है।
3. राजनीति और
सामाजिक विडंबना : समसामयिक परिप्रेक्ष्य
दोहा क्रमांक (4), (12), (212), (226), (240), (243), (244) आदि में
समकालीन राजनीति और सामाजिक विडंबनाओं पर स्पष्ट टिप्पणी मिलती है। इन दोहों में
व्यंग्य, प्रतीक और तात्कालिक संदर्भों के माध्यम से वर्तमान
राजनीतिक संस्कृति की आलोचना की गई है।
“राजनीति के नीर का, जो कर लेते पान…
फिर चाहे जो भी करे, लगे न कोई पाप॥” (4)
यहाँ ‘राजनीति’ को ‘नीर’ कहा गया है, पर यह नीर पवित्रता का नहीं, बल्कि नैतिक शिथिलता का संकेतक है।
‘पान’ करते ही ‘पाप’ का बोध समाप्त हो जाना—यह सत्ता-संपर्क के बाद नैतिक मानदंडों
के क्षरण की ओर संकेत करता है। यह रूपकात्मक व्यंग्य है, जो राजनीति और नैतिकता के अंतर्विरोध को रेखांकित करता है।
“लोकतंत्र में हो रहा, लेन-देन का खेल,
सबके झुकते हैं यहाँ, सिर्फ़ स्वार्थ से माथ॥” (212)
इस दोहे में लोकतंत्र को ‘लेन-देन का खेल’ कहा गया है, जो राजनीतिक प्रक्रिया के बाजारीकरण और स्वार्थ-प्रधान प्रवृत्तियों की ओर
संकेत करता है। ‘माथ झुकना’ यहाँ सम्मान नहीं, बल्कि स्वार्थ-प्रेरित समर्पण का द्योतक है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों और
व्यावहारिक राजनीति के बीच अंतर को उजागर करता है।
“जला-जला कर थक गये, रावण को हर साल।
फिर भी क्यों मरता नहीं, यह कैसा बैताल?” (240)
रावण यहाँ पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि दंभ, भ्रष्टाचार और अनैतिकता का प्रतीक है। प्रतिवर्ष उसका
दहन सामाजिक अनुष्ठान है, किंतु वास्तविक जीवन में बुराइयों
का बने रहना—यह सांस्कृतिक कर्मकांड और सामाजिक यथार्थ के बीच के द्वंद्व को सामने
लाता है। ‘बैताल’ शब्द के प्रयोग से यह संकेत मिलता है कि यह बुराई बार-बार लौट
आती है और समाप्त नहीं होती।
“घर में मिले न मान…”(243)
इस दोहे में हिंदी भाषा की उपेक्षा का प्रसंग है। ‘घर
में मिले न मान’—यह अपनी ही भाषिक-सांस्कृतिक विरासत के प्रति उपेक्षापूर्ण
दृष्टिकोण का संकेत है। यहाँ भाषाई विडंबना का चित्रण है, जहाँ हिंदी सार्वजनिक मंचों पर प्रतिष्ठित दिखाई देती है, पर व्यवहारिक जीवन में उसका अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता।
“ऑपरेशन सिंदूर…” (तात्कालिक संदर्भ) (244)
यहाँ समकालीन राजनीतिक या सामाजिक घटना का उल्लेख है। इस प्रकार का प्रत्यक्ष संदर्भ दोहों को तत्कालीन समय से जोड़ता है। इससे रचना की समसामयिकता और तात्कालिक प्रभाव प्रबल होता है, किंतु समय बीतने पर ऐसे संदर्भों की अर्थवत्ता संदर्भ-निर्भर हो सकती है। अतः यह प्रवृत्ति एक ओर काव्य को समय-सापेक्ष सशक्त बनाती है, तो दूसरी ओर उसकी स्थायित्व-सीमा भी निर्धारित करती है।
इन दोहों में राजनीति का चित्रण आदर्शवादी न होकर आलोचनात्मक और व्यंग्यात्मक है। सत्ता-संपर्क से नैतिकता के क्षरण, लोकतंत्र के बाजारीकरण, सांस्कृतिक अनुष्ठानों की प्रतीकात्मकता तथा भाषाई अस्मिता की उपेक्षा—इन सभी बिंदुओं पर कवि की सजग दृष्टि स्पष्ट है।
तथ्यात्मक रूप से कहा जा सकता है कि यहाँ दोहा-विधा समसामयिक सामाजिक-राजनीतिक चेतना का माध्यम बनती है। यह काव्य को समय-बद्ध भी करती है और तत्काल प्रभावशाली भी—यही इसकी शक्ति और सीमा दोनों है।
4. स्त्री-विमर्श
: बेटी का सांस्कृतिक प्रतिमान
दोहा क्रमांक (213–220) में ‘बेटी’ को केंद्र में रखकर
एक सकारात्मक सांस्कृतिक दृष्टि प्रस्तुत की गई है। विशेषतः (215) और (216) में
बेटी को घर-आँगन की ज्योति, उल्लास और आध्यात्मिक गरिमा के
प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है।
“बेटी घर की रोशनी, आँगन का आलोक…
बेटे से इहलोक है, बेटी से परलोक॥” (216)
इस दोहे में बेटी को ‘परलोक’ से जोड़ा गया है, जो भारतीय सांस्कृतिक मानस में पुत्री को आध्यात्मिक पुण्य, कर्तव्य और मोक्ष-परंपरा से संबद्ध करने की धारणा का संकेत देता है। यहाँ
इहलोक–परलोक का द्वैत स्थापित कर बेटी को पारलौकिक गरिमा प्रदान की गई है। यह
प्रस्तुति पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक अवधारणाओं से अनुप्राणित है।
“इन्द्रधनुष-सी बेटियाँ, पहनें जब परिधान…”(215)
इस दोहे में उपमा अलंकार के माध्यम से बेटी को सौंदर्य, विविधता और उल्लास का प्रतीक बनाया गया है। ‘इन्द्रधनुष’ बहुरंगता और आशा का बिंब है, जिससे बेटी की उपस्थिति को उत्सवधर्मी अर्थ मिलता है।
समालोचनात्मक दृष्टि से देखें तो इन दोहों में बेटी का महिमामंडन स्पष्ट है, किंतु उसका स्वर मुख्यतः सांस्कृतिक-आदर्शवादी है। बेटी को घर, आँगन, परिवार और परलोक से संबद्ध कर उसकी गरिमा का विधान किया गया है, परंतु उसकी स्वायत्त सत्ता, सामाजिक संघर्ष, निर्णय क्षमता या आत्मनिर्भर व्यक्तित्व का स्वर अपेक्षाकृत कम उभरता है। अर्थात् स्त्री की छवि यहाँ अधिकतर संबंधपरक (relational) है, स्वतंत्र अस्मिता के रूप में नहीं।
फिर भी, समकालीन सामाजिक संदर्भ—जहाँ कन्या-वध, लिंग-भेद और स्त्री-असमानता जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं—में यह स्तुति-सरणी एक नैतिक प्रतिपक्ष के रूप में देखी जा सकती है। बेटी को प्रकाश, आलोक और आध्यात्मिक गरिमा के रूप में स्थापित करना सामाजिक चेतना में उसके मूल्य को रेखांकित करने का काव्यात्मक प्रयास है।
अतः तथ्यात्मक स्तर पर कहा जा सकता है कि इन दोहों का स्त्री-विमर्श सकारात्मक और सांस्कृतिक है, किंतु आधुनिक नारीवादी विमर्श की दृष्टि से यह अधिक आदर्शवादी और कम संघर्ष-केंद्रित प्रतीत होता है।
5. पर्यावरण और
प्रकृति-संवेदना : मूल्य और चित्रात्मकता
दोहा क्रमांक (232) और (6) में पर्यावरण तथा प्रकृति
के प्रति संवेदनशील दृष्टि व्यक्त हुई है। यहाँ प्रकृति केवल काव्यात्मक अलंकरण
नहीं, बल्कि नैतिक संदेश और जीवन-मूल्यों की स्थापना का
माध्यम बनती है।
“पेड़ लगाओ एक तुम, अपनी माँ के नाम…”(232)
यह दोहा पर्यावरण-संरक्षण के संदेश को अत्यंत सरल और जन-भाषा में प्रस्तुत करता है। ‘माँ’ के नाम से वृक्षारोपण का आग्रह भावनात्मक जुड़ाव उत्पन्न करता है। यहाँ पर्यावरणीय नैतिकता को व्यक्तिगत संवेदना से जोड़ा गया है—मातृत्व के प्रति सम्मान को प्रकृति-संरक्षण से संबद्ध कर एक व्यावहारिक प्रेरणा दी गई है।
तथ्यात्मक रूप से यह दोहा पर्यावरण-जागरूकता की उस
समकालीन प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वृक्षारोपण को सामाजिक दायित्व के रूप में स्थापित किया जा रहा है।
भावात्मक अपील के कारण इसका संदेश सीधे पाठक-मन पर प्रभाव डालता है।
“रोज सवेरे भोर की, किरणें आती आँक…
कली-कली को चूमकर, सुखद सुनहरी धूप…” (6)
इस दोहे में भोर, किरणें, कली और धूप के माध्यम से प्रकृति का दृश्यात्मक चित्र उपस्थित होता है। यह चित्रण सौंदर्य-बोध और शांति का वातावरण निर्मित करता है। ‘तरबूज़ी फाँक’ जैसी उपमा (यदि इसी प्रसंग में प्रयुक्त है) लोक-जीवन की सहजता और ग्रामीण बिंबधर्मिता को दर्शाती है। इससे भाषा में जनपक्षधरता और स्थानीय रंग उपस्थित होता है।
इन दोहों में प्रकृति का प्रयोग केवल सौंदर्य-विधान के लिए नहीं, बल्कि मूल्य-स्थापना के लिए हुआ है। एक ओर पर्यावरण-संरक्षण का नैतिक आग्रह है, तो दूसरी ओर प्रकृति का सौंदर्य जीवन में संतुलन और सकारात्मकता का प्रतीक बनकर उभरता है।
हालाँकि यहाँ प्रकृति का चित्रण अधिकतर सौंदर्यात्मक और प्रेरणात्मक है; पर्यावरण-संकट की जटिलताओं या पारिस्थितिक संघर्षों का विश्लेषण अपेक्षाकृत नहीं मिलता। फिर भी, विधागत संक्षिप्तता को देखते हुए यह प्रस्तुति उद्देश्यपरक और प्रभावकारी कही जा सकती है।
अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इन दोहों में प्रकृति-संवेदना सौंदर्य और नैतिकता—दोनों स्तरों पर सक्रिय है, और जन-भाषा के माध्यम से व्यापक पाठक-समुदाय से संवाद स्थापित करती है।
6. नीति और
चारित्रिक विकास : शिक्षात्मकता और परंपरा
दोहा क्रमांक (5), (227), (237), (233) आदि
नीति-काव्य की परंपरा से संबद्ध प्रतीत होते हैं। इन दोहों में दंभ-त्याग, कर्मप्रधानता, निर्भयता तथा अनुभव-सम्मान जैसे नैतिक मूल्यों का
प्रतिपादन है। इस प्रकार ये रचनाएँ कबीर, रहीम तथा भारतीय नीति-सूक्त परंपरा
की शिक्षात्मक धारा से जुड़ती हैं। दोहा-विधा की संक्षिप्तता और सघनता ऐसे संदेशों
के लिए अनुकूल मानी जाती रही है।
“ऊँचाई पर मत करो, इतना कभी घमंड…
ज़मींदोज़ होता सदा, पलभर में पाखंड॥” (5)
इस दोहे में दंभ-त्याग का स्पष्ट संदेश है। ‘ऊँचाई’ और
‘ज़मींदोज़’ के विरोधी बिंबों के माध्यम से यह बताया गया है कि अहंकार स्थायी नहीं
होता। ‘पाखंड’ के शीघ्र पतन की बात नैतिक चेतावनी के रूप में आती है। यदि
‘मार्तंड’ (सूर्य) जैसे रूपक का संदर्भ जुड़ा हो, तो वह यह संकेत करता है कि प्रकृति में भी ऊँचाई चिरस्थायी नहीं—अस्त का नियम
सर्वत्र लागू है।
“जाति, धर्म से आदमी, होता नहीं महान।
कर्म बनाता है उसे, सबसे श्रेष्ठ सुजान॥” (227)
यह दोहा समतावादी दृष्टि प्रस्तुत करता है। जाति और
धर्म से परे ‘कर्म’ को महानता का आधार बताना गीता के कर्मयोग-सिद्धांत की स्मृति
जगाता है, जहाँ कर्म को मनुष्य की वास्तविक पहचान माना गया है।
समकालीन सामाजिक विभाजनों की पृष्ठभूमि में यह दोहा मानवीय समानता और नैतिकता का
उद्घोष है।
“बूढ़े को मत जानिए, हैं बिल्कुल बेकार…
अनुभव के हर पृष्ठ पर, है गीता का सार॥” (233)
इस दोहे में वृद्ध-अनुभव के महत्व को रेखांकित किया
गया है। ‘गीता का सार’ रूपक के माध्यम से अनुभव को जीवन-ज्ञान की संचित निधि बताया
गया है। यह भारतीय पारिवारिक-सांस्कृतिक संरचना में बुज़ुर्गों के प्रति आदरभाव की
परंपरा को पुष्ट करता है।
(भय-मुक्त जीवन का आवाहन) (237)
यद्यपि पाठ यहाँ उद्धृत नहीं है, तथापि संकेतित दोहा निर्भयता और साहस को जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करता है। नीति-काव्य में भय-त्याग को आत्मबल और नैतिक दृढ़ता से जोड़ा गया है; संभवतः यह दोहा भी उसी परंपरा का विस्तार है।
इन दोहों में स्पष्ट शिक्षात्मकता है, जो नीति-काव्य की मूल प्रवृत्ति के अनुरूप है। भाषा सरल, संदेश प्रत्यक्ष और नैतिक आग्रह स्पष्ट है। यहाँ जटिल मनोवैज्ञानिक विश्लेषण या वैचारिक बहस के स्थान पर जीवन-सिद्धांतों का संक्षिप्त प्रतिपादन मिलता है।
तथ्यात्मक रूप से कहा जा सकता है कि ये दोहे परंपरागत भारतीय नैतिक दृष्टि—दंभ-त्याग, कर्म-प्रधानता, समता, अनुभव-सम्मान और निर्भयता—को समकालीन संदर्भ में पुनः अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रकार ये दोहा-विधा की शिक्षापरक परंपरा से संगति रखते हुए चारित्रिक विकास का संदेश प्रस्तुत करते हैं।
7. दार्शनिक और
आध्यात्मिक चिंतन
इन दोहों की वैचारिकी भारतीय सांस्कृतिक चेतना से गहराई से अनुप्राणित है। कृति के अनेक स्थलों पर भारतीय दार्शनिक परंपरा, सांस्कृतिक प्रतीकों और आध्यात्मिक आस्थाओं का साक्षात् संदर्भ उपस्थित है—जैसे गीता–स्मरण (227), शारदा–वंदना (1, 249), शिव–पार्वती प्रसंग (238) तथा कुंभ–पर्व (246–248)। ये संदर्भ केवल सांस्कृतिक अलंकरण नहीं, बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक राष्ट्र–बोध और मूल्य–चेतना के संवाहक हैं।
इस काव्य–दृष्टि में कर्मवाद, आत्मानुशासन, वैराग्य–बोध और माया–मोह की समीक्षा भारतीय दार्शनिक
धरातल पर स्थापित है। उदाहरणतः—
सभी जानते छोड़ कर, जाना है उस पार।
सारी अर्जित सम्पदा, हो जाती बेकार।
फिर क्यों माया-मोह से, छुड़ा न पाते हाथ,
समझ न पाया आज तक, मायावी संसार।। (222)
यहाँ जीवन की अनित्यता और सांसारिक आसक्ति का द्वंद्व उभरता है। मनुष्य की बौद्धिक चेतना मृत्यु–सत्य को स्वीकार करती है, किंतु व्यवहार में वह मोह–बंधन से मुक्त नहीं हो पाता। इस द्वैध में अद्वैत–चिंतन और गीता–प्रदत्त अनासक्ति–योग की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।
इसी प्रकार—
डर से डरना है मना, डर होता जमदूत।
आँखों में नाचे सदा, भय का काला भूत।
सूर्य उगे जब शौर्य का, फैले दिव्य प्रकाश,
तन से ऊर्जा फूटती, मन होता मज़बूत।। (237)
यहाँ भय का रूपक ‘जमदूत’ के रूप में उपस्थित है, जो जीवन–ऊर्जा का हरण करता है। इसके विपरीत ‘शौर्य–सूर्य’ का उदय दिव्य प्रकाश का प्रसार करता है। यह बिंब–योजना केवल प्रेरक कथन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साहस और आंतरिक जागरण का संकेत है—जहाँ भय–त्याग आत्मबल की अनिवार्य शर्त बन जाता है।
समग्रतः, इन दोहों में अध्यात्म जीवन–विमुख
नहीं, बल्कि जीवन–संलग्न है। सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम
से नैतिक अनुशासन, कर्म–प्रधानता और आत्मजागरण का संदेश दिया गया है। इस
प्रकार कृति भारतीय दार्शनिक परंपरा की अविरल धारा से जुड़ते हुए समकालीन मनुष्य
को आत्ममंथन और मूल्य–चिंतन की ओर उन्मुख करती है।
8. भाषा–शैली और
छंदगत पक्ष
इस कृति की भाषा मूलतः सरल, जन–सुलभ और संवादधर्मी है। कवि ने जटिल बिंब–विन्यास या अत्यधिक दुरूहता का
आश्रय नहीं लिया; बल्कि ऐसी अभिव्यक्ति अपनाई है जो सहज ग्रहणीय और
स्मरणीय हो। लोक–प्रयोगों—जैसे “मौज–मस्तियाँ”, “लेन–देन का खेल”—से रचना में जीवनानुभव की ठोस धरातलीयता आती है, वहीं “मृदु प्यार”, “दिव्य प्रकाश”
जैसे संस्कृतनिष्ठ पद भाषा को कोमलता और गरिमा प्रदान करते हैं। इस प्रकार लोक और
साहित्यिक भाषा का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
अलंकार–योजना में रूपक, उपमा और अनुप्रास का संयमित प्रयोग हुआ है। उदाहरणतः—“इन्द्रधनुष–सी बेटियाँ” (215) में उपमा के माध्यम से बेटी की बहुरंगी, उज्ज्वल और आश्वस्तिपूर्ण उपस्थिति का चित्र उभरता है।
इन्द्रधनुष-सी
बेटियाँ, पहनें जब परिधान।
मेघों में हंसने
लगे, छुप-छुपकर दिनमान ।
सबकी आँखों में
बसे, उसकी नटखट चाल,
अम्बर तक करने लगे, उसका रूप बखान।। (215)
“स्वाति बूँद… मोती बाँटे सीप” (221) में लोक–विश्वास
पर आधारित रूपक का सुंदर प्रयोग है, जो स्वभाव–निष्ठा और आंतरिक
गुण–धर्म की स्थिरता का संकेत देता है—
ज्योति-पर्व में प्रेम से, जले दीप से दीप।
मन की दूरी दूर कर, आये सभी समीप।
स्वाति बूँद बदले नहीं, अपना कभी स्वभाव,
इसी तरह हर साल नित, मोती बाँटे सीप।। (221)
यहाँ परंपरागत प्रतीक के माध्यम से नैतिक सत्य की स्थापना की गई है। भाषा प्रांजल, प्रवाहमान और सहज है; सूक्तिपरकता इसका स्वाभाविक गुण बनकर उभरती है।
छंद–दृष्टि से अधिकांश दोहे परंपरागत 13–11 मात्रा–विन्यास (प्रत्येक चरण में 13 और 11 मात्राएँ) का निर्वाह करते हैं। लय और विराम का संतुलन प्रायः सुरक्षित है, जिससे दोहों की कथन–प्रभाविता बनी रहती है। तथापि कुछ स्थलों पर समसामयिक अथवा दीर्घ शब्दों के प्रयोग के कारण लघु–मात्रिक असंतुलन की संभावना दृष्टिगोचर होती है। उदाहरणार्थ, “ऑपरेशन सिंदूर” (244) जैसे समय–विशेष से जुड़े शब्द दोहों को समकालीन संदर्भ से जोड़ते अवश्य हैं, पर भाषा और छंद–संतुलन की दृष्टि से सूक्ष्म परीक्षण अपेक्षित कर सकते हैं।
अतः समग्र रूप से भाषा–शैली सहज, अर्थगर्भ और लोकाभिमुख है; अलंकार–योजना संयत है; तथा छंद–विन्यास अधिकांशतः शास्त्रीय मर्यादा का पालन करता है। कहीं–कहीं मात्रा–संतुलन के स्तर पर सूक्ष्म संपादकीय परिमार्जन की आवश्यकता अनुभव होती है, किंतु इससे कृति की मूल अभिव्यक्तिपरक शक्ति प्रभावित नहीं होती।
9.
नवोन्मेष और साहित्यिक अन्विति
यदि इस कृति को नवोन्मेष की दृष्टि से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह दोहा–मुक्तक की परंपरा में समकालीन जीवन–विवेक को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समेटने का संगठित प्रयास है। (1–250) तक की क्रमबद्ध संख्या–निरंतरता मात्र संख्यात्मक विस्तार नहीं, बल्कि एक अनुशासित साधना का संकेत है। यह संचयन क्रमशः एक “थीमेटिक कोष” का रूप ग्रहण करता है, जहाँ विविध विषय एक ही छंद–संरचना में संयोजित होते हुए भी अपने स्वतंत्र वैचारिक आयाम बनाए रखते हैं।
पारंपरिक मात्रिक छंद में आधुनिक विषयों की प्रस्तुति इस कृति की विशेष उपलब्धि है। यहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच कोई द्वंद्व नहीं, बल्कि संवाद और सेतु–स्थापना का भाव है। दोहा की पारंपरिक लयात्मकता में समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को अभिव्यक्ति देना इसे विशिष्ट बनाता है।
यह कृति
नीति–प्रधान दोहा–परंपरा—कबीर, रहीम आदि—से आंतरिक रूप से संबद्ध
दिखाई देती है, किंतु उसका कथ्य समकालीन यथार्थ से प्रत्यक्ष संवाद
करता है। नवगीत–युगीन समय–बोध और संवेदनात्मक सजगता इसमें विद्यमान है, पर अभिव्यक्ति मुक्तछंद में न होकर छंदबद्ध दोहा के अनुशासन में संपन्न होती
है। इस दृष्टि से इसे “समकालीन दोहा–चेतना” का सशक्त उदाहरण कहा जा सकता है।
दोहा मुक्तक के लिए, दो दोहे की जात।
होती है जब एक तो, बन जाती है बात।
जीवन की अनुभूतियाँ, अंतस के मृदु भाव,
चरणों पर माँ शारदे, अर्पित यह सौगात। (249)
यहाँ कवि स्वयं दोहा–मुक्तक की संरचना को रेखांकित करता है। यह आत्म–चेतस सर्जना है, जो विधागत सजगता और काव्य–संरचना के प्रति सचेत प्रतिबद्धता का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
समग्रतः इस कृति में नीति–परंपरा (कबीर, रहीम), समकालीन राजनीतिक चेतना, स्त्री–गरिमा का सांस्कृतिक पुनर्स्मरण, पर्यावरणीय सरोकार, कर्मवाद और आत्मानुशासन—इन सभी तत्वों का समन्वित रूप उपस्थित है। यही बहुआयामिता इसे परंपरा और वर्तमान के मध्य एक सृजनात्मक सेतु के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
निष्कर्षतः उद्धरणों और विषय–विस्तार से स्पष्ट है कि डॉ. साहा के दोहा–मुक्तक मात्र भाव–प्रवण अभिव्यक्तियाँ नहीं, बल्कि मूल्य–स्थापना का एक सचेत काव्य–प्रयास हैं। इनमें भक्ति की विनय, राजनीति पर व्यंग्य, नारी–सम्मान की प्रतिष्ठा, कर्म–प्रधानता का संदेश, पर्यावरण–चेतना और आत्मचिंतन का आग्रह—सभी समवेत रूप में उपस्थित हैं।
यद्यपि कहीं–कहीं उपदेशात्मकता अथवा भाव–पुनरावृत्ति का आभास होता है, तथापि समग्र मूल्यांकन में यह कृति समकालीन हिंदी दोहा–चेतना का बहुआयामी, मूल्यनिष्ठ और सामाजिक सरोकारों से संपृक्त उदाहरण सिद्ध होती है—जहाँ कविता केवल रसाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समय और समाज से सक्रिय संवाद भी है।
10.
समकालीन प्रासंगिकता
आज का समय जटिल सामाजिक संरचनाओं, राजनीतिक विडंबनाओं और तीव्र संप्रेषण–संस्कृति का समय है। विस्तृत आख्यानों
के बीच संक्षिप्त, धारदार और स्मरणीय कथन की आवश्यकता बढ़ी है।
दोहा–मुक्तक इस आवश्यकता की स्वाभाविक पूर्ति करता है। क्योंकि, वह— लोकभाषा से जुड़ता है, सामाजिक–राजनीतिक यथार्थ पर तीखा
व्यंग्य करता है, नैतिक
प्रश्नों को संक्षेप में उजागर करता है, और पाठक को उदासीनता से बाहर लाता
है। यह परंपरा का अनुकरण मात्र नहीं, बल्कि उसका आलोचनात्मक पुनर्पाठ
है—जहाँ कबीर की निर्भीकता, बिहारी की सूक्ष्मता और समकालीन
चेतना की बेचैनी एक साथ उपस्थित होती है।
विषय–वस्तु की दृष्टि से यह संग्रह बहुआयामी है—आध्यात्मिक विश्वास से सामाजिक
विडंबना तक, राजनीतिक पाखंड से मानवीय करुणा तक, कर्म–फल के दार्शनिक संकेत से लोकानुभव की सहज अभिव्यक्ति तक—हर स्तर पर दोहा-मुक्तक
अपनी संक्षिप्त संरचना में व्यापक अर्थ-संसार को समेटता है।
उदाहरणार्थ—
राजनीति के नीर का, जो कर
लेते पान।
समझो उनका हो गया, क्षण में ही कल्याण॥
यहाँ व्यंग्य मात्र नहीं, सत्ता–संरचना पर सूक्ष्म प्रहार निहित है।
इसी प्रकार—
बिरवा बोया आम का, उपजा मगर बबूल।
कर्म और परिणाम की विडंबना को लोक-बिंब के माध्यम से सघन रूप में व्यक्त करता
है। मूल कहावत—“बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय”—कर्म और फल के स्वाभाविक, नैतिक और तर्कसंगत
संबंध को स्थापित करती है। उसमें प्रश्न आरोपात्मक नहीं, बल्कि शिक्षाप्रद
है: जैसा कर्म, वैसा फल। परंतु डॉ. साहा की पंक्ति—“बिरवा बोया आम
का, उपजा मगर बबूल।” —इस लोक-तर्क को उलट देती है। यहाँ सीधी नैतिक
व्यवस्था भंग हो गई है। अब प्रश्न यह नहीं कि बबूल बोकर आम क्यों नहीं मिला; बल्कि यह है कि आम
बोने पर भी बबूल क्यों उग आया?
तो इस बात के निहितार्थ क्या हैं ? इसे निम्न रूपों में समझ सकते हैं-
1. व्यवस्था की विडंबना – यह पंक्ति उस सामाजिक–राजनीतिक परिस्थिति की ओर संकेत करती है जहाँ सदाशयता, परिश्रम या नैतिक कर्म का परिणाम अपेक्षित रूप में नहीं मिलता। व्यक्ति ने ‘आम’ बोया—अर्थात सद्कर्म, सद्भाव, श्रम या सकारात्मक प्रयास—पर परिणाम ‘बबूल’ निकला—अर्थात कँटीला, पीड़ादायक, प्रतिकूल फल।
2. कर्म–फल सिद्धांत पर प्रश्न – यहाँ पारंपरिक कर्मफल-न्याय की सहज अवधारणा पर व्यंग्यात्मक प्रश्नचिह्न है। क्या हर बार “जैसा बोओगे वैसा काटोगे” सत्य सिद्ध होता है? समकालीन जीवन में कई बार कर्म और परिणाम के बीच की स्वाभाविक संगति टूट जाती है।
3. संरचनात्मक अन्याय का संकेत – यह केवल व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था-जनित विसंगति भी हो सकती है—जहाँ श्रम किसी और के खाते में चला जाता है, और परिणाम विकृत होकर लौटता है।
4. विश्वास-भंग का बिंब – ‘आम’ यहाँ आशा, विश्वास या सदिच्छा का प्रतीक है; ‘बबूल’ निराशा, विश्वासघात या कटु अनुभव का।
इस प्रकार यह दोहा लोककथा के नैतिक उपदेश से आगे बढ़कर आधुनिक यथार्थ की
त्रासदी को व्यक्त करता है। यह एक उलटी कहावत है—जो हमारे समय की उलटी होती हुई
व्यवस्थाओं का काव्यात्मक रूपक बन जाती है
डॉ. मधुसूदन साहा का यह दोहामुक्तक–संग्रह परंपरा की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसका नवोन्मेषी रूपांतरण है। यहाँ छंद–अनुशासन और वैचारिक सजगता का
संतुलित सामंजस्य दिखाई देता है। यदि यह कृति पाठक को ठहरकर सोचने, अपने समय से संवाद स्थापित करने और अंतर्मन में उठते प्रश्नों को शब्द देने के
लिए प्रेरित करती है, तो उसकी साहित्यिक सार्थकता सिद्ध होगी।
दोहा–मुक्तक की यही विशेषता है—संक्षिप्त, परंतु सशक्त; लघु, परंतु दीर्घजीवी; क्षणिक कथन, किंतु स्थायी प्रभाव। इसी अर्थ में डॉ. मधुसूदन साहा
का यह प्रयास हिंदी काव्य–परंपरा में एक सजग, सशक्त और सम्माननीय हस्तक्षेप के रूप में स्थापित होता है। ये दोहा–मुक्तक
परंपरा का निर्वाह मात्र नहीं करते, बल्कि उसे समकालीन संदर्भ में
सक्रिय भी रखते हैं। इनमें संत–परंपरा की नैतिकता, लोक–प्रज्ञा की सहजता और आधुनिक समय की आलोचनात्मक दृष्टि—तीनों का संगम है। डॉ.
साहा का दोहा यहाँ उपदेश, प्रार्थना, आत्मालोचन और व्यंग्य—सबका माध्यम बनता है। उनकी शक्ति संक्षिप्त कथन में
स्पष्ट विचार रखने में है।
समग्रतः यह संचय दोहा–मुक्तक को एक जीवित, विचारशील और सामाजिक रूप से उत्तरदायी काव्य–विधा के रूप में प्रतिष्ठित करता
है—संक्षेप में कहें तो—यहाँ दोहा केवल छंद नहीं, समय से संवाद है।
11. संभावित
कमियाँ : एक समग्र आलोचनात्मक दृष्टि
सम्पूर्ण दोहा-मुक्तकों के अवलोकन से स्पष्ट होता है
कि रचनाकार की संवेदना व्यापक है—भक्ति, नीति, समाज, राजनीति, पर्यावरण, स्त्री-विमर्श आदि अनेक आयाम उपस्थित हैं। फिर भी आलोचनात्मक संतुलन की दृष्टि
से कुछ संभावित सीमाएँ रेखांकित की जा सकती हैं :
1. अधिक शिक्षात्मकता: कई दोहे प्रत्यक्ष उपदेशात्मक स्वर ग्रहण कर लेते हैं, जिससे काव्यात्मक आवेग की अपेक्षा कथ्य-प्रधानता अधिक दिखाई देती है।
उदाहरणार्थ—(5) “ऊँचाई पर मत करो, इतना कभी घमंड…” (227) “जाति, धर्म से आदमी, होता नहीं महान…” (232) “पेड़
लगाओ एक तुम, अपनी माँ के नाम…” । इन दोहों में संदेश स्पष्ट और निर्विवाद है, किंतु कविता का सौंदर्य तब और प्रखर होता है जब कथन संकेतात्मक या
व्यंजना-प्रधान हो। यहाँ संदेश प्रत्यक्ष है, जिससे काव्यात्मक सूक्ष्मता कुछ स्थानों पर कम हो जाती है। यह नीति-काव्य की
परंपरा से संगत अवश्य है, पर आधुनिक काव्य-दृष्टि से देखें तो
व्यंजना की संभावनाएँ और विस्तार पा सकती थीं।
2. पुनरुक्ति और भाव-वैविध्य की सीमा: दोहा क्रमांक (213–220) में बेटी-श्रृंखला भावात्मक
रूप से सराहनीय है, किंतु उसमें कथ्य का पुनरावर्तन दृष्टिगोचर होता है।
उदाहरणतः— “बेटी घर की रोशनी…” (216), “इन्द्रधनुष-सी बेटियाँ…”
(215), “गृहमंदिर में बेटियाँ, वेद मंत्र का गान…” (218) । इन सभी दोहों में बेटी को ज्योति, मंगल, सौंदर्य और सांस्कृतिक मर्यादा के प्रतीक के रूप में
प्रस्तुत किया गया है। किंतु भाव-परिसर मुख्यतः पारिवारिक और आदर्शात्मक ही रहता
है। संघर्ष, शिक्षा, आत्मनिर्णय या सामाजिक असमानताओं से
जूझती बेटी का स्वर अपेक्षाकृत अनुपस्थित है। परिणामतः श्रृंखला में काव्य-सौंदर्य
तो है, पर विविधता सीमित प्रतीत होती है।
3. तात्कालिक संदर्भों की समय-सीमा: कुछ दोहे समसामयिक घटनाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े
हैं— “ऑपरेशन सिंदूर…”(244) अथवा “जबसे पहुँचा चाँद पर, अपना यह ‘प्रज्ञान’…” (241) । ऐसे दोहे तत्काल प्रभावशाली और उत्साहवर्धक हैं; वे समय के साथ सीधा संवाद स्थापित करते हैं। परंतु आलोचनात्मक दृष्टि से यह भी
सत्य है कि तात्कालिक संदर्भ कालांतर में धुंधले हो सकते हैं। इससे कृति की
सार्वकालिकता पर सीमित प्रभाव पड़ सकता है। यद्यपि यह समसामयिकता उसकी शक्ति भी है, किंतु स्थायित्व की कसौटी पर यह एक संभावित सीमा बन सकती है।
4. स्त्री-विमर्श का सीमित आयाम: बेटी-केन्द्रित दोहों में स्त्री को अत्यंत सम्मान और
गरिमा दी गई है—“बेटे से इहलोक है, बेटी से परलोक…” (216)। यह
प्रस्तुति सांस्कृतिक दृष्टि से सकारात्मक है, किंतु स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्म-संघर्ष, सामाजिक-राजनीतिक उपस्थिति या स्वायत्त व्यक्तित्व का स्वर अपेक्षाकृत कम
उभरता है। स्त्री मुख्यतः संबंधों (पुत्री, बहू, माँ) के परिप्रेक्ष्य में है; उसकी व्यक्तिगत आकांक्षाएँ या आत्मनिर्णय कम दिखाई देते हैं। आधुनिक
स्त्री-विमर्श की दृष्टि से यह एक सीमित आयाम कहा जा सकता है।
5. शिल्पगत कसाव की असमानता: कुछ स्थानों पर भाषा और लय अत्यंत प्रभावी है—जैसे
(240) “जला-जला कर थक गये…”—पर कुछ दोहों में पद-विन्यास अपेक्षाकृत
गद्यात्मक हो जाता है, जिससे लयात्मक सघनता कुछ शिथिल पड़ती है। दोहा-विधा
में 13-11 मात्रा-गणना के साथ-साथ संक्षिप्तता और मारकता भी अपेक्षित होती है; कुछ दोहों में भाव विस्तार की इच्छा से कसाव थोड़ा कम होता दिखता है।
समग्रतः डॉ. मधुसूदन साहा के दोहा–मुक्तक–संग्रह में विषय-विविधता, नैतिक संवेदन और
समसामयिक चेतना स्पष्ट रूप से झलकती है। संभावित सीमाएँ—जैसे शिक्षात्मकता का
अपेक्षाकृत अधिक होना, भाव-पुनरावर्तन कहीं-कहीं, तात्कालिक
संदर्भों की सीमित समय-सीमा, स्त्री-विमर्श का पारंपरिक दृष्टिकोण तथा कुछ स्थानों
पर शिल्पगत असमानता—निश्चित रूप से रेखांकित की जा सकती हैं। तथापि, नीति-प्रधान
दोहा-परंपरा में उपदेशात्मकता दोष नहीं, बल्कि स्वाभाविक गुण रही है। अतः इन बिंदुओं को कृति
के अवमूल्यन के आधार के रूप में नहीं, बल्कि रचनात्मक विस्तार और भविष्यगत संभावनाओं के
संकेत के रूप में देखा जाना अधिक समीचीन होगा।
यह संग्रह आकस्मिक रचनात्मक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि दोहा–परंपरा
के प्रति दीर्घकालीन साधना, वैचारिक निष्ठा और छंदानुशासन की सजग प्रतिबद्धता का
प्रतिफल है। लेखक के आत्मकथ्य से स्पष्ट है कि वे दोहा को केवल पारंपरिक छंद के
रूप में नहीं, बल्कि भारतीय काव्य–चेतना की सतत प्रवहमान धारा के रूप
में देखते हैं—एक ऐसी धारा, जो आदिकाल से आधुनिक युग तक अपनी जीवंतता बनाए हुए है।
आलोचनात्मक दृष्टि से कहा जा सकता है कि कृति में वैचारिक ऊर्जा और नैतिक
प्रतिबद्धता प्रबल हैं। यदि व्यंजना-गाम्भीर्य, विषय-विस्तार और
शिल्प-कसाव में और अधिक सघनता जोड़ी जाए, तो इसकी प्रभाव-क्षमता और दीर्घजीवी स्थायित्व और भी
मजबूत हो सकता है।
डॉ. साहा के दोहा–मुक्तक जीवन के विविध आयामों—भक्ति, नीति, राजनीति, स्त्री-मर्यादा, पर्यावरण-संवेदना, सामाजिक विडंबना, सांस्कृतिक
अस्मिता और आत्मानुशासन—को स्पर्श करते हैं। इनमें काव्य की प्रांजलता, लोक-संवेदना की
ऊष्मा और समय-बोध की स्पष्ट झलक है।
यद्यपि कहीं-कहीं उपदेशात्मक स्वर और भाव-पुनरुक्ति दृष्टिगोचर होती है, समग्र रूप से यह
संग्रह समकालीन हिंदी दोहा-विधा की एक सार्थक और सजग अभिव्यक्ति के रूप में उभरता
है—जहाँ परंपरा की जड़ें गहरी हैं और वर्तमान का आकाश खुला।
इस प्रकार यह कृति दोहा–मुक्तक को केवल छंदाभ्यास के रूप में नहीं, बल्कि जीवनानुभवों
के संवेदनशील “संवाद” के रूप में प्रतिष्ठित करती है।
मैं डॉ. मधुसूदन साहा जी के सुदीर्घ स्वस्थ जीवन और निरंतर सृजनशीलता की कामना
करता हूँ।
शुभकामनायें!
पुस्तक: पल भर का मृदु प्यार
(दोहामुक्तक संग्रह)
प्रथम संस्करण – 2025
कवि: डॉ. मधुसूदन साहा
प्रकाशक: Anybook
मूल्य: 250 रूपये
‘चंद्रप्रभा
विला’
417, रॉयल रेजीडेंसी- प्रथम फेस,
सारंगपुरा, बड के बालाजी,
अजमेर रोड, जयपुर- 302042