सहज संप्रेषण के नवगीत कवि: जयप्रकाश श्रीवास्तव
सहज संप्रेषणा के नवगीत कवि : जयप्रकाश श्रीवास्तव
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अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
जय प्रकाश श्रीवास्तव जी से मेरा परिचय (यदि दो-तीन बार की चलभाष वार्ताओं को छोड़ दिया जाए तो) केवल उनकी साहित्यिक सर्जनाओं एवं उपलब्धियों तक ही सीमित है। 9 मई 1951 को नरसिंहपुर (म. प्र.) में जन्मे जय प्रकाश श्रीवास्तव जी हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर हैं तथा एक शिक्षक के साथ-साथ एक सजग नवगीत कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। आज आप किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। जितना मुझे ज्ञात हो सका है- उनके अब तक करीब छः नवगीत संग्रह- “मन का साकेत”-2012, “परिंदे संवेदना के”-2015, “शब्द वर्तमान-2018”, “रेत हुआ दिन”-2020, “धूप खुल कर नहीं आती”-2022 और “चल कबीरा लौट चल”-2022 आदि प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें से मुझे केवल तीन संग्रह “परिंदे संवेदना के”, “धूप खुल कर नहीं आती” और “चल कबीरा लौट चल” ही पढ़ने को उपलब्ध हो सके। यह अलग बात है कि अंतर्जाल में प्रकाशित आपके नवगीतों को पढ़ने का अवसर समय-समय पर मिलता रहा है।
जयप्रकाश श्रीवास्तव पर बात करने के पूर्व मध्य प्रदेश के विंध्य, मध्य भारत, महाकौशल और बुंदेलखंड भूभाग के प्रमुख नवगीतकारों के नामों का उल्लेख करना समीचीन होगा। जिन प्रमुख नवगीतकारों का मुझे स्मरण है, उनमें सतना से सर्वश्री अनूप ‘अशेष’, हरीश निगम, नरसिंहपुर से शिव कुमार ‘अर्चन’ (आप जय प्रकाश श्रीवास्तव के अग्रज हैं), विदिशा से जगदीश श्रीवास्तव, कटनी से राम सेंगर (अब भोपाल रहते हैं), श्याम नारायण मिश्र, भोलानाथ (फ़िलहाल मैहर रहते हैं), सुरेन्द्र पाठक, देवेंद्र कुमार पाठक, आनंद तिवारी, राम किशोर दाहिया, राजा अवस्थी, अरुणा दुबे, मानपुर से राम निहोर तिवारी, जबलपुर से आचार्य भगवत दुबे, संजीव वर्मा ‘सलिल’,बसंत कुमार शर्मा, दमोह से श्याम सुन्दर दुबे, सागर से डॉ. शिव कुमार श्रीवास्तव, डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. शरद सिंह, ईश्वर दयाल गोस्वामी, उमरिया से राजकुमार महोबिया, भोपाल से यतीन्द्र नाथ राही, मयंक श्रीवास्तव, राघवेंद्र तिवारी, मधु शुक्ला, मनोज जैन, चित्रांश बाघमारे इत्यादि प्रमुख नाम हैं, जो वस्तुतः नैसर्गिक रूप से धरती से जुड़े हुए नवगीतकार हैं। जयप्रकाश श्रीवास्तव भी इसी भूभाग के प्रमुख नवगीतकार हैं।
जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के नवगीतों पर कुछ कहने से पहले
नवगीत पर उनके नज़रिए से रूबरू हो लिया जाए तो असंगत न होगा। आपका मंतव्य है कि- “नवगीत
के असल मायने क्या हैं यह कहना कुछ अटपटा सा लगता है। इसलिए मैं गीत और नवगीत में
कोई विशेष फर्क
नहीं देखता। गीत और नवगीत के बीच एक हल्का सा पर्दा भर है,
जो इन्हें बाँटता है। मेरे विचार से गीत जहाँ भव्यता है, वहीं
नवगीत नव्यता है। बस यही अंतर पाता हूँ। वरना तो गीत और नवगीत एक ही हैं। भव्यता –
अर्थात जहाँ
गीत अपनी पूरी सामर्थ्य से लोगों के मन को कल्पना और स्वप्न लोक के आदर्श स्वरूप
का दर्शन कराता है,
वहीं नवगीत इस मिथक को तोड़कर एक ऐसी ज़मीन को आधार बनाता है- जहाँ यथार्थवोध है,
अभाव हैं, सामाजिक
विद्रूपताएँ हैं और है एक जिजीविषा, जो आदमी को टूटने नहीं देती। इसके लिए बिंब
और प्रतीक की नवीन अवधारणा, भाषा की विविधता तथा समसामयिक दृष्टिकोण,
जो नवगीत
को नव्यता प्रदान करता है। बस यही तो है नवगीत। मूल में तो गीत ही है। गीत की
रागात्मकता एवं ध्वन्यात्मकता नवगीत में भी परिलक्षित होती है,
जिसे लय छंद और प्रवाह के साथ संप्रेषणीय बनाने का कार्य नवगीत
कवि करता है। अत: यह कहना कि छंद नवगीत के लिए उपयुक्त नहीं,
सर्वथा अनुचित लगता है। जहाँ गेयता है- वहाँ तो छंद होगा ही। बस यह कवि पर निर्भर
करता है कि वह गीत में छंद संयोजन किस तरह करता है। एकल छंद या मिश्रित छंद के रूप
में। इस पर अनेक लोगों ने अपने विचार रखे हैं और वे सभी नवगीत के लिए स्वीकार्य भी
हैं। या हम कह सकते हैं कि छंद की नव्यता भी नवगीत का प्रमुख तत्व है,
जबकि गीत में अधिकांशतः
कवि पारंपरिक छंदों का उपयोग करते हैं । इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि नवगीत में
पारंपरिक छंदों का या गीत में नवीन छंदों का प्रयोग होता ही नहीं है।
कवि इसके लिए स्वतंत्र हैं। एक और बात यह कि
अनुभूति जन्य तीव्रता जो कवि मन को लिखने के लिए प्रेरित करती है जब तक न हो,
लेखन सार्थक नहीं होता। अत: गीत/नवगीत या कविता के लिए अनुभूति की तीव्रता आवश्यक
है।“
इसे नवगीत की प्रचलित मान्यताओं और प्रमुख
मनीषियों की दृष्टि से परखना ज़रूरी है।
१. गीत और नवगीत में भेद पर दृष्टि: जय
प्रकाश श्रीवास्तव का कहना है कि गीत और नवगीत में कोई मूलभूत अंतर नहीं है, बस भव्यता और नव्यता का अंतर है। यह कथन
आंशिक रूप से सही है। प्रचलित मान्यता के अनुसार नवगीत को गीत से भिन्न एक
स्वतंत्र विधा माना गया है, क्योंकि
यह परंपरागत गीत की भावुकता, स्वप्निलता
और रोमानी दृष्टि को छोड़कर समकालीन यथार्थ, सामाजिक
विद्रूपता और मानवीय संघर्ष का उद्घाटन करता है (डॉ. नामवर सिंह, डॉ. भारतभूषण अग्रवाल, डॉ. रामविलास शर्मा आदि)।
परंतु जय प्रकाश श्रीवास्तव का कहना कि मूल
में तो गीत ही है, गीत
और नवगीत के बीच की निरंतरता पर प्रकाश डालता है। यही विचार डॉ. विश्वनाथ प्रसाद
तिवारी और डॉ. शंभुनाथ सिंह की व्याख्या में भी मिलता है कि नवगीत गीत का ही
विकसित रूप है।
२. छंद और लय पर विचार: उनका
कहना है कि जहाँ गेयता है, वहाँ
छंद होगा ही और नवगीत में छंद-विन्यास कवि की स्वतंत्रता है। प्रचलित मत यही है कि
नवगीत छंदहीनता को स्वीकार नहीं करता। डॉ. शंभुनाथ सिंह (नवगीत दशक) और डॉ.
योगेंद्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ ने स्पष्ट कहा है कि नवगीत की पहचान गेयता और लय से है। श्रीवास्तव
जी छंद की "नवता" पर बल देते हैं—यह बात भी मनीषियों के मत से मेल खाती
है। नवगीत में परंपरागत छंदों का प्रयोग तो होता ही है, लेकिन मुक्त छंद या मिश्रित छंदों का भी
रचनात्मक उपयोग देखने को मिलता है।
३. यथार्थ और अनुभूति की तीव्रता: उनका
कथन है कि नवगीत मिथकीय आदर्शलोक से हटकर यथार्थवोध, अभाव, विद्रूपता और जिजीविषा को आधार बनाता है। यह
नवगीत की सर्वस्वीकृत परिभाषा है। डॉ. शंभुनाथ सिंह और भारतभूषण अग्रवाल दोनों ने
ही कहा कि नवगीत जीवन की ठोस ज़मीन से जुड़ता है और आम आदमी की पीड़ा और संघर्ष का
दस्तावेज़ बनता है। अनुभूति की तीव्रता को लेखन की शर्त मानना भी परंपरागत और
नवगीत दोनों धाराओं के साथ मेल खाता है। डॉ. रामविलास शर्मा ने भी कहा कि कविता
तभी सार्थक है जब उसमें सामाजिक अनुभूति और गहन संवेदनाएँ हों।
४. समीक्षा
सकारात्मक पक्ष:
श्रीवास्तव जी नवगीत को गीत की परंपरा का ही विकसित रूप मानते हैं, छंद और लय की भूमिका स्वीकारते हैं, और यथार्थवादी दृष्टि पर बल देते हैं।
सीमित पक्ष:
उनकी दृष्टि में गीत और नवगीत के बीच का भेद "हल्का सा पर्दा" मात्र
है—यह बात अधिकांश नवगीत-समालोचकों की मान्यता से कुछ भिन्न है। क्योंकि नवगीत को
एक स्वतंत्र विधा मानने की प्रवृत्ति अधिक प्रबल रही है।
निष्कर्षतः, उनका
दृष्टिकोण संधिस्थल दृष्टिकोण कहा जा सकता है: जहाँ गीत की परंपरा और नवगीत की
आधुनिकता के बीच कोई तीखी रेखा नहीं, बल्कि
एक विकासक्रम है।
दरअसल, जय
प्रकाश श्रीवास्तव का कथन यह बताता है कि वे गीत और नवगीत के बीच तीखा भेद नहीं
मानते, बल्कि उन्हें एक ही परंपरा की निरंतरता और
विकासक्रम के रूप में देखते हैं। उनका बल इस बात पर है कि – नवगीत, गीत से कटकर नहीं, बल्कि उसी से निकलकर आया है। इसकी गेयता, छंद, और
अनुभूति-प्रधानता गीत की परंपरा से ही जुड़ी हुई है। नवगीत का मूल स्वर यथार्थपरक
है – यानी वह जीवन की कठोर सच्चाइयों, अभावों
और जिजीविषा का प्रतिनिधित्व करता है।
लेकिन, उनकी
दृष्टि नवगीत के प्रयोगशील, बहुआयामी
और भाषा-शैली की विविधता वाले स्वरूप पर पर्याप्त ज़ोर नहीं देती। जबकि नवगीत
मनीषियों की मान्यता है कि यह केवल गीत का नया रूप भर नहीं, बल्कि एक ऐसी सर्जनात्मक विधा है जो आधुनिकता
और सामाजिक चेतना के साथ निरंतर नए प्रयोग करती रहती है।
अर्थ यह हुआ कि जय
प्रकाश श्रीवास्तव का दृष्टिकोण नवगीत की निरंतरता और संतुलित स्वभाव को रेखांकित
करता है, परंतु नवगीत की स्वतंत्रता, बहुविध प्रयोगशीलता और पूर्ण आधुनिकता को वह
उतना प्रमुख नहीं ठहराता। इसलिए यह दृष्टिकोण आंशिक सत्य को सामने लाता है, पर नवगीत की संपूर्ण परिधि को नहीं पकड़
पाता।
प्रकारांतर से जय प्रकाश श्रीवास्तव
भी गीत और नवगीत के बीच भ्रम की स्थिति को स्वीकारते हैं। हालाँकि, आस्तिक जी ने नवगीत की अवधारणा को लेकर बार-बार यह स्पष्ट किया है
कि नवगीत केवल गीत का नया रूप नहीं है, बल्कि समय-सापेक्ष
जीवनानुभव की नयी अभिव्यक्ति है। वे मानते हैं कि नवगीत की पहचान जीवन-सापेक्षता, सामाजिक यथार्थ और समयबोध से होती है, न कि मात्र गीत की भावुकता या परंपरा के पुनरावर्तन से।
इस भ्रम को दूर करने का प्रयास “नवगीत
के सृजन सारथी- भाग- 3” में डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ करते हैं। वे आधुनिक
युग के समस्त काव्य-आंदोलनों की कालावधि रेखांकित करते हुए लिखते हैं—“नई
कविता युग में पनपे विविध आंदोलन—अकविता, नकेनवाद,
बौद्धिक कविता, सहज कविता, सनातन सूर्योदयी नई कविता, अभिनव कविता, वीट कविता, युयुत्सावादी कविता, अस्वीकृत कविता, निर्दिशामयी कविता आदि—सभी की आयु
अधिकतम पाँच वर्ष रही; कुछ की तो भ्रूणहत्या भी हो गई। “
1.
भारतेन्दु युग : 32 वर्ष 1868 से 1900 ई।
2. द्विवेदी युग : 20 वर्ष 1900 से 1920 ई।
3. छायावाद : 15 वर्ष 1920 से 1935 ई।
4. प्रगतिवाद : 08 वर्ष 1935 से 1943 ई।
5. प्रयोगवाद : 12 वर्ष 1943 से 1955 ई।
6. नई कविता :40 वर्ष 1955 से 1995 ई।
7. नवगीत : 66 वर्ष (1958 से अब तक)
वे
आगे कहते हैं कि- “अब नवगीत
की आयु
पर विचार
करें तो गीत
में नवता
की चर्चा तो छायावाद काल में ही प्रारम्भ हो गयी थी। नवगति, नवलय , ताल छंद नव: निराला।
परंतु
उसका नामकरण राजेंद्र प्रसाद सिंह की गीतंगिनी (1958) से मिला। तो नवगीत की आयु हुई- 66 वर्ष (1958 से अब तक )। जबकि उपर्युक्त सभी आंदोलन दिवंगत हो चुके हैं। ध्यातव्य है कि नवगीत में अब नितांत युवा समर्थ और
ऊर्जस्वी पीढ़ी सक्रिय हुई है ।यह युवा पीढ़ी सृजन और समीक्षा दोनों क्षेत्रों में
नवगीत को नूतन आयाम दे रही है।“
खैर, आधुनिक
हिन्दी साहित्य के इतिहास के संदर्भ में नवगीत ने कई आलोचनाओं के बावजूद अपनी
प्रासंगिकता को बरकरार रखा है। जिसमें सबसे बड़ा कारण यह है कि नवगीत ने किसी जड़ता का वरण नहीं किया है। वह निरन्तर गतिशील है और नित नए प्रतिमान
स्थापित कर रहा है। कह सकते हैं कि नवगीत चौथी पीढ़ी के हाथों में भी सुरक्षित, पल्लवित,
कुसुमित और सुरभित है। डॉ. सुभाष
वसिष्ठ के शब्दों में “असल में, नवगीत अब सीनियर हो गया है, यह नई विधा नहीं है”। तो नवगीत के प्रति सारे भ्रम स्वतः
समाप्त हो जाने चाहिए।
मूलतः
बात कुछ और ही है। वह है – श्रेष्ठता नामक कीड़े की। जब तक यह भावना रहेगी, हम दौड़ में आगे निकलने की बजाय टांगे खीचने
में ज्यादा रत रहेंगे। तो क्या श्रेष्ठ बनने की प्रवृत्ति छोड़ देनी चाहिए ? नहीं। वस्तुतः प्रतिस्पर्धा उन्नति का एक प्रेरक तत्व है, तो वहीं समावेशी होना भारतीय चिंतन में लगभग प्रत्येक कालखंड में
विद्यमान रहा है। चाहे वह प्राचीन परंपरा का “अयं
निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां
तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥“ हो, या "सह
नाववतु
सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै" या फिर भले ही आज का नया-नया नारा ही क्यों न हो ? यानि “सबका साथ – सबका विकास।“
मनुष्य
एक चिंतनशील प्राणी है। चिंतन का हमारे व्यक्तित्व से सीधा संबंध है। हमारा चिंतन
जितना अधिक श्रेष्ठ होगा, हमारा
व्यक्तित्व उतना ही ज्यादा परिपक्व होगा। यानि – चिंतन के मूल में है- जीवन को सर्वांगीड़
रूप से सुंदर बनाना, जिसमें उत्तम शिक्षा, उत्तम चरित्र, उत्तरोत्तर विकास, समत्व, साह्यचर्य, आदि बड़े
लक्ष्य हैं। उसके लिए हमारे सामने कई कठिनाइयाँ हैं,
विसंगतियाँ हैं, वैषम्य है,
नकारात्मक्ता है और उन सबके बीच अन्याय के प्रति निरीह खड़ा हमारा मौन। यह सत्य है
कि करुणा कविता के मूल में है, परंतु करुणाजनित क्रोध प्रतिकार
या प्रतिरोध को जन्म देता है। नवगीत ने वही किया है। अन्याय का प्रतिकार, असमानता का प्रतिकार, अस्पृश्यता का प्रतिकार, आदि-आदि।
तो
कह सकते हैं कि नवगीत आज एक सशक्त विधा के रूप में व्यवस्था जनित
विसंगतियों के विरुद्ध दमखम के साथ खड़ा नज़र
आता है। वह जीवन की यथार्थता को
शिद्दत के साथ उजागर करता है। इस तरह वह जनमानस के बीच अपनी प्रथक पहचान का निर्माण
करता है।
एक
और बात – वह है नवगीत में प्रयुक्त बिंब विधान या प्रतीक और उन सबके बीच सबसे बड़ा
सवाल है- सम्प्रेषण का। यह एक ऐसा विषय है जिसमें हर रचनाकार का अपना अलग
दृष्टिकोण है। फिर भी सहज सम्प्रेषण जनमानस के लिए सीधा संवाद ही होता है।
जयप्रकाश श्रीवास्तव इस प्रारूप में फिट बैठते हैं। आपके गीतों में जिजीविषा है, आशा है, समय सापेक्षता है, कोमल अनुभूतियाँ हैं, समाज के हारे थके लोगों के दुःख-संत्रास
हैं, पीड़ा से निकालने के नये
रास्ते हैं, सम्बल
हैं। रचनाकार की यही जिजीविषा एक ओर जहाँ आमजन का मार्ग प्रशस्त करती है, वहीं दूसरी ओर उनके दुःख-दर्द
की अनुभूति को लेकर रचना में नए स्वर देकर उनका पक्षधर बनाती है।
अनुभव जयप्रकाश श्रीवास्तव के लिए एक
बड़े कैनवास का प्रमुख जरिया है। नवगीत व्यंजना, प्रतीक योजना, बिम्ब और शिल्प विधान, भाषा आदि के साथ-साथ उनके गीतों में विद्यमान विविधता इसका
प्रमाण है। हालांकि, नवगीतों
के शिल्प में बहुतायत जगहों पर छंदों के निर्वाह में संदेह होता है, किंतु विषयवस्तु के स्तर
पर अथवा कहें कि जन सरोकार के मुद्दे पर उनके नवगीतों कि ग्राह्यता कहीं अधिक बढ़
जाती है। आपके नवगीतों में लोक की पीड़ा है। गाँवों
का विछोह है। शहरों की घुटन है। धूप है तो छांव है। ऊष्मा है तो शीतलता है। रात है
तो दीपक है। जड़ता है तो चेतनता है। किंकर्तव्यविमूढ़ता है तो
सक्रियता है। और सबसे बड़ी जरूरत है- एक परिपक्व दृष्टि की। क्योंकि एक दृष्टि
सम्पन्न रचनाकार ही सही मायने में समाज को समुचित राह दिखा सकता है।
तो
जब बात दृष्टि की हो, तो सबसे पहले सैद्धांतिक रूप
से प्रकाश की जरूरत होती है। यानि-
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”। कुछ पाने की चाह हो, यथेष्ट हो, गंतव्य हो, या
उद्देश्य, उसके लिए उठना पड़ता है, चलना
पड़ता है, प्रयास करना पड़ता है, यानि- “उतिष्ठ
जाग्रत प्राप्त वरान्निबोधत”। श्रेय साधन तो सब मौजूद हैं प्रकृति में। जैसे
कि सूरज न केवल प्रकाश देता है, ऊष्मा भी देता है। पेड़ न
केवल छाया देते हैं, फल भी देते हैं। यहाँ तक कि सूख जाने पर
लकड़ी के रूप में ईंधन भी देते हैं। लेकिन फिर भी मनुष्य को बहुत सारे यत्न करने ही
पड़ते हैं। तो वह पानी के लिए कुवें खोदता है, संचय के लिए
तालाब बनाता है। वहीं सीमित सम्पदा के कारण वह फसलें उगता है और सुनिश्चित करता है
कि कोई भी भाग व्यर्थ न जाए। यह सब वह अपने अदम्य साहस, जीवटता, हौंसला, लगन और श्रम से करता है।क्योंकि उसकी आँखों
में न केवल सपने हैं, वरन उनको पूरा करने का माद्दा भी है।
लेकिन मनुष्य को उसके कई गुणों के साथ एक प्रमुख अवगुण भी मिला है, वह है- आलस्य।
और आलस्यजनित नींद। यथा- “नींद मारती सपने सारे
/ रातें बुनतीं तम के उजाले।“ यहाँ
उसको जगाने की आवश्यकता होती है। यह जिम्मेदारी कवि ओढ़ता है। वह न केवल स्वयं सजग है, वरन दूसरे लोगों को प्रेरणा भी देता है। जयप्रकाश श्रीवास्तव इसे कैसे
कहते हैं ? देखिये जरा-
उठ ! उठकर कुछ लिख
अंधियारे / पृष्ठों पर
/ उजियारे लिख।
और
आगे-
सूरज / फिर बांचने लगा
/ दिन की रामायन
खोल / हवा
आने तो दे
/ मन के वातायन
जग ! जगकर कुछ लिख
सपनीली / आँखों में
/ भिनसारे लिख।
यानि कवि को अपने धर्म कर्म का बोध है। असफलता जनित हताषा के भंवर में डूबे हुए लोगों के लिए वह
एक नन्हें जीव ‘चिड़िया’ का उदाहरण देकर कर्म का पाठ
पढ़ा सकता है। यथा-
चोंच दबा
/ तिनका / चिड़िया / गढ़ती है घोंसला
पंख टूट
/ जाएँ / तो क्या
! / हारती न हौंसला
पढ़ ! पढ़कर कुछ लिख
कर्म की
/ ध्वजाओं पर / जयकारे लिख।
यहाँ, “पढ़ पढ़ कर
कुछ लिख” का अर्थ समझना होगा। मनुष्य जब पैदा होता है तो प्राथमिक तौर पर दो चीजें
बहुत जरूरी होती हैं- एक शिक्षा, दूसरी सुरक्षा। देखा जाए तो
दुनियाँ की प्रत्येक भाषाओं में लगभग सभी कुछ लिखा जा चुका है। इसी लिए विचारों का
दोहराव यत्र-तत्र दिखाई दे जाता है। तो क्या लेखन की गुंजाइस समाप्त हो गयी है ? नहीं। वस्तुतः आज प्रगति के चक्र की गति इतनी तेज है कि पूर्व लिखित सारा
साहित्य पढ़ पाना संभव नहीं है। और इसी कारण से आज की पीढ़ी में उस सबको पढ़ने में
अरुचि है। लेकिन लोग फिर भी फुटकर में कुछ न कुछ पढ़ना पसंद करते हैं। तब, जब कि उनके पास एक काम के साथ इसकी गुंजाइस हो। जैसे यात्रा के मध्य।
इंतजार के मध्य। उसके लिए नए-नए विषयवस्तुओं की आवश्यकता होगी। यह विषयवस्तु जब हम
कुछ पढ़ते हैं तो नए-नए विचार स्वतः निसृत होते हैं और प्रेरणा के संवाहक होते हैं।
यह हमें पौराणिक आख्यानों में मिल सकता है, इतिहास में मिल सकता है, साहित्य में
मिल सकता है अथवा घटनाओं में मिल सकता है। अर्थात जिस तरह आग के लिए एक चिंगारी ही
पर्याप्त है, उसी तरह विचार के लिए एक छोटी सी बात भी नए
रास्ते, नए विकल्प या नए अनुसंधान का कारण बन सकती है। तो
कवि का “पढ़ ! पढ़ कर कुछ लिख” कहना न केवल सार्थक है, बल्कि
सोद्देश्य भी है।
हौंसलों का आलम यह कि जयप्रकाश श्रीवास्तव
उससे भी आगे जाकर कह उठते हैं कि-
तुम अंधियारे की / हथकड़ियाँ
/ खोलो तो
हम नये दीप / गढ़ने का /
वादा करते हैं।
और
अंतरों के ये संयोजन तो और भी मोहक हैं-
ओर-छोर तक
/ तम ही तम है
/ सिर्फ व्यथाएँ हैं
क्षितिजों के
/ पांवों से लिपटी
/ असफलताएँ हैं
काँटों से समझौता
/ करने हम / मजबूर नहीं
राह दिखे तो हर
/ मंजिल में सौ सुविधाएँ हैं
तुम भोर किरन के
/ विश्वासों की
/ जय बोलो तो
हम नये
/ सूर्य गढ़ने का
/ वादा करते हैं।
और-
सुख
की मिले / बाँसुरी तो हर / होंठ बजा सकते हैं
वातावरण
/ पीठ ठोंके तो / गूँगे गा सकते हैं
संघर्षों
के शंख / फूंकने को / हम राजी हैं
अहम्
भाव से ऊँचे / मस्तक सदा / झुका करते हैं
तुम
थके हुए / पांवों की / व्यथा दुलारो तो
हम
शिखरों पर / चढ़ने का वादा करते हैं।
लेकिन
यह “तुम” है कौन ? आखिर यह निर्भरता कैसी है ? और किस पर है ? वस्तुतः देखा जाए तो सापेक्षता का
सिद्धान्त ही चीजों को जोड़ता है। यह कुछ लड़ियाँ बनाने और माला गूँथने जैसा काम है।
यह कर्ता और कारक का समन्वय है। यह कुछ वैसा ही है- जैसे योगेस्वर कृष्ण का स्वयं
के बिना हथियार उठाए ही अर्जुन से विजय की अपेक्षा करना। यहाँ जैसा आश्वासन कृष्ण
देते हैं, कुछ वैसा ही आश्वासन कवि भी देता है।
लेकिन हौसला-आफजाई के इतर तथा
लाख विकास के दावों के विपरीत जीवन की कठिनाइयाँ भी बहुत हैं। वहाँ दु:ख है, दर्द है, हताशा है, नैराश्य
है, कुंठा है, खालीपन है....। वहाँ
आवश्यकताएँ हैं, तो अभाव हैं। मार्ग हैं, तो साधन नहीं हैं। प्रकाश है, तो अंधकार के सापेक्ष
उसकी एक सीमा है। वे स्वयं स्वीकारते हैं- “इतनी बातें ! / हर बातों पर /
सौ-सौ घातें / जीवन जीना बहुत कठिन है”। लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों
के बावजूद भी कहीं न कहीं “जी लेने का मन
” हमारी चेतना में विद्यमान रहता है। क्योंकि जीवन का आधार ही
यही है। अंकुरण की जिजीविषा बीज में ही सन्निहित होती है। वह अपने से अधिक भार को भी
फोड़कर बाहर निकल कर आ जाता है तथा वह हवा के थपेड़ों को झेलकर भी खड़ा रहता है। वह
आगत के लिए विकसित होता है, फूलता है, फलता है और नए बीज का जन्मदाता भी बनता है। जयप्रकाश श्रीवास्तव का इसी
मनःस्थिति का यह गीत पढ़ें और उसकी संवेदना को अंतस्थल तक महसूस करें-
मन के दर्द बहुत गहरे हैं
खालीपन लाशें ढोता है,
फिर भी सब
कुछ
सहकर मेरा
जी लेने का मन होता है।
हालांकि, हमारे द्वारा किए गए प्रयास कई बार विफल रहते हैं। पूरे मनोयोग के अभाव
में दीपक की क्या बिसात होती है ? निम्न बक्रोक्ति से उसे
भली-भाँति समझा जा सकता है। यानि कि वही नींद हमारे सपनों को मार रही है, जो उसका साधन है, माध्यम है। परंतु, यह नींद वह नहीं है, जो सो जाने के संदर्भ में है।
यह नींद तो अकर्यमण्यता की है, आलस्य की है। देखें आप-
नींद मारती सपने सारे
रातें बुनतीं तम के उजाले
मैं दीपक
बिन नेह पियासा
प्राणों की ज्योति को पाले
ढूँढ़ रहा हूँ
सुख की किरणें
दुख का ही दर्शन होता है।
लेकिन
अस्तित्व का संकट भी कम नहीं है। सूरज सर पर है। हवा तन-उघाडू है। ऐसे में चाहत की
तस्वीर भी अपने फ्रेम में नहीं है। वहाँ केवल और केवल खाली दर्पण है।
परछाई तक लील गया है
सूरज का बेशर्मीपन
उलट दिये
बेरहम हवा ने
यादों के सब अवगुण्ठन
चाहत की
तस्वीर के आगे
बस खाली दर्पन होता है।
यहाँ “सूरज का बेशर्मीपन“
में
कुछ अखरता सा है। क्योंकि, सूरज तो बिना किसी भेद-भाव के सबको समान रूप से अपना प्रकाश देता है, ऊष्मा देता है। सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा कहा
गया है- “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”। ऋग्वेद के
पुरुष सूक्त में सूर्य को आँख से उत्पन्न हुआ कहा गया है- "चक्षो सूर्यो अजायत" अर्थात
सूर्य दृष्टा है। सामवेद में उल्लेखित है कि सूर्य संसार का धारक
और पालक है-
'धर्ता दिवो भुवनस्य
विश्पति:'। सूर्य से ही इस पृथ्वी
पर जीवन है, यह एक सर्वमान्य सत्य है।
इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से भी नहीं । अतः कह सकते
हैं कि सूर्य भौतिक जगत के लिए प्रकृति का सृष्टा है। सूर्य का बेशर्मीपन किसी भी
दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता। वह बेदर्द हो सकता है, पर बेशर्म नहीं। फिर भी, जब जयप्रकाश श्रीवास्तव जी
ने लिखा है तो कुछ सोचकर ही लिखा होगा, जो मेरी समझ में न आ
सका।
तो बात हो रही थी- नींद पर, सपनों पर। देखा जाए तो जयप्रकाश श्रीवास्तव के गीतों में नींद और सपने
कई-कई बार भिन्न-भिन्न रूपों में संदर्भित होते हैं। यथा- “पुतलियों
में आँख की / गड़ने लगे सपने / दर्द कितना बेरहम है” या “कुछ
सपनों ने / जन्म लिया है / तुम आओ तो आँखें खोलें “ या फिर- “नींद
सुलाकर / गई अभी है / चंदा ने गाई है लोरी ” या फिर- “सिहरते
से रूप / काजल कोर बहती / आँख सपने तज रही है“। इन
सपनों में कहीं दर्द है- “भोर चलकर पाँव / लीपे धूप का आँगन / रात ठहरी
चादरों पर / सलवटों सा मन / कज्जलों की कोर / पलकें सूखते झरने / दुख नदी का कहाँ कम है“,
तो कहीं उल्लास है- “अलस अँगड़ाई / उठा घूँघट खड़ी है / झटकती सी सिर / हँसी होंठों जड़ी है / फटकती है
सूप / झाड़ू से बुहारे / भोर उजली सज रही है”। कहीं निराशा है- “हवाओं की छतों / पर बैठी अकेली छाँव / साँझ चुपके
से उठा / लाई दुखों का गाँव / ऊँघती चौपाल / लंबे रात के डैने / उजालों का बस भरम है”, तो कहीं आस भी है- “बजी घंटियाँ / मंदिर जागा / पंछी के कलरव हैं जागे / ओस कणों
ने / दूब सिरों पर / मुकुट मोतियों वाले टाँगे / हवा सुवासित / भजन आरती / तुम गाओ तो अमृत घोलें”।
जरा सोचिए – किन परिस्थितियों में
सपने हमारी आँख की पुतलियों में गड़ने लगते हैं ? ऐसा तब
होता है, जब सपने पूरे करने के लिए बहुत ज्यादा कीमत अदा
करनी पड़ रही हो। लेकिन इन सबसे इतर जीवन का रिद्धम प्रकृति के मूल में छिपा है। वहाँ
धूप है, रूप है, आकर्षण है। वहाँ सृजन
है, अंकुरण है, फल है। वहाँ रस है, रसना है, तृष्णा है। वहाँ उदर है, भूख है, भोजन है। वहाँ फूल हैं, हवा है, गंध है।
लेकिन सपने पूरे करने के तरीके जहाँ नैतिक प्रयास अथवा श्रम होने चाहिए, वहाँ अब अनैतिकता के प्रति कोई संकोच नहीं है। आज मन
पर गुनाहों का कोई बोझ ही नहीं होता है। समय का बदलाव इस कदर हुआ है कि हमारे जीवन
मूल्य निचले पायदान तक पहुँच गए हैं। यहाँ तक कि हमारी नयी पीढ़ी अपने कुछ करनामों
से पूरी पीढ़ी को ही शापित करने पर तुली हुई है। “दूध के टूटे नहीं हैं दाँत / कारनामे कर रहे
लज्जित।“ पंक्ति विकट परिस्थिति को व्यक्त करती है। यह केवल इस
पीढ़ी का ही दुर्भाग्य नहीं है, वरन पुरानी पीढ़ी का भी
दुर्भाग्य है। लेकिन क्या यह केवल आज की समस्या है? यह वेदना
तो महाभारत काल में भी भोगी गयी है। कष्ट तो यह है कि सफलता के शॉर्ट कट्स मनुष्य
को न जाने कौन-कौन सी चालाकियाँ सिखाते जा रहे हैं– “
सीखते चालाकियाँ / काटें
सभी की बात
बड़ों के भी सामने / आँकी
गई औक़ात
बिगड़ते ही जा रहे हालात
पीढ़ियाँ होने लगीं शापित।“
जयप्रकाश
श्रीवास्तव ऐसी पीढ़ी की पहचान कुछ निम्न तरह से कराते हैं-
आँख के
अंधे लगें / पाँव धरती पर नहीं
नाक पर
गुस्सा रखें / झगड़ते हैं हर कहीं
सह न
पाते तनिक भी आघात
सत्य से
हो पाए न परिचित।
ऐसे में यह प्रश्न करना भी
लाज़िमी हो जाता है कि-
ज़िंदगी भटके हुए जज़्बात
क्या पता कब होगी परिभाषित?“
प्रश्न तो और भी हैं और उन प्रश्नों के दायरे भी कम बड़े नहीं हैं। क्या आँगन !
क्या चौपाल ! क्या देश ! क्या परदेश ! हर जगह आदमी मजबूर है, बेवश है, निरीह है, लाचार है-
क्यों है चिड़िया
गुमसुम बैठी ?
क्यों आँगन खामोश हुआ है ?
कितना
तो मजबूर आदमी ?
क्यों
पाले दस्तूर आदमी ?
क्यों
जीवन बन गया त्रासदी ?
क्यों
ठंडा सब जोश हुआ है?
यह
त्रासदी ही है कि आज दु:ख हर घर की पहचान बन गया है। हालाँकि उसके कारण भी स्वयं
मनुष्य के ही गढ़े हुए हैं। जिसका सबसे बड़ा कारण एकल परिवार है। संयुक्त परिवारों
में पहले जहाँ लोग सारी कठिनाइयाँ / बाधाएँ एक दूसरे का संबल बन कर पार लेते थे, वहीं आज एकल परिवार में सारी
बाधाएँ स्वयं पार करनी होती हैं। उस पर बाज़ार की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। वहाँ
इंसानियत का कोई स्थान नहीं है। सत्ता अपने ही गुरूर में मदहोश है।
क्यों
दुख हर घर की पहचान ?
क्यों
सुख मरा बिना विषपान ?
क्यों
तम बिकता दूकानों में ?
क्यों
सूरज मदहोश हुआ है ?
ऐसा भी नहीं है कि जयप्रकाश
श्रीवास्तव के पास इन प्रश्नों के हल नहीं हैं। हल तो हैं- “गा रे मन
/ गीत कोई चौपाल का
/ हल निकलेगा / जलते हुए सवाल का।“ यहाँ
चौपाल की बात कहकर जयप्रकाश श्रीवास्तव कहीं न कहीं संवाद स्थापित करने की ही
वकालत करते हैं।
वह चौपाल गाँव में लगती है। शहरों में
यूं तो चहल-पहल है, पर मन में सन्नाटा है, संवादहीनता है। वहाँ की हवा में स्नेहलेप नहीं है। वहाँ गगनचुंबी इमारते
हैं, लेकिन धूप नहीं है। यह शहरी संस्कृति का ही परिणाम है। ऐसे
में बक्रोक्ति “सन्नाटों में / गूँज रहा है / गूँगापन भूचाल का।“ के निहितार्थ बहुत गहरे हो जाते हैं।
तन जलता है / शहरी गर्म हवा से
मन पर छाये हैं / अनगिनत कुहासे
सन्नाटों
में / गूँज रहा है / गूँगापन भूचाल का।
बातें बड़ी ही गंभीर हैं। खुशियों का टोटा ऐसा है
कि लोग आश्वासन में ही खुशी महसूस कर ले रहे हैं। आश्वासन और सांत्वना में महज़ समय
का अंतर है। लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि सांत्वना आश्वासन के काफी करीब होती
है। आश्वासन में जहाँ विश्वास का पुट है, वहीं सांत्वना में किसी को कठिन परिस्थिति में उबार लेने की आस जगाना है।
वस्तुतः सांत्वना एक टॉफी जैसी है, जिसमें क्षणिक मिठास तो
है, परंतु वह समस्या निदान नहीं है। अब यह मौजूं है कि दोनों
में ही विश्वास दिलाया जाता है। यह जानते हुए भी कि आज विश्वास करने की स्थिति
बहुत ही नाज़ुक है। ऐसे में कवि का यह कहना कि– “बीज बचा / रक्खा है हमने
/ गाढ़े वक़्त अकाल का।“ एक मज़बूत और मुकम्मल भरोषा
पैदा करता है। देखें-
आश्वासन
के घर / खुशियों का डेरा
विश्वासों
के / दीपक तले अँधेरा
बीज
बचा / रक्खा है हमने / गाढ़े वक़्त अकाल का।
भले
ही परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों। भले ही हर शाम बवंडर में गुजर रही हो। भले ही स्नेह
के सारे घट खाली हो गए हों। क्योंकि जहाँ कुदाल का मूलभूत भाव है- अर्थात श्रम का
भाव है, नींव का भाव है, खरपतवार निकालने का भाव है, अथवा नए बीज रोपने का भाव है, वहाँ परिस्थितियाँ
सदैव बिपरीत नहीं रह सकती हैं। इस प्रतिकूल कालखंड को काटने का ही उपाय है-
आश्वासन।
हर संध्या / झंझावातों में बीते
स्नेह प्यार के / सारे घट हैं रीते
संबंधों की / पगडंडी पर / रिश्ता सही कुदाल
का।
तो
इसके लिए जरूरी है कि मिल-बैठकर ही गुत्थियाँ सुलझाई जाएँ। “खुशी के पटैल”
जयप्रकाश श्रीवास्तव का ऐसा ही एक प्रेरक गीत है-
आओ
मिल बैठकर / सुलझायें गुथ्थयाँ / धो डालें मन के सब मैल।
यातनाएँ
भोगते हुए / वर्जनाएँ तोड़ते हुए
मय
की शिलाओं पर / पदचायें छोड़ते हुए
भूलकर
सभी विकार / कर डालें संधियाँ / खोजें फिर एक नई गैल।
शहरों की विषमताओं / विसंगतियों को
देखते हुए गाँव की याद आना कोई विस्मय का विषय नहीं है। हालांकि
गाँव भी विषमताओं अथवा विसंगतियों से भरे पड़े हैं, किन्तु
वहाँ अब भी लोगों में जुड़ाव है, संवाद है, साहचर्य है। शहरों में जहाँ अपनत्व ढूँढे नहीं मिलता है, वहाँ गाँव में ममत्व का अहसास होता है। तभी तो शहरी जीवन में आकर भी गाँव
का आदमी कुछ इस तरह से अपनी जड़ों को याद करता है-
जब भी मन घबराया
माँ के आँचल सा / गाँव याद आया ।
मेहनत का बीज मंत्र / रटता है जीवन
नियति से लड़-लड़कर / उगता है अंकुर
बन
जब भी दुख गहराया
मेंड़ों पर बैठा तब / गाँव याद आया ।
ऐसे
में “शहरों की ओर” के पलायन को रोकना होगा। अर्थात गाँव में ही रोजगार के साधन
उपलब्ध करने होंगे। जयप्रकाश श्रीवास्तव की शायद यही मंशा रही होगी-
बदले परिवेश नहीं / संविधान बदले
आगत के स्वागत में / वर्तमान बदले
जब छाला सहलाया
मेहनतकश लोगों का / गाँव याद आया।
(यह
दीगर बात है कि मेहनतकश लोग शहरों में भी रहते हैं और गांवों में भी। तो यहाँ साहचर्य
भाव के लोगों का गाँव याद किया जाना चाहिए था, न कि
मेहनतकश।)
और भला गाँव क्यों न याद आए ? शहरों में कंक्रीट के
जंगल तो हैं,
लेकिन न खुशुबू है,
न गौरैया है,
न रिश्ते हैं,
और न खुला आकाश है,
तारे दिखते नहीं हैं,
चाँदनी का तो अहसास ही नहीं होता। “माटी खूब महकती है”
गीत इसका सही वर्णन करता है। हालाँकि गाँव में भी शहरों की हवा लग चुकी
है।
गाँव अभी
भी
अपने
जैसे लगते हैं ।
माना थोड़ी / हवा
लगी है शहरों की / पर
माटी की / ख़ुशबू
खूब महकती है
थोड़े
अपनी / आँखों
में सपने पाले / हँसी
चिरैया / होंठों
बीच चहकती है
आँगन अब
भी
नहीं
पराए लगते हैं ।
भले
ही घर-आँगन में दीवारें खिंच गयी हों,
चूल्हे-चौके अलग-अलग हो गए हों, परंतु रिश्ते-नाते अभी भी
बरकरार हैं-
खिंची दिवारें / नहीं
बँटे रिश्ते नाते / मन
की चौखट / लाँघ
हुआ करतीं बातें
तारों
वाली / ओढ़
रज़ाई नभ नीचे / खाट-खटोला / और
चाँदनी की रातें
चूल्हे
सुलगे
प्यार
दुलार मचलते हैं ।
मार्क ट्वेन ने कहा था- “सच
जब तक जूते पहन रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का सफ़र तय कर लेता है।“
इसी
को हमारे यहाँ कुछ इस तरह कहा जाता है कि “यदि किसी एक झूठ को सौ बार कहा
जाए तो वह सच लगने लगता है“। लेकिन जयप्रकाश श्रीवास्तव का “झूठ संकट
का” तो कुछ अलग सच ही बयां करता है। देखिये-
भर गई गागर
अभावों से हमारी
छलक आया दर्द पनघट का।..................गहरी
संवेदना है।
तम के आगे
हो गये बौने
उजालों के सुयश..............इसमें
असत्य क्या है? तम अनंत है। उजालों की अपनी एक सीमा है।
कर्क रेखा
पर खड़ा है
सूर्य ले रीते कलश.............अभाव
का संकेत है।
राख होकर
बुझ गई ईमानदारी
पल रहा है झूठ
संकट का।
यह पंक्तियाँ अत्यंत तीव्र भाव-संक्षेप और आलोचनात्मक दृष्टि से
परिपूर्ण हैं। यहाँ सूर्य के हाथ में "रीते कलश" होने का अर्थ यह है कि अब
उसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा। ईमानदारी को अग्नि की तरह देखा गया है जो पहले
जलती रही, पर अब वह राख हो चुकी है — यानि समाप्त हो गई है। अब
जो बचा है, वह झूठ है, और वह भी किसी
सामान्य स्थिति में नहीं, बल्कि संकट के दौर में फल-फूल रहा
है। यह आधुनिक समय की विपर्ययात्मक स्थिति है, जहाँ संकट भी
नैतिक नहीं, बल्कि झूठ का पोषक बन गया है। यह नैतिक मूल्यों के अंत की ओर
संकेत करता है। ऐसे में “धार टूटी / है समय की शिला भारी / रेत गाती गीत
मरघट का।“ यह आज के समय की उस अवस्था को चित्रित करती है जहाँ समय की गति
अवरुद्ध है, चेतना पत्थर बन गई है, और
जीवन की रेत अब मृत्यु का राग गा रही है। जय प्रकाश श्रीवास्तव इसे एक बड़े संकट के
रूप में देखते हुए प्रतीत होते हैं।
यह संकट तब और बड़ा हो जाता है, जब झूठ केवल असत्य नहीं, बल्कि एक सक्रिय
सामाजिक-राजनीतिक ताकत बन जाता है जो षड्यंत्र (शकुनि),
अत्याचार
(दु:शासन), मौन समर्थन (हस्तिनापुर),
नैतिक
निष्क्रियता (गांधारी), और सत्य पर हमला (सूरज में दाग) के रूप में
सामने आता है। यह एक ऐसा यथार्थ है जहाँ झूठ व्यवस्था का आधार बन जाता है, और
सत्य हाशिए पर चला जाता है। पद
देखें-
चाल
शकुनि की / महाभारत छिड़ा है
द्रोपदी का चीर / दु:शासन खड़ा है
हस्तिनापुर मौन / सत्य गांधारी बना / झूठ
खोजे / दाग सूरज में.
तो फिर इसकी परिणति क्या होगी? यह “तुम जरा चुपचाप रहना” गीत में जय प्रकाश श्रीवास्तव कुछ फुसफुसाहट और सतर्कता के साथ कुछ इस तरह से कहते हैं -
सुनते
हैं
दीवारों के भी कान हैं
तुम जरा चुपचाप रहना।
कह न देना भूलकर भी क्षणिक से सुख की
कथा
मत सुनाना चाहकर भी अपने इस मन की
व्यथा
हमको तो
दुख का मिला वरदान है
सुखों की पदचाप सुनना।
यह
पंक्तियाँ आज के उस सामाजिक वातावरण को उजागर करती है जहाँ सत्य बोलना, दुःख
प्रकट करना, या व्यवस्था की आलोचना
करना ‘अपराध’
बन
चुका है, और झूठ को ही सम्मान और
मंच प्राप्त है। यहाँ झूठ न केवल बोला जा रहा है, बल्कि
वह अब नियंत्रक शक्ति बन चुका है। चुप रहना ही अब समझदारी बन गया
है। यहाँ यह बताया गया है कि जीवन में चाहे दुःख हो या सुख, दोनों की अभिव्यक्ति प्रतिबंधित है।
झूठ
का ऐसा ढोंग फैला है कि वास्तविक सुख भी दिखावा लगता है और सच्ची पीड़ा को सुनने
वाला कोई नहीं।
पीढ़ियों
से वो रहे हैं विरासत मजदूर वाली
झूठ लगती है है सचाई बदलती तकदीर वाली
हर तरफ
फैला हुआ सुनसान है
मना है संताप करना।
आदमी
कमजोरियों का / है पुलिंदा / झूठ के बल पर टिका है / सच बलिंडा
ज्ञान
की उजड़ी पुरातन छाँव / शहरी अधुनातन में।
झूठ के इस युग में सबसे
अधिक क्षतिग्रस्त हुआ है - सत्य। सत्य अब अप्रासंगिक बना दिया गया है। वह या तो
अधिक भावुक, अवसर
चूकने वाला, या
फिर राजनीतिक रूप से अनुचित घोषित कर दिया गया है। इस झूठ के सामूहिक और संस्थागत
स्वरूप को समझना और उसके विरुद्ध एक बौद्धिक और नैतिक प्रतिरोध खड़ा करना समय की
आवश्यकता है। साहित्य, कला, पत्रकारिता और शिक्षण - ये सभी क्षेत्र यदि
केवल झूठ के पोषण में लगे रहेंगे, तो
समाज का पतन अवश्यंभावी है।
जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के नवगीतों की
उपर्युक्त विवेचना के बाद दो प्रमुख आलोचकों डॉ. राम विलास शर्मा एवं डॉ. नामवर
सिंह की समालोचना दृष्टि से भी आपके नवगीतों को निहार लेना इस समालोचना की
पूर्णाहुति होगी।
यह
कथन जय प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीतों पर क्यों सटीक बैठता है?
जय
प्रकाश श्रीवास्तव का नवगीत संसार जनजीवन की जमीन से गहराई तक जुड़ा हुआ है। उनके
गीतों में समय की विडंबनाएँ, सामाजिक
विसंगतियाँ, गाँव
और खेत की पीड़ा, श्रम
का शोषण, विस्थापन, मूल्य ह्रास, और आम आदमी की बेबसी को
अत्यंत मार्मिक रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
नीचे
कुछ बिंदुओं में इसे स्पष्ट किया गया है:
·
जनता की पीड़ा का सीधा
चित्रण: “व्यवस्था का / काटता है / पाँव में जूता।” यह कविता आम आदमी
के जीवन में व्यवस्था की मार, घिसे
जूते, पसीने और बेबसी का
यथार्थ चित्रण है। यह जनता के संपर्क में रहने वाली कविता है, जो सहज प्रतीकों से गहरी
बात कहती है।
·
गाँव और श्रमिक जीवन का
यथार्थ: “घुस गया दिन / फिर घरों में / भोर का चूल्हा जला।” श्रमिक
वर्ग की दिनचर्या, ईंट
भट्टों में जलते श्रमिक, कंक्रीट
के जंगल, घुटती आशाएँ- ये सब आमजन
के जीवन की बारीक परतों को छूते हैं।
·
किसान की पीड़ा और
सरकारी उपेक्षा: “चौपट हो गई फसल / मुआवजे की तलाश में / भटक
रहा है नत्थू / केवल इसी आस में।” एक आम किसान की स्थिति
— फसल बर्बाद, मुआवजे
की उम्मीद, और
तंत्र की उदासीनता- यही तो जनसंवाद है।
·
सामाजिक विडंबनाओं से
टकराहट: “अहंकारों से / धरा जायेगी कुचली / फड़फड़ा कर
पंख / मर जायेगी तितली” यह चेतावनी है- समय की
नैतिक गिरावट, और
मनुष्यता के क्षरण की। यह केवल कला नहीं, जनता के युगीन संकट की अभिव्यक्ति है।
·
गाँव की संस्कृति और
शहरी विसंगतियाँ: “सुनो शहर जी / गाँव पधारो / नेह निमंत्रण तो
स्वीकारो।” यह गाँव की सादगी और आत्मीयता को शहरी
कृत्रिमता के विपरीत रखता है। इस तरह, रचनाकार जनमानस के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है।
निष्कर्षत:
डॉ. रामविलास शर्मा का विचार था कि रचना तब तक अर्थहीन है जब तक वह जनता से न
जुड़ी हो। जय प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीत न केवल जनता से जुड़े हैं, बल्कि उनकी पीड़ा, स्वप्न, संघर्ष और इतिहास को
स्वर देने का सच्चा कार्य कर रहे हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि: जय प्रकाश
श्रीवास्तव के नवगीत डॉ. रामविलास शर्मा के उस कथन का जीवंत उदाहरण हैं, जहाँ साहित्य जनजीवन से
संपर्क में रहकर समय को सार्थक बनाता है।
डॉ.
नामवर सिंह की समालोचना-दृष्टि के प्रमुख बिंदु:
- जनसरोकार: साहित्य
का उद्देश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि समाज
से जुड़ाव और उसके यथार्थ की प्रस्तुति है। ❝ “व्यवस्था का / काटता है / पाँव में जूता।” ❝ “भटक रहा है नत्थू / केवल इसी आस में।” ❝ “सभ्यता की ड्योढ़ियों को लाँघकर / खड़ा है निर्वस्त्र होकर आदमी।” ये
पंक्तियाँ जनता की पीड़ा, विवशता और व्यवस्था से टकराहट को सीधे उठाती हैं- ठीक
वैसे ही जैसे नामवर सिंह जनपक्षधर साहित्य की माँग करते हैं। इनमें न कोई
आडंबर है, न पलायन, बल्कि एक स्पष्ट वैचारिक पक्षधरता
है।
- यथार्थवाद: नामवर
सिंह साहित्य में समय, समाज और
मनुष्य के संघर्षों का यथार्थ चित्रण आवश्यक मानते हैं। “फसलें सब हो गई हवन
/ दर्द कहो किस-किस का हरूँ।” ❝ “अब केवल मजबूरी / रस्ता नहीं सूझता।” ये
पंक्तियाँ न केवल व्यक्तिगत त्रासदियों की अभिव्यक्ति हैं, बल्कि पूरे समय की सामाजिक
त्रासदी का प्रतिनिधित्व करती हैं। नामवर सिंह कहते हैं- “समय का सामना करने
वाला साहित्य ही समय को पार करता है।”- यह दृष्टि श्रीवास्तव के गीतों में
स्पष्ट झलकती है।
- आलोचना का
सामाजिक दायित्व: वे आलोचना को केवल कला-विश्लेषण
नहीं, बल्कि
सांस्कृतिक हस्तक्षेप और मूल्यांकन का औजार मानते हैं। “तुम आँगन में स्वेटर बुनती / मैं पढ़ता अख़बार।” “पगडंडी को सड़कें पूरें / गड्डों बाले घाव न पूरें।” लोकभाषा, घरेलू जीवन, श्रमिक की पीड़ा, किसान की चिंता- सब कुछ इतने सरल, गहन और आत्मीय ढंग से सामने आता
है कि ये गीत नामवर सिंह की ‘लोक-आधारित यथार्थवाद’ की माँग पर खरे उतरते
हैं।
- सृजन की
प्रामाणिकता: साहित्य तभी सार्थक है जब वह निष्कलुष यथार्थ,
संवेदना, और
जनबोलियों से प्रेरित हो।
- परंपरा और
नवीनता का संगम: उनका मानना था कि “परंपरा वह नहीं जो बस उत्तराधिकार
में मिली हो, परंपरा वह
है जो पुनःप्रयोग हो।“ वे यह भी मानते थे कि “नया साहित्य पारंपरिक शिल्प से
भी संवाद करे और अपनी ज़मीन भी खुद बनाए।“ श्रीवास्तव अपने गीतों में परंपरा
से जुड़े रहते हुए उसे आधुनिक अनुभवों से जोड़ते हैं। अंततः छायावादी गीतों
के भावलोक से बाहर निकलते हैं और नई संवेदना,
नई भाषा, और नई
शिल्प संरचना के साथ सामने आते हैं।
निष्कर्षत:
जय प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीत नामवर सिंह की समालोचना-दृष्टि के प्रमुख मापदंडों जैसे
जनसरोकार, यथार्थवाद, लोकसंवेदना, सामाजिक आलोचना और प्रामाणिक अभिव्यक्ति पर
पूरी तरह खरे उतरते हैं। इसलिए हम पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि अगर नामवर सिंह आज होते तो वे जय प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीतों को जनसरोकार वाले साहित्य का सशक्त उदाहरण मानते।
विसंगतियाँ: जय
प्रकाश श्रीवास्तव की कविताएँ नवगीत की संवेदनात्मक परंपरा का निर्वहन करते हुए
अर्थ, प्रतीक, और
सामाजिक यथार्थ के स्तर पर काफी गहराई लिए होती हैं। किंतु गीत विधा की अपेक्षा
अनुसार यदि हम छंद, लय, और शिल्प के कसौटी पर उन्हें जाँचें, तो कुछ स्थानों पर लयात्मकता की अनियमितता और
शिल्पगत असंतुलन अवश्य दिखाई देते हैं। लेकिन इन
लघु त्रुटियों के बावजूद, जय
प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीतों में अर्थगर्भिता, भाव-संवेदना
और समाज का जीवंत चित्रण इतनी प्रखरता से मौजूद है कि ये लयगत असंतुलन उनकी कविताई
की सामर्थ्य को प्रभावित नहीं करते। नवगीत की आत्मा लय से अधिक कथ्य और संवेदना
में होती है, और
इस कसौटी पर वे पूरी तरह सफल हैं।
समापन और समग्र विश्लेषण:
जय प्रकाश श्रीवास्तव समकालीन हिंदी नवगीत परंपरा के एक सशक्त, सजग और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनके गीतों
में सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण
जीवन की विसंगतियाँ, शोषण, व्यवस्था की विफलता, प्रकृति की मार और व्यक्ति की बेबसी को
अत्यंत सहज, प्रतीकात्मक
और संवेदनात्मक भाषा में प्रस्तुत किया गया है। ये गीत आज के समय के संकट को गहराई
और मार्मिकता के साथ उजागर करते हैं। उनके नवगीतों में श्रम, संघर्ष, संवेदना
और अस्मिता की बेचैनी स्पष्ट दिखाई देती है, जो
उन्हें अत्यंत समय-सापेक्ष और प्रभावशाली बनाती है।
1. प्रतीकात्मकता और यथार्थ का समागम: जय
प्रकाश के नवगीतों में प्रतीकों का उपयोग केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि यथार्थ की गहराई तक पहुँचने के लिए
किया गया है। जैसे:
"जूता" -
व्यवस्था का प्रतीक बनकर सामने आता है, जो
व्यक्ति के पाँव को काटता है, उसे
नियंत्रित करता है।
"शब्द पानी हो गये" -
यह पंक्ति संवेदना और अभिव्यक्ति की मृत्यु को दर्शाती है, जहाँ शब्द अब अर्थहीन हो गए हैं।
"प्यास" -
केवल जल की नहीं, बल्कि
न्याय, अधिकार और सम्मान की सतत प्यास को अभिव्यक्त
करती है।
इन
प्रतीकों के माध्यम से कवि सामाजिक विडंबनाओं को गहराई से उद्घाटित करता है।
2. ग्रामीण यथार्थ और किसान जीवन: जय
प्रकाश के नवगीतों में गाँव, खेत, किसान, बारिश, चूल्हा, आँगन
जैसे देशज प्रतीक उभरकर आते हैं। उनकी कविताएँ ग्रामीण भारत के संघर्ष और शोषण को
जीवंत कर देती हैं:
"धार बगावत पर उतरी है"
— किसान के आक्रोश, धरती
की पीड़ा और मौसम की बेरुखी का चित्रण।
"भोर का चूल्हा" -
श्रमिकों की दिनचर्या, थकावट
और जीवन की दुश्वारियों को उजागर करता है।
"आस में" -
यह गीत किसानों की आर्थिक बदहाली, मुआवज़े
की प्रतीक्षा और सरकारी उपेक्षा का प्रामाणिक दस्तावेज़ बन जाता है।
3. स्त्री जीवन और श्रम की व्यथा: जय
प्रकाश की कविताओं में स्त्री का श्रम, उसकी
चुप पीड़ा और सामाजिक भूमिकाएँ अत्यंत मार्मिकता से चित्रित हैं:
"सुबह बुहारी / शाम निचोई / रात सुबकती सी महरी
है" - यह पंक्तियाँ स्त्री की थकान, उसकी चुप्पी और भावनात्मक क्लांतता का गहरा
चित्र रचती हैं।
"गृहस्थी", "रात में अब
लोरियाँ", "फंदों
पर नाचे उँगली"
इन
रचनाओं में स्त्री के पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों को अत्यंत आत्मीयता से उकेरा
गया है।
4. सामाजिक विडंबनाएँ और व्यवस्था की आलोचना:
जय प्रकाश श्रीवास्तव का नवगीत व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और प्रतिरोध का स्वर
मुखर करता है:
"समय ढोता / समस्या है / पाँव में जूता",
"हो रही हैं विकारों में संधियाँ",
"सभ्यता की ड्योढ़ियों को लाँघकर खड़ा है निर्वस्त्र
होकर आदमी"
इन
पंक्तियों में सत्ता की विफलता, सामाजिक
मूल्यों का क्षरण और मनुष्यता के संकट को अत्यंत तीव्रता से अभिव्यक्त किया गया
है।
5. प्रकृति और संवेदना का द्वंद्व:
प्रकृति जय प्रकाश के गीतों में केवल सौंदर्य का स्रोत नहीं, बल्कि संघर्ष, चुनौती
और विडंबना की प्रतीक बन जाती है:
"बैठ नदी / फिर तट पर रोई",
"जंगल अंगार हो गया",
"प्यासा हिरण",
"बर्फ गिरी है"
इन
पंक्तियों में प्रकृति कभी विद्रोह करती है, कभी
मौन रहती है, तो
कभी मनुष्य की असहायता की साझीदार बन जाती है।
जय प्रकाश श्रीवास्तव के नवगीत समयसापेक्ष क्यों हैं?
- वे समाज की
मौजूदा समस्याओं को सीधे छूते हैं- जैसे किसान आत्महत्या,
बेरोजगारी, महँगाई,
स्त्री संघर्ष, राजनीतिक
विडंबनाएँ।
- वे
प्रतीकों के माध्यम से गूढ़ सन्देश देते हैं- जैसे "जूता",
"धार", "शब्द",
"प्यास", "पतंग",
"धूप", "महरी"।
- वे आमजन की
आवाज़ हैं — सहज भाषा, सीधा कथ्य,
गहरी संवेदना।
- उनकी
कविताएँ संवेदनात्मक और वैचारिक संतुलन बनाए रखती हैं- न अति भावुक,
न अति बौद्धिक- यही संतुलन उन्हें प्रासंगिक और
प्रभावशाली बनाता है।
निष्कर्षतः जय प्रकाश श्रीवास्तव
के नवगीत समकालीन समाज के जीवंत दस्तावेज़ हैं। वे नवगीत को केवल सौंदर्यबोध का
नहीं, बल्कि प्रतिरोध, पीड़ा और परिवर्तन का माध्यम बनाते हैं। उनकी
कविताओं में कविता और यथार्थ के बीच एक सशक्त सेतु दिखाई देता है, जो पाठक को भीतर तक झकझोरता है और सोचने को
विवश करता है।
उनके
गीतों में टूटता हुआ समाज, संघर्षशील
किसान, श्रमिक स्त्री, विकृत
होती व्यवस्था, और
मरणासन्न संवेदनाएँ पूरी आत्मा के साथ समाहित हैं। इन रचनाओं की भाषा में गहरी
संवेदना, लोकजीवन की सोंधी गंध, और अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना स्पष्ट रूप से
झलकती है।
जय
प्रकाश श्रीवास्तव के गीत यह सिद्ध करते हैं कि कविता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण और चेतना का प्रभावशाली
उपकरण है।
हम
उनके सृजनशील, स्वस्थ
एवं सुदीर्घ जीवन की हार्दिक कामना करते हैं।
जयपुर
‘चंद्रप्रभा विला’
417, रॉयल रेजीडेंसी-प्रथम
सारंगपुरा, बड़ के बालाजी,
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