यात्रा-वृत्तांत : नवगीत, इतिहास और आस्था का त्रिवेणी संगम - अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
यात्रा-वृत्तांत : नवगीत, इतिहास और आस्था का त्रिवेणी संगम
- अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
साहित्य, इतिहास और लोकआस्था—ये तीनों भारतीय सांस्कृतिक चेतना के ऐसे आधारस्तंभ हैं, जिनके समन्वय से किसी भी अनुभव को बहुआयामी अर्थवत्ता प्राप्त होती है। जब ये तत्त्व किसी यात्रा के प्रसंग में एकत्र होते हैं, तब वह यात्रा मात्र भौगोलिक गमन न रहकर एक गहन सांस्कृतिक, बौद्धिक और आत्मानुभूतिक प्रक्रिया का रूप धारण कर लेती है। यात्रा-वृत्तांत की विधा इसी बहुस्तरीय अनुभव की सशक्त अभिव्यक्ति है, जिसमें दृश्य-परिदृश्य के साथ ऐतिहासिक बोध, सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मानुभूति का सूक्ष्म अंतर्संबंध उद्घाटित होता है। इस दृष्टि से यात्रा-वृत्तांत केवल वर्णनात्मक साहित्य नहीं, बल्कि समय, समाज और संवेदना के अंतःसंवाद का जीवंत दस्तावेज भी है।
एतदर्थ, मुजफ्फरपुर, वैशाली और सीतामढ़ी की सांस्कृतिक भूमि इस त्रिस्तरीय अनुभव के लिए अत्यंत उपयुक्त परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। मुजफ्फरपुर समकालीन हिंदी साहित्य, विशेषतः नवगीत परंपरा की सृजनात्मक ऊष्मा का प्रतिनिधि नगर है। यह नगर केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत साहित्यिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है, जहाँ साहित्य सृजन, संवाद और सांस्कृतिक चेतना का सक्रिय माध्यम है। यहाँ की साहित्यिक परंपरा में नवगीत आंदोलन को विशेष ऊर्जा प्राप्त हुई है, जिसने आधुनिक संवेदनाओं को लोकजीवन और सामाजिक यथार्थ से जोड़ते हुए अभिव्यक्ति के नए आयाम निर्मित किए हैं।
दूसरी ओर, वैशाली भारतीय इतिहास में एक अद्वितीय स्थान रखता है। यह प्राचीन लिच्छवि गणसंघ की राजधानी रहा, जिसे विश्व के प्रारंभिक गणतांत्रिक व्यवस्थाओं में गिना जाता है। यहाँ का राजनीतिक ढांचा न केवल भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की जड़ों को उद्घाटित करता है, बल्कि सामूहिक निर्णय और जनभागीदारी की ऐतिहासिक चेतना को भी प्रमाणित करता है। वैशाली बौद्ध और जैन दर्शन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है—यहाँ गौतम बुद्ध ने अपने अंतिम उपदेशों में से एक दिया था तथा महावीर स्वामी का भी इस क्षेत्र से गहरा संबंध रहा है। इस प्रकार वैशाली में अतीत केवल इतिहास की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान में भी जीवित सांस्कृतिक उपस्थिति के रूप में अनुभव किया जा सकता है।
वहीं सीतामढ़ी मिथिला की लोकआस्था, पौराणिक परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों का केंद्र है। यह स्थान सीता के जन्मस्थल के रूप में प्रतिष्ठित है, जिनका चरित्र भारतीय नारी आदर्श, त्याग, मर्यादा और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है। यहाँ की लोकसंस्कृति, भाषा, गीत और अनुष्ठानों में सीता की कथा आज भी जीवंत है। मिथिला की यह आस्था केवल धार्मिक भाव नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक व्यवहार का अभिन्न अंग है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित होती रही है।
दिनांक 12 से 14 मार्च 2026 के मध्य सम्पन्न यह यात्रा वस्तुतः इन तीनों स्थलों के माध्यम से एक ‘त्रिवेणी-संगम’ के अनुभव के रूप में अभिव्यक्त होती है, जिसमें साहित्य की संवेदनात्मक गहराई, इतिहास की कालजयी स्मृति और लोकआस्था की आध्यात्मिक ऊष्मा एक साथ प्रवाहित होती हैं। यह यात्रा केवल स्थानों का अनुक्रमिक अवलोकन नहीं, बल्कि उन सांस्कृतिक तंतुओं की अनुभूति भी है, जो भारतीय जीवन-दृष्टि को निरंतरता प्रदान करते हैं।
इस यात्रा का एक विशेष आयाम (और निमित्त भी) वरिष्ठ नवगीतकार आदरणीय श्री शिवानंद सहयोगी जी की द्वारा संपादित समकालीन नवगीत संकलन ‘नवगीत अर्धशतक : भाग–2’ का लोकार्पण (विमोचन) रहा। इस आयोजन ने मुजफ्फरपुर की साहित्यिक परंपरा को न केवल समृद्ध किया है, बल्कि नवगीत जैसी महत्वपूर्ण काव्यधारा को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य भी किया है।
अतः यह त्रि-दिवसीय यात्रा-वृत्तांत केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज है—जहाँ मुजफ्फरपुर की साहित्यिक चेतना, वैशाली का ऐतिहासिक वैभव और सीतामढ़ी की लोकआस्था परस्पर आलोकित होते हुए एक व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का सृजन करते हैं। यह बाह्य यथार्थ और अंतःसंवेदना के समन्वय का ऐसा अनुभव-संसार प्रस्तुत करता है, जो पाठक को न केवल ज्ञानात्मक रूप से समृद्ध करता है, बल्कि उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी गहरे स्तर पर जोड़ता है।
12 मार्च 2026: मुजफ्फरपुर — शब्दों का उत्सव, परंपरा का आलोक
यात्रा का प्रथम पड़ाव मुजफ्फरपुर रहा—एक ऐसा नगर, जहाँ प्रसिद्ध शाही लीची की मिठास के साथ हिंदी साहित्य की सशक्त परंपरा की गहन सुगंध भी व्याप्त है। यहाँ पहुँचते ही यह अनुभव सहज ही होने लगता है कि यह नगर केवल कृषि-समृद्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि एक जीवंत साहित्यिक चेतना का केंद्र भी है।
ललित नारायण तिरहुत महाविद्यालय के ‘गीतांगिनी सभागार’ में आयोजित ‘नवगीत उत्सव’ ने इस यात्रा को एक ऊर्जस्वित साहित्यिक आरंभ प्रदान किया। कार्यक्रम का केंद्रीय आकर्षण वरिष्ठ नवगीतकार श्री शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ द्वारा संपादित “नवगीत अर्धशतक : भाग–2” का विमोचन रहा, जिसने समकालीन नवगीत धारा की सृजनात्मक निरंतरता को रेखांकित किया। इसी अवसर पर मुझे ‘आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री गीत सम्मान’ से सम्मानित किया जाना न केवल व्यक्तिगत रूप से गौरवपूर्ण रहा, बल्कि यह मुजफ्फरपुर की साहित्यिक आत्मीयता का सजीव प्रमाण भी बना—एतदर्थ इस नगर के प्रति हार्दिक आभार।
यह आयोजन हिंदी गीत परंपरा के महान पुरोधाओं—आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री, राजेन्द्र प्रसाद सिंह और शांति सुमन—की स्मृति को नमन करने का अवसर भी बना। साथ ही, मुजफ्फरपुर की समृद्ध साहित्यिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय रचनाकारों—रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, अवधेश्वर अरुण, रामजीवन शर्मा ‘जीवन’, रेवती रमण, राम इक़बाल सिंह ‘राकेश’, श्याम नंदन किशोर तथा शिवदास पांडेय—का सादर स्मरण किया गया। इस स्मरण-क्रम ने वातावरण को परंपरा और समकालीनता के सेतु से आलोकित कर दिया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘नवगीत के उद्भव और विकास’ विषय पर गंभीर और बहुआयामी विमर्श हुआ। नोएडा से आईं भावना तिवारी ने नवगीत में स्त्री लेखन की पर्याप्त स्वीकृति की आवश्यकता पर बल दिया। रामशंकर वर्मा ने सरलता को नवगीत की प्रमुख शक्ति बताया।
लखनऊ–सीतापुर से पधारे सुप्रसिद्ध साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं हिंदी के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार में सक्रिय डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ जी ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में यह महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किया कि—“संवेदना का मूल स्वर कालातीत होता है—परिवर्तन केवल अभिव्यक्ति की शैली में आता है।”
आप लगभग तीन दशकों से अधिक के समृद्ध अध्यापन अनुभव, हिंदीतर एवं विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी भाषा-साहित्य के शिक्षण, तथा ‘इंदु संचेतना’ जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के प्रधान संपादन से जुड़े डॉ. गुणशेखर हिंदी के व्याकरण, शब्दकोश निर्माण, भाषा-शिक्षण पद्धति और सृजनात्मक साहित्य—सभी क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान के लिए सुविख्यात हैं। उनके इस कथन ने न केवल साहित्य की शाश्वतता को रेखांकित किया, बल्कि नवगीत सहित समकालीन काव्य-विधाओं की अभिव्यक्तिगत विविधता को भी सार्थक संदर्भ प्रदान किया।
प्रयागराज से डॉ. भुवनेश्वर दुबे ने नवगीत को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की आवश्यकता रेखांकित की और इसके पठन-संकट की ओर ध्यान आकर्षित किया। वहीं लखनऊ से राजेंद्र वर्मा ने शिल्प और भाषा की सौंदर्यपरकता को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि बुरहानपुर से वीरेंद्र निर्झर ने नवगीत में संवेदना को अनिवार्य तत्व के रूप में स्थापित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में वाराणसी से पधारे समालोचक डॉ. राम सुधार सिंह ने एक अत्यंत विचारोत्तेजक टिप्पणी करते हुए कहा—“कविता जब पाठ्यक्रम में शामिल हो जाती है, तो वह ‘सधवा’ की तरह प्रतिष्ठित हो उठती है; और जो उसमें स्थान नहीं बना पाती, वह ‘विधवा’ की भाँति उपेक्षित रह जाती है।” यह कथन नवगीत की वर्तमान स्थिति तथा उसकी संभावनाओं पर एक तीक्ष्ण और मार्मिक टिप्पणी के रूप में सामने आया, जो वस्तुतः डॉ. भुवनेश्वर दुबे के विचार का ही एक प्रकारांतर विस्तार है।
इस अवसर पर मुझे भी अपने विचार रखने का अवसर प्राप्त हुआ, जिसमें मैंने छठी शताब्दी से लेकर वीरगाथा काल, भक्ति काल, रीति काल और आधुनिक काल तक की साहित्यिक परंपराओं के आलोक में नवगीत की समयसापेक्ष प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास किया।
इसके पूर्व, पुस्तक-विमोचन के प्रथम सत्र में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आदरणीय श्री वीरेन्द्र आस्तिक जी ने ‘गीतांगिनी’ और नवगीत के उद्भव एवं विकास पर विचार रखते हुए कहा कि—“हम उस इतिहास को जीवित रखे हुए हैं, जिसे कभी हमारे ही कुछ साथियों द्वारा विलोपित करने का प्रयास किया गया था। किंतु हम नवगीतकारों ने उस इतिहास को विस्मृत नहीं होने दिया। वह इतिहास है—‘गीतांगिनी’ का, जो नवगीत का प्रथम संकलन था, और जिसके प्रवर्तक थे राजेंद्र प्रसाद सिंह।”
उन्होंने आगे कहा कि “गीतांगिनी में गीतों में नवीनता का उद्घोष है। नवीनता का जन्म परंपरा की कोख से होता है, किंतु जैसे-जैसे नवीनता प्रचलित होती है, परंपरा स्वतः छूटती जाती है। अतः यदि हम निरंतर नवीनता को नहीं अपनाएँगे, तो नवगीत भी परंपरा में रूपांतरित हो जाएगा—इसलिए नवीनता का जागरूक बने रहना आवश्यक है।”
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि “भाषा समय के साथ बदलती है।” इसी संदर्भ में उन्होंने राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा प्रतिपादित नवगीत के पंचतत्व—जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व एवं परिसंचय—का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि ‘गीतांगिनी’ में संकलित गीतों का चयन इन्हीं तत्वों की कसौटी पर किया गया था। ध्यातव्य है कि यहाँ ‘दर्शन’ नहीं, बल्कि ‘जीवन-दर्शन’ की संकल्पना को प्रमुखता दी गई है। वस्तुतः यही वह निर्णायक बिंदु है, जो नवगीत को मात्र निजी अनुभूति तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे व्यापक मानवीय संदर्भों और सामाजिक यथार्थ की ओर उन्मुख करता है।
सायंकालीन काव्यगोष्ठी में रचनात्मकता अपने उत्कर्ष पर दिखाई दी। विविध कवियों की प्रस्तुतियों ने यह प्रमाणित किया कि नवगीत केवल एक काव्य-विधा नहीं, बल्कि समकालीन जीवन की जटिल संवेदनाओं का सशक्त और जीवंत स्वर है।
इस पूरे आयोजन को विशिष्ट और गरिमामय बनाने में श्री सुरेश कुमार शर्मा जी का सहयोग उल्लेखनीय रहा, जो बिहार सरकार में शहरी विकास एवं आवास मंत्री के रूप में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। साथ ही महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. ममता रानी जी का आत्मीय आतिथ्य विशेष रूप से सराहनीय रहा। उनका सौहार्दपूर्ण व्यवहार और उत्कृष्ट व्यवस्थापन कार्यक्रम की सफलता का सुदृढ़ आधार बना।
डॉ. संजय पंकज जी, जो साहित्य, शिक्षा और समसामयिक विमर्श के क्षेत्र में सक्रिय चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उनके कुशल संचालन ने कार्यक्रम को न केवल वैचारिक ऊँचाई प्रदान की, अपितु संपूर्ण समय-व्यवस्था को एकाग्र और सुसंगठित बनाए रखने का अभूतपूर्व कार्य भी किया।
इसी प्रकार शिक्षाविद एवं विद्वान डॉ. रणजीत पटेल ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति और सहभागिता से आयोजन को समृद्ध किया।
इनके अतिरिक्त अन्य गणमान्य सहयोगियों का सक्रिय सहयोग और सहभागिता इस आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण रहा, जिसके कारण यह कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन न रहकर एक सार्थक साहित्यिक-सांस्कृतिक संवाद में परिवर्तित हो सका।रात्रि विश्राम के लिए भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्त अधिकारी श्री शशांक शेखर के आवास पर जो आत्मीयता और अपनत्व प्राप्त हुआ, वह अविस्मरणीय है। उनके द्वारा स्थापित ‘प्रशांत मेमोरियल चैरिटेबल अस्पताल’ समाजसेवा की भावना का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने अपने प्रिय प्रशांत की स्मृति में एक प्रतीक-चिह्न भेंट कर इस आत्मीय संबंध को और अधिक भावपूर्ण बना दिया।
इस प्रकार मुजफ्फरपुर का यह प्रथम दिवस केवल एक साहित्यिक आयोजन भर नहीं रहा, बल्कि परंपरा, संवेदना और आत्मीयता के ऐसे समन्वित अनुभव में परिवर्तित हो गया, जिसने पूरी यात्रा की दिशा और भावभूमि को एक सशक्त आधार प्रदान किया।
13 मार्च 2026: वैशाली — इतिहास की जीवित चेतना
दूसरे दिन यात्रा पहुँची वैशाली—एक ऐसा स्थल, जहाँ भारतीय इतिहास की प्राचीन स्मृतियाँ आज भी जीवित अनुभव के रूप में स्पंदित होती हैं। यहाँ पहुँचते ही यह अनुभूति सघन हो उठती है कि अतीत केवल बीत चुका समय नहीं, बल्कि वर्तमान के भीतर सक्रिय एक सांस्कृतिक चेतना है, जो हर दृश्य, हर ध्वनि और हर स्थल-विशेष में महसूस की जा सकती है।
इस आगमन पर भाई सुगंध जी का आत्मीय स्वागत विशेष रूप से स्मरणीय रहा। उनके सौहार्दपूर्ण व्यवहार और सटीक, संवेदनापूर्ण स्थल-विश्लेषण ने इस प्रवास को केवल पर्यटन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और बौद्धिक अनुभव का जीवंत अवसर बना दिया। उनके मार्गदर्शन से यह स्पष्ट हुआ कि इतिहास केवल तथ्य नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जिसे अनुभव, संवाद और ध्यान के माध्यम से ही पूरी तरह समझा जा सकता है।
यात्रा का प्रथम पड़ाव वैशाली के ऐतिहासिक परिसर में हुआ, जहाँ प्राचीन बौद्ध स्तूपों के अवशेष और सम्राट अशोक द्वारा स्थापित ‘अशोक स्तंभ’ आज भी गौरवशाली अतीत के मौन साक्षी बने खड़े हैं। विस्तृत और शांत वातावरण में स्थित यह स्थल मानो समय की परतों को उद्घाटित करता है। यहाँ खड़े होकर सहज ही कल्पना की जा सकती है कि कभी यही भूमि गौतम बुद्ध के उपदेशों और अनुशासन की अनुगूँज से आलोकित रही होगी, और यह वही भूमि थी जहाँ उन्होंने अपने महापरिनिर्वाण की ओर अग्रसर होने से पूर्व अंतिम उपदेश दिए।
वैशाली को विश्व के प्राचीनतम गणराज्यों में स्थान प्राप्त है। यहाँ लिच्छवि गणसंघ की शासन-व्यवस्था सामूहिक निर्णय, संवाद और सहभागिता पर आधारित थी—आधुनिक लोकतंत्र की मूल भावना का प्रारंभिक स्वरूप। यह भूमि इस तथ्य की साक्षी है कि भारतीय सभ्यता में जनतांत्रिक चेतना की जड़ें अत्यंत गहरी और प्राचीन रही हैं। भाई सुगंध जी ने बताया कि इस क्षेत्र में अनियंत्रित खुदाई पर प्रतिबंध है, क्योंकि भूमि के गर्भ में आज भी प्राचीन सभ्यता के अवशेष सुरक्षित रूप में विद्यमान हैं। उन्होंने यह भी साझा किया कि जब-जब यहां खुदाई हुई, तब-तब ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएँ और संरचनाएँ प्राप्त हुई हैं, जो वैशाली की समृद्ध पुरातात्त्विक विरासत का प्रमाण हैं। यह तथ्य इस क्षेत्र की ऐतिहासिक गहनता और निरंतर जीवित संस्कृति को और स्पष्ट रूप से उद्घाटित करता है।
वैशाली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। गौतम बुद्ध ने यहाँ अनेक बार प्रवास किया, अपने उपदेशों से जनमानस को आलोकित किया और जीवन के अंतिम चरण में यहीं से कुशीनगर की ओर प्रस्थान किया। यह वही भूमि है जहाँ उन्होंने अपने महापरिनिर्वाण के निकट होने का संकेत दिया—एक ऐसा क्षण, जो बौद्ध परंपरा में करुणा, वैराग्य और सम्यक दृष्टि की चरम अभिव्यक्ति माना जाता है।
इसी प्रकार, महावीर स्वामी का संबंध भी वैशाली और उसके आसपास के क्षेत्र से अत्यंत गहरा है। उनका जन्म वैशाली के समीप स्थित कुंडग्राम में हुआ माना जाता है। लिच्छवि गणसंघ के सांस्कृतिक परिवेश में पले-बढ़े महावीर ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात इसी क्षेत्र को अपने उपदेशों का प्रमुख केंद्र बनाया। यहाँ उन्होंने अनेक चातुर्मास व्यतीत किए और अहिंसा, अपरिग्रह तथा सत्य जैसे सिद्धांतों का व्यापक प्रसार किया। यह स्थल केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी उनके जीवन और उपदेशों का एक सजीव प्रमाण प्रस्तुत करता है।
वैशाली का ऐतिहासिक वैभव सम्राट अशोक द्वारा स्थापित अशोक स्तंभ में आज भी साकार रूप में देखा जा सकता है, जो इस क्षेत्र की बौद्ध विरासत का सशक्त प्रतीक है। साथ ही, यहीं आयोजित द्वितीय बौद्ध संगीति ने बौद्ध धर्म के संगठनात्मक स्वरूप को स्थिरता और दिशा प्रदान की—यह घटना वैशाली को बौद्ध इतिहास में एक केंद्रीय स्थान प्रदान करती है।
इतिहास के इन उज्ज्वल आयामों के बीच समकालीन अनुभवों ने इस यात्रा को और भी अधिक आत्मीय, जीवंत और प्रेरक बना दिया। बुद्धा वर्ल्ड स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों के सम्मुख हमें जो सम्मान मिला, वह केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि भविष्य की संभावनाओं से भरे उन कोमल मनों के साथ एक गहरा संवाद भी था। यहाँ आयोजित काव्य गोष्ठी ने इस संवाद को सार्थक दिशा दी। डॉ. राम सुधार सिंह जी ने बच्चों के समक्ष शिक्षा, जीवन-दृष्टि और आत्मनिर्माण के महत्त्व को अत्यंत सरल किंतु प्रभावी ढंग से रखा, मानो वे उनके भीतर सुप्त संकल्पों को जगाने का आह्वान कर रहे हों।
इसी क्रम में वरिष्ठ नवगीत कवि एवं आलोचक श्री वीरेंद्र आस्तिक जी द्वारा प्रस्तुत गीत ने वातावरण को एक नई ऊँचाई प्रदान की। “मैं कहता हूँ, तुम कुछ समझो…” जैसे आह्वान से आरम्भ होकर यह गीत आत्मविश्वास, संकल्प और कर्मशीलता का जो संदेश देता है, वह सीधे विद्यार्थियों के मन में उतरता हुआ प्रतीत हुआ। गीत की पंक्तियाँ—“पहले खुद का विश्वास बनो”, “सीखो सपनों को सच करना”, और “तुम खिलते हुए पलाश बनो”—मानो उसी क्षण वहाँ उपस्थित हर श्रोता को अपने भीतर झाँकने और स्वयं को गढ़ने के लिए प्रेरित कर रही थीं। आपके अतिरिक्त डॉ. भावना तिवारी, राम शंकर वर्मा ने भी अपने काव्यपाठ से वातावरण को रससिक्त किया।
इस प्रकार, यह पूरा अनुभव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन भर नहीं रहा, बल्कि इतिहास की गरिमा, वर्तमान की चेतना और भविष्य की संभावनाओं के बीच एक सजीव सेतु बन गया, जहाँ शब्द केवल कहे नहीं गए—वे जीए गए, और आगे बढ़ने की दिशा बनकर उभरे।
संस्थान के प्रेरक व्यक्तित्व श्री कृष्ण कुमार जी की दूरदृष्टि और विनम्रता विशेष रूप से प्रेरक रही। उनका यह विश्वास कि शिक्षा केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि संस्कार और संस्कृति के संवहन का माध्यम है—संस्थान के वातावरण में पूरी तरह साकार प्रतीत हुआ। दोपहर की सुस्वाद भोजन व्यवस्था ने इस अनुभव को और भी आरामदायक और आत्मीय बना दिया।
इसी क्रम में श्री कृष्ण कुमार जी एवं सुगंध कुमार जी द्वारा बिहार सरकार के सहयोग से निर्मित नव-विकसित बुद्ध स्मारक का भ्रमण कराया गया। यह स्मारक वैशाली की बौद्ध विरासत को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करने का एक सार्थक प्रयास है। नव-निर्मित परिसर में बुद्ध के जीवन, उनके उपदेशों तथा वैशाली से उनके गहरे संबंध को समकालीन प्रस्तुति-शैली में सजीव किया गया है। परिणामस्वरूप यह स्थल न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन रहा है, बल्कि विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भी अध्ययन और अनुसन्धान का महत्त्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। यह पहल स्पष्ट संकेत देती है कि अतीत की धरोहर को वर्तमान की चेतना से जोड़कर ही उसे जीवंत बनाए रखा जा सकता है। इस परियोजना को साकार रूप में लाने के लिए यहाँ की जनता और विशेषतः श्री कृष्ण कुमार जी के प्रयास प्रणम्य हैं।
वैशाली के स्तूपों, पुरातात्त्विक अवशेषों और विस्तृत ऐतिहासिक परिसर में विचरण करते हुए बार-बार ऐसा प्रतीत हुआ कि अतीत और वर्तमान सतत संवाद कर रहे हैं। यहाँ इतिहास केवल शिलालेखों में अंकित नहीं, बल्कि वातावरण में व्याप्त है; धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति के रूप में स्पंदित होता है।
इस प्रकार वैशाली का यह प्रवास केवल ऐतिहासिक स्थलों का अवलोकन नहीं रहा, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक अनुभूति के रूप में अंतर्मन में उतरता चला गया—जहाँ गौतम बुद्ध की करुणा, महावीर स्वामी की तपस्या और प्राचीन गणतांत्रिक चेतना की अनुगूँज एक साथ अनुभव होती है। यह दिन वास्तव में उस जीवित इतिहास का साक्षात्कार था, जो समय की सीमाओं से परे आज भी मानव-चेतना को आलोकित करता है।
वापसी के समय, सायंकाल मुजफ्फरपुर स्थित रामकृष्ण मिशन आश्रम में बिताए गए क्षणों ने इस दिन को एक विशिष्ट आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। आश्रम का वातावरण—सादगी, सेवा और शांति से परिपूर्ण—मन को गहराई तक स्पर्श करता है। ऐसा प्रतीत हुआ मानो दिनभर का ऐतिहासिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक अनुभव संध्या की इस शांति में आत्मिक संतुलन प्राप्त कर रहा हो। आश्रम में प्राप्त आतिथ्य अत्यंत आत्मीय और अलौकिक अनुभव रहा। भोजन उपरांत, स्वामी जी ने परिसर का मार्गदर्शित भ्रमण कराया और आश्रम द्वारा संचालित विभिन्न सेवा कार्यों, सामाजिक और शैक्षिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी साझा की, जिससे न केवल आश्रम की कार्य-प्रणाली की गहन समझ हुई, बल्कि सेवा और साधना के समन्वय से उत्पन्न आध्यात्मिक प्रभाव भी प्रत्यक्ष अनुभव हुआ।
14 मार्च 2026: सीतामढ़ी — आस्था, लोकविश्वास और सांस्कृतिक स्मृति
अनेक सदस्यों के प्रस्थान कर जाने के कारण आज की टीम अपेक्षाकृत संक्षिप्त रह गई थी। इसमें डॉ. राम सुधार सिंह जी, वीरेन्द्र आस्तिक जी, डॉ. संजय पंकज जी, शिवानन्द सिंह सहयोगी जी (धर्मपत्नी सहित), डॉ. भुवनेश्वर दुबे एवं डॉ. भावना तिवारी सम्मिलित थे।
इस दिन की यात्रा का प्रथम पड़ाव था—कीर्तिशेष आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री का निवास ‘निराला निकेतन’। यहाँ पहुँचते ही उनकी विरासत के चिह्न सहज ही दृष्टिगोचर होने लगते हैं। परिसर में एक पृथक कक्ष भी निर्मित है, जिसके विषय में बताया गया कि वह कभी पृथ्वीराज कपूर के आगमन पर बनवाया गया था। निकेतन के समीप स्थित विशाल वटवृक्ष, जिसकी लटकती वटों (प्रपोषी जड़ें) को सहज ही स्पर्श किया जा सकता है, एक अद्भुत दृश्य उपस्थित करता है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय यह तथ्य रहा कि आचार्य शास्त्री जी ने अपनी सभी गायों की विधिवत समाधियाँ बनवाई थीं—उन्हें यूँ ही त्याग नहीं दिया गया। यह उनके संवेदनशील और करुणाशील व्यक्तित्व का जीवंत प्रमाण है। यहाँ तक कि उनके दो कुत्तों की भी समाधियाँ भी निर्मित थीं।
निराला निकेतन का अवलोकन करते हुए यह अनुभूति गहराई तक उद्वेलित करती है कि शास्त्री जी की इस धरोहर को संरक्षित और सुव्यवस्थित किए जाने की अत्यंत आवश्यकता है। यहाँ उनके द्वारा संपादित ‘वेला’ पत्रिका भी देखने को मिली, किंतु पुस्तकें, चित्र और अन्य सामग्री अपेक्षाकृत अव्यवस्थित अवस्था में पाई गईं—जो संरक्षण के स्तर पर गंभीर ध्यान की अपेक्षा रखती हैं।
इस अवसर पर उनकी नातिन डॉ. रश्मि मिश्रा ने उनके दो-तीन गीतों का सस्वर पाठ कर वातावरण को भावविभोर कर दिया। वहीं उनकी पुत्री शैलबाला जी का सान्निध्य अत्यंत आत्मीय और अविस्मरणीय अनुभव का कारण बना।
इस स्थल से विदा लेते समय मन में एक ओर गहरी प्रसन्नता थी, तो दूसरी ओर विरासत की उपेक्षा का भाव कहीं न कहीं खिन्नता भी उत्पन्न कर रहा था।
इसके उपरांत यात्रा का अगला पड़ाव था—सीतामढ़ी—मिथिला की पावन भूमि, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह वही क्षेत्र है, जहाँ प्राचीन भारतीय परंपरा में वर्णित विदेह साम्राज्य का केंद्र स्थित था और जहाँ राजा जनक ने न केवल राजसत्ता का संचालन किया, बल्कि दार्शनिक और सामाजिक चेतना को भी समृद्ध किया।
ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल, मोरसंड (रुन्नीसैदपुर)
यात्रा का अगला चरण ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल, मोरसंड में प्रारंभ हुआ। संस्थापक-निदेशक डॉ. रामभद्र ने अतिथियों का हार्दिक स्वागत करते हुए चादर एवं स्मृति-चिह्न भेंट किए। इस अवसर पर आदरणीय श्री विमल कुमार परिमल तथा डॉ. आशा कुमारी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को और प्रभावशाली बना दिया।
विद्यालय में अतिथि गीतकारों एवं साहित्यिक प्रतिनिधियों को मिथिला की जीवंत सांस्कृतिक परंपरा से परिचित कराया गया। भोजन एवं नाश्ते की उत्कृष्ट व्यवस्था ने पूरे आयोजन को सहज, सुसंगठित और सुखद बना दिया। यहीं से यात्रा दल पंथपाकर के लिए प्रस्थान करता है।
पंथपाकर (माँ जानकी डोली स्थल)
पंथपाकर, जिसे ‘जानकी डोली स्थल’ भी कहा जाता है, मिथिला की लोक-आस्था और पौराणिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। लोकविश्वास के अनुसार विवाहोपरांत माता सीता अयोध्या जाते समय अपनी डोली सहित यहाँ कुछ समय के लिए ठहरी थीं। पाँच वृक्षों की छाया में स्थित यह स्थल आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।
यह स्थान केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मिथिला की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक है। यहाँ की लोकपरंपराएँ—विवाह, गीत, रीति-रिवाज—सीता के आदर्शों जैसे त्याग, धैर्य और मर्यादा से गहराई से जुड़ी हैं। मान्यता यह भी है कि इसी क्षेत्र में परशुराम और भगवान राम का साक्षात्कार हुआ था।
इस यात्रा को आत्मीय बनाने में विमल कुमार परिमल तथा युवा पत्रकार आग्नेय का स्नेहिल आतिथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उनकी सहजता, अपनत्व और मार्गदर्शन ने यह अनुभूति कराई कि मिथिला केवल परंपरा की ही नहीं, बल्कि हृदय की भी अत्यंत समृद्ध भूमि है। इस क्रम में विमल कुमार परिमल द्वारा उनकी पुस्तक का सप्रेम प्रदान किया जाना इस यात्रा के लिए एक विशिष्ट और स्मरणीय संस्मरण बन गया—मानो इस पूरे अनुभव को शब्दों में संजो देने का एक आत्मीय प्रयास।
यहाँ डॉ. राम सुधार सिंह, शिवानन्द सिंह सहयोगी (धर्मपत्नी सहित) तथा डॉ. भुवनेश्वर दुबे बनारस/प्रयागराज के लिए प्रस्थान कर गए, जबकि शेष दल ने आगे की यात्रा जारी रखी।
सीता जन्मभूमि—पनौराधाम
यात्रा का केंद्रीय और भावनात्मक पड़ाव था—सीता जन्मभूमि, पनौराधाम। पौराणिक कथा के अनुसार, मिथिला में पड़े भीषण अकाल के समय राजा जनक ने यज्ञ के उपरांत स्वयं भूमि की जुताई की। उसी दौरान हल की फाल से एक दिव्य बालिका प्रकट हुई, जिन्हें ‘सीता’ नाम दिया गया।
मंदिर में दर्शन करते हुए एक गहन आध्यात्मिक अनुभूति होती है। यह स्थल केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी के आदर्श—त्याग, शील, धैर्य और मर्यादा—का सजीव प्रतीक है।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- विदेह साम्राज्य का केंद्र – यह क्षेत्र प्राचीन विदेह जनपद का अंग रहा, जहाँ ज्ञान, दर्शन और सामाजिक चेतना का उत्कर्ष हुआ।
- सीता की जन्मस्थली – रामायण के अनुसार माता सीता का प्राकट्य यहीं हुआ।
- लोकसंस्कृति का केंद्र – मिथिला की भाषा, लोकगीत और सामाजिक परंपराओं में सीता के आदर्शों की गहरी छाप है।
- आध्यात्मिक अनुभव – मंदिर परिसर, पौराणिक कथा और स्थानीय मार्गदर्शन एक गहन आत्मिक संतुलन प्रदान करते हैं।
इस प्रकार, सीतामढ़ी का यह प्रवास केवल स्थलों के अवलोकन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयामों से युक्त एक समग्र अनुभव बनकर उभरा। यह अनुभव इस सत्य को पुनः स्थापित करता है कि मिथिला की भूमि आज भी अतीत की स्मृतियों को संजोए हुए वर्तमान में जीवन-मूल्यों को सजीव रूप से अभिव्यक्त कर रही है।
वापसी : अनुभवों का अविराम आलोक
तीन दिनों की यह यात्रा समाप्त होकर भी मानो समाप्त नहीं होती; उसके स्पंदन अब भी भीतर कहीं गूँजते रहते हैं। मुजफ्फरपुर की साहित्यिक ऊष्मा, वैशाली का ऐतिहासिक वैभव और सीतामढ़ी की आस्था—ये तीनों अनुभव एक साथ मन में इस प्रकार जीवित हो उठते हैं कि वे एक दीर्घकालिक संवेदनात्मक आलोक का निर्माण करने लगते हैं। यह आलोक केवल स्मृतियों का नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर जागृत होते उस गहन बोध का है, जो मनुष्य को अपने समय, समाज और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।
जयपुर लौटते समय यह अनुभूति और भी प्रगाढ़ होती चली गई कि साहित्य केवल शब्दों का विन्यास या सृजन मात्र नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के मध्य एक सशक्त, जीवंत और अनश्वर सेतु है—जो समय, स्थान और व्यक्ति को एक ही सूत्र में बाँधकर उन्हें एक व्यापक मानवीय परिप्रेक्ष्य में प्रतिष्ठित करता है। इस यात्रा ने मानो यह प्रत्यक्ष अनुभव करा दिया कि जब शब्द जीवन से जुड़ते हैं, तो वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, बल्कि अनुभव का जीवंत विस्तार बन जाते हैं।
इस संपूर्ण यात्रा की सफलता, आत्मीयता और गरिमा के केंद्र में यदि किसी व्यक्तित्व की सर्वाधिक सक्रिय, प्रेरक और ऊर्जा-संचारक उपस्थिति अनुभव हुई, तो वे समकालीन नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर आदरणीय डॉ. संजय पंकज रहे। अपनी रचनात्मक संवेदना, कुशल संचालन-शैली और सुसंगठित प्रबंधन-दृष्टि के माध्यम से उन्होंने इस यात्रा को मात्र एक औपचारिक आयोजन न रहने देकर उसे एक जीवंत, ऊर्जस्वित और सांस्कृतिक अनुभव में रूपांतरित कर दिया। उनके व्यक्तित्व में निहित लोक-जीवन की सहजता, समय-बोध और अभिव्यक्ति की पारदर्शिता ने पूरे प्रवास को विशेष ऊँचाई, व्यापकता और आत्मीयता प्रदान की। वस्तुतः उनका समर्पण, सूक्ष्म दृष्टि और सृजनात्मक दृष्टिकोण ही इस यात्रा की आत्मा के रूप में अनुभूत हुआ, जिसने प्रत्येक सहभागी को भीतर तक स्पर्श किया।
इस संदर्भ में गीत-विधा के गंभीर अध्येता एवं सर्जक आदरणीय डॉ. रणजीत पटेल का योगदान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रहा। उन्होंने अपने संतुलित दृष्टिकोण, आत्मीय व्यवहार और व्यवहारिक सूझ-बूझ से इस आयोजन को आवश्यक गरिमा और स्थिरता प्रदान की। यद्यपि पारिवारिक कारणों से वे 14 तारीख की पंचमढ़ी यात्रा में सम्मिलित नहीं हो सके, तथापि उनकी पूर्ववर्ती सहभागिता, मार्गदर्शन और सहयोग इस पूरे आयोजन में निरंतर अनुभव किया जाता रहा, मानो उनकी उपस्थिति प्रत्यक्ष न होकर भी हर क्षण साथ बनी रही हो।
वस्तुतः, इन दोनों विभूतियों की सृजनात्मक ऊर्जा, आत्मीय प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक चेतना ने इस यात्रा को केवल एक कार्यक्रम न रहने देकर उसे एक ऐसे भाव-संपन्न और जीवन्त अनुभव में परिणत कर दिया, जो दीर्घकाल तक स्मृतियों में ही नहीं, बल्कि संवेदनाओं में भी स्पंदित होता रहेगा।
यह यात्रा केवल स्थलों का भ्रमण नहीं थी, बल्कि विचारों, संवेदनाओं और मानवीय संबंधों का एक विस्तृत आयाम थी—जहाँ साहित्य ने इतिहास से साक्षात्कार किया, संस्कृति ने वर्तमान से संवाद स्थापित किया और आस्था ने इन सबको एक मानवीय ऊष्मा से आलोकित कर दिया। यह अनुभव इस बात का साक्षी बना कि जब संवेदना और सृजन एक साथ चलते हैं, तो यात्रा केवल दूरी तय नहीं करती, बल्कि मनुष्य के भीतर नए आयामों का विस्तार करती है।
इस प्रकार, यह यात्रा उस अदृश्य सेतु पर चलने का एक दुर्लभ, अविस्मरणीय और अंतर्मन को समृद्ध करने वाला अनुभव सिद्ध हुई—एक ऐसा अनुभव, जो केवल स्मृति में सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि जीवन-दृष्टि का हिस्सा बनकर निरंतर भीतर प्रकाश फैलाता रहता है।
सादर
‘चंद्रप्रभा विला’
417, रॉयल रेजीडेंसी – प्रथम फेस,
सारंगपुरा, बड़ के बालाजी,
अजमेर रोड, जयपुर – 302042
# 91 8209909309