नवगीत दिवस समारोह: एक ऐतिहासिक पहल

नवगीत दिवस समारोह: एक ऐतिहासिक पहल


पिछले लगभग दो महीनों से चला आ रहा एक साझा संकल्प 5 फ़रवरी को देशभर में शांति और उत्साह के साथ पूर्ण हुआ। नवगीत दिवस का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ—इसके लिए सभी सहभागी साधकों, आयोजकों और रचनाकारों को बधाई।

यह तथ्य विचारणीय है कि 4 फ़रवरी तक इस पहल के विरुद्ध कोई संगठित आपत्ति सामने नहीं आई; किंतु 5 फ़रवरी को अचानक अनेक प्रतिरोधी स्वर उभर आए। इस संदर्भ में डॉ. राजेंद्र गौतम जी द्वारा प्राप्त टिप्पणी  का उल्लेख आवश्यक हो जाता है।

यह स्वीकार्य तथ्य है कि हिंदी साहित्येतिहास में किसी साहित्यिक आंदोलन, विधा या काव्य-रूप का दिनांक-आधारित ‘जन्मदिन’ निर्धारित करने की कोई सुदृढ़ परंपरा नहीं रही है। साहित्यिक प्रवृत्तियाँ सामान्यतः क्रमिक विकास का परिणाम होती हैं, किसी एक दिन घटित होने वाली घटना का नहीं। इस दृष्टि से नवगीत को किसी एक तिथि से जोड़ने पर प्रश्न उठाया जाना स्वाभाविक है। इसी प्रकार यह भी तथ्य है कि गीतांगिनी (1958) में प्रयुक्त ‘नवगीत’ शब्द और बाद में विकसित नवगीत की काव्य-प्रवृत्ति के बीच पूर्ण तादात्म्य नहीं माना जा सकता। इन बिंदुओं पर की गई आपत्तियों को मात्र भावनात्मक या दुर्भावनापूर्ण कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब इन्हीं आंशिक तथ्यों के आधार पर पूरे नवगीत आंदोलन, उसके इतिहास और समकालीन रचनात्मक परिदृश्य को ही अवैध ठहराने का प्रयास किया जाता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि नवगीत दिवस मनाने का आशय किसी विधा का ‘जन्मदिन घोषित करना’ नहीं है, बल्कि नवगीत की ऐतिहासिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव—गीतांगिनी के प्रकाशन और ‘नवगीत’ शब्द के मुद्रित प्रयोग—को स्मरणात्मक एवं प्रतीकात्मक रूप में रेखांकित करना है। साहित्य में ऐसे प्रतीकात्मक स्मरण-दिवस, यदि ऐतिहासिक ‘जन्म’ का दावा किए बिना देखे जाएँ, तो वे असंगत नहीं कहे जा सकते।

यह निर्विवाद सत्य है कि नवगीत के बीज सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में विद्यमान हैं और उनके बिना नवगीत के इतिहास की कल्पना अधूरी है। इस तथ्य को न नवगीत दिवस के आयोजकों ने नकारा है और न ही नकारा जाना चाहिए। किंतु केवल इसी आधार पर 5 फ़रवरी के आयोजन को ‘नवगीत-विरोधी’ या ‘नवगीत का घातक’ ठहराना एक संकीर्ण और अनैतिहासिक निष्कर्ष है। नवगीत का विकास निराला से प्रारंभ होकर अनेक कवियों, आलोचकों और दशकों के सामूहिक संघर्ष से होकर गुज़रा है—और यही सामूहिकता नवगीत की मूल आत्मा के अधिक निकट है।

यह भी सही है कि नवगीत की पहचान समष्टिपरकता, वस्तुपरकता, सामाजिक सरोकार और शिल्पगत नवता से निर्मित हुई है। यदि आज नवगीत के नाम पर रूढ़, भावुकतावादी और शिल्पहीन रचनाओं का समावेश हो रहा है, तो उस पर आपत्ति न केवल जायज़, बल्कि आवश्यक है। किंतु ऐसी विकृतियों के लिए नवगीत दिवस जैसे आयोजनों को उत्तरदायी ठहराना तर्कसंगत नहीं है। किसी भी विधा में आई गिरावट का समाधान स्मरण और संवाद को रोकना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक को और अधिक सुदृढ़ करना होता है।

यह भी विचारणीय है कि 5 फ़रवरी को नवगीत दिवस के विरोध में सक्रिय होने वाले अनेक लोगों का नवगीत के रचनात्मक या आलोचनात्मक विकास में प्रत्यक्ष योगदान सीमित रहा है। केवल एक शोध-ग्रंथ—नवगीत : उद्भव और विकास—लिख देना किसी को नवगीत की सम्पूर्ण वैचारिक दिशा का निर्णायक बना देता है, यह मान लेना स्वयं में अतिरंजना है। निस्संदेह, यह डॉ. राजेंद्र गौतम जी की मूल्यवान कृति है और इसका संदर्भ आज भी प्रासंगिक है; किंतु क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नवगीत के विकास और उसकी वैचारिकी को जीवंत रखने वाले अन्य साधकों का योगदान गौण हो जाए? इसमें स्वयं डॉ. राजेंद्र गौतम का भी योगदान अमिट रहेगा। 

नवगीत की पहचान और प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति या ग्रंथ से नहीं, बल्कि अनेक रचनाकारों, आलोचकों और संपादकों के दीर्घकालीन, सतत और सामूहिक योगदान से निर्मित हुई है। इस परंपरा में डॉ. शंभुनाथ सिंह का स्थान विशेष रूप से केंद्रीय और वरिष्ठ है। उनकी कृतियाँ— नवगीत दशक, नवगीत दशक–2, नवगीत दशक–3, नवगीत अर्धशती तथा नवगीत सप्तक—ने नवगीत को ऐतिहासिक पहचान देने के साथ-साथ उसकी रचनात्मक और वैचारिक सीमाओं को भी स्पष्ट किया।

इसी क्रम में देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’ का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनकी कृतियाँ— यात्रा में साथ-साथ और हरियर धान–रुपहरे चावल—के साथ-साथ उनकी असंख्य समीक्षाओं ने लंबे समय तक नवगीत को आलोचनात्मक विमर्श के केंद्र में बनाए रखा। ठाकुर प्रसाद सिंह (बंशी और मादल), नचिकेता (गीत वसुधा, समकालीन गीतकोष, जनगीत अष्टक), वीरेंद्र आस्तिक (धार पर हम, धार पर हम–2), निर्मल शुक्ल (शब्दायन, नवगीत–नई दस्तकें, शब्दपदी) तथा राधेश्याम बंधु (नवगीत और उसका युगबोध, नवगीत के नए प्रतिमान, नवगीत का लोकधर्मी सौंदर्यबोध, नवगीत का मानवतावाद) ने नवगीत की काव्यदृष्टि, शिल्प और सामाजिक सरोकारों को सैद्धांतिक दृढ़ता प्रदान की।

इसके अलावा योगेंद्र दत्त शर्मा (गंध सिंदूरी भाग–1, भाग–2), भारतेन्दु मिश्र (नवगीत एकादश), ओम प्रकाश सिंह (नयी सदी के नवगीत भाग–1 से 5 तथा साहित्य अकादमी से प्रकाशित समकालीन नवगीत संचयन), शिव कुमार अर्चन (सप्तराग), श्याम नारायण मिश्र (केंद्र में नवगीत), चन्द्र देव सिंह (सं.) (पाँच जोड़ बाँसुरी), विनोद तिवारी (भोपाल दशक), कृष्ण कुमार ‘नाज़’ (मन की सतह पर) और डॉ. रंजीत पटेल (सहयात्री समय के) जैसे रचनाकारों और संपादकों ने नवगीत की विविध प्रवृत्तियों को व्यापक फलक प्रदान किया।

डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ का नवगीत संबंधी कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय और आधारग्रंथीय महत्त्व का है। नवगीत कोश, नवगीत के सृजन-सारथी (भाग–1, 2, 3; भाग–4 प्रकाशनाधीन), नवगीत: नए स्वर तथा आभासी दुनिया के नवगीत जैसी कृतियाँ नवगीत के आलोचनात्मक अनुशीलन, शब्दावली और इतिहास-लेखन को संगठित करती हैं।

पिछले लगभग एक दशक से आभासी मंचों (फेसबुक, व्हाट्सएप आदि) के माध्यम से भी नवगीत पर सार्थक और संगठित कार्य हो रहा है। इस क्रम में पूर्णिमा वर्मन (अभिव्यक्ति वेब-पत्रिका तथा नवगीत महोत्सव जैसे कार्यक्रम), राम किशोर दाहिया (संवेदनात्मक आलोक : विश्व नवगीत विचार मंच), शिवानंद सहयोगी (नवगीत कुटुंब), मनोज जैन (वागर्थ) और अनामिका सिंह (कंदील) जैसे साधकों ने नवगीत के समकालीन संवाद और प्रसार को नई दिशा दी है।

इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी में अवनीश त्रिपाठी (नवगीत की नयी चेतनाएँ, नवगीत की नयी पीढ़ी), मनोज जैन और अनामिका सिंह (आलाप) जैसे रचनाकार नवगीत को वर्तमान समय की संवेदनाओं, द्वंद्वों और प्रश्नों से जोड़ते हुए उसकी निरंतरता को सशक्त बनाए हुए हैं। इस क्रम में अल्पायु में ही शुभम श्रीवास्तव ‘ओम’ (हम असहमत हैं समय से) का रचनात्मक अवदान भी उल्लेखनीय है, जो नवगीत की वैचारिक असहमति और युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।

वहीं नवगीत दिवस समारोह की पहल करने वाले अग्रपुरुष शिवानंद सिंह सहयोगी का योगदान भी कम महत्त्व का नहीं है। नवगीत अर्धशतक (भाग–1 और भाग–2) के संपादन एवं नवगीत को मंचीय, आलोचनात्मक और सामूहिक पहचान दिलाने के उनके प्रयासों ने इस विधा की समकालीन सक्रियता को नई दिशा प्रदान की है।

यह मान लेना कि 5 फ़रवरी को नवगीत दिवस मनाने से इन सभी का योगदान स्वतः हाशिये पर चला जाएगा, भय-आधारित और अतार्किक निष्कर्ष है। यदि किसी आयोजन मात्र से किसी विधा का इतिहास मिटाया जा सकता, तो साहित्य की कोई परंपरा जीवित न रहती। वस्तुतः स्मरण-दिवस साहित्यिक परंपराओं के प्रति पुनः ध्यान आकृष्ट करने का अवसर प्रदान करते हैं—बशर्ते उन्हें वैचारिक विवेक के साथ ग्रहण किया जाए।

नवगीत दिवस को किसी एक व्यक्ति, ग्रंथ या तिथि तक सीमित कर देना निस्संदेह अनुचित होगा; किंतु इसे नवगीत की पूरी परंपरा के विरुद्ध षड्यंत्र के रूप में देखना भी उतना ही संकीर्ण दृष्टिकोण है। नवगीत न किसी एक तिथि का मोहताज है, न किसी एक आयोजन का; उसकी वास्तविक शक्ति उसके युगबोध, सामाजिक सरोकार, शिल्पगत नवता और सामूहिक रचनात्मक चेतना में निहित है।

अतः प्रश्न नवगीत दिवस मनाने या न मनाने का नहीं है; प्रश्न यह है कि क्या हम नवगीत की मूल काव्य-दृष्टि की रक्षा कर पा रहे हैं। यदि वह सुरक्षित है, तो किसी एक दिवस के आयोजन से न डॉ. शंभुनाथ सिंह खारिज होते हैं, न देवेंद्र शर्मा ‘इंद्र’, न नचिकेता, न निर्मल शुक्ल, न वीरेंद्र आस्तिक—और न ही नवगीत की साधना में रत असंख्य रचनाकार और आलोचक।

अंततः, इस विरोध का भी स्वागत किया जाना चाहिए—क्योंकि संवाद के केंद्र में नवगीत ही है।

सादर.
अशोक शर्मा ‘कटेठिया’

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