“अंधकार में मनुष्यता की तलाश: ‘जहाँ नहीं उजियार’ - अशोक शर्मा ‘कटेठिया’

 

अंधकार में मनुष्यता की तलाश: ‘जहाँ नहीं उजियार’

-    अशोक शर्मा ‘कटेठिया

हिंदी कविता की समकालीन यात्रा में नवगीत एक ऐसी काव्य-विधा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, जिसने परंपरागत गीतात्मकता को यथार्थ-बोध, सामाजिक हस्तक्षेप और आधुनिक संवेदना से जोड़ते हुए उसे नया स्वरूप प्रदान किया है। नवगीत ने न केवल गीत की लयात्मक विरासत को सुरक्षित रखा, बल्कि उसे समय, समाज और मनुष्य की जटिल स्थितियों के अनुरूप पुनर्गठित भी किया। युवा नवगीत कवि योगेन्द्र प्रताप मौर्य की प्रस्तुत समीक्षकीय कृति ‘जहाँ नहीं उजियार’ की समालोचनात्मक समीक्षा इसी नवगीत-परंपरा की निरंतरता और विकास-क्रम को ध्यान में रखते हुए करने का प्रयास है, जिसका उद्देश्य कृति के शिल्प, संवेदना और वैचारिक आधार को नवगीत की परंपरा और समकालीन साहित्यिक विमर्श के भीतर समझना और मूल्यांकित करना है।

कवि के आत्मकथ्य से यह स्पष्ट होता है कि उनकी काव्य-यात्रा किसी आकस्मिक प्रेरणा का परिणाम नहीं, बल्कि अनुभव, अध्ययन, सामाजिक चेतना और सतत आत्मसंघर्ष से निर्मित है। कवि कविता को केवल आत्माभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानता, बल्कि उसे सामाजिक दायित्व से जुड़ी एक सक्रिय सर्जनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखता है। आत्मकथ्य में गीत से नवगीत की ओर उनके झुकाव, वरिष्ठ नवगीतकारों से प्राप्त मार्गदर्शन, तथा समकालीन यथार्थ के प्रति उनकी प्रतिबद्धता रेखांकित होती है। यह आत्मस्वीकार कविता को निजी भावुकता से निकालकर सामाजिक संवाद का उपकरण बना देता है।

इस संदर्भ में आदरणीय जगदीश पंकज द्वारा प्रस्तुत भूमिका/समीक्षा उल्लेखनीय है। वे इन नवगीतों को मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति मानते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि संग्रह की रचनाएँ समकालीन सामाजिक यथार्थ—वर्गीय विषमता, हाशिए का समाज, सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक असंतुलन और मानवीय पीड़ा—को केवल दर्ज नहीं करतीं, बल्कि उनके प्रति एक स्पष्ट नैतिक दृष्टि भी विकसित करती हैं। समीक्षक के अनुसार कवि यथार्थ को न तो प्रत्यक्ष नारेबाज़ी में रूपांतरित करता है और न ही सौंदर्यात्मक आवरण में छिपाता है; बल्कि गीतात्मक शिल्प के अनुशासन में रहते हुए उसे प्रश्नाकुल और आलोचनात्मक स्वर प्रदान करता है। इसी संतुलन के कारण वे इस संग्रह को समकालीन नवगीत की मुख्यधारा में एक सार्थक और महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में स्वीकार करते हैं।

यदि नवगीत के संक्षिप्त इतिहास पर दृष्टि डाली जाए, तो इसके बीज छायावादोत्तर गीत-काव्य में दिखाई देते हैं। पचास और साठ के दशकों में जब गीत अत्यधिक वैयक्तिक और भावुक हो चला था, तब कुछ कवियों ने उसे समकालीन यथार्थ से जोड़ने का प्रयास किया। इस क्रम में गीत ने अपना रूप बदला और ‘नवगीत’ के रूप में सामने आया। नवगीत की पहचान—संक्षिप्तता, बिंबात्मकता, प्रतीक-योजना, समसामयिक विषयवस्तु, लोक-जीवन से जुड़ाव और स्पष्ट सामाजिक चेतना—ने उसे आधुनिक हिंदी कविता की एक सशक्त विधा बना दिया। “हर गीत नवगीत नहीं होता, पर हर नवगीत का गीत होना आवश्यक है”—यह कथन नवगीत की आत्मा को स्पष्ट करता है।

प्रस्तुत कृति ‘जहाँ नहीं उजियार’ के नवगीत इसी ऐतिहासिक परंपरा के भीतर खड़े होकर अपने समय से संवाद करते हैं। इनमें गीतात्मक प्रवाह भी है और विचार का तीखापन भी; लोक-संवेदना भी है और समकालीन संकटों की पहचान भी। कवि का आत्मकथ्य, जगदीश पंकज जी की समीक्षा और नवगीत की विकास-रेखा—तीनों मिलकर इस पुस्तक को केवल रचनाओं का संकलन नहीं, बल्कि समय के दस्तावेज़ के रूप में स्थापित करते हैं।

प्रस्तुत नवगीत-संग्रह की एक प्रमुख विशेषता इसकी व्यापक और बहुआयामी विषय-वस्तु है। यह संग्रह समकालीन समाज की किसी एक परत तक सीमित न रहकर उसके अनेक अंतर्विरोधी, जटिल और पीड़ादायक आयामों को गीतात्मक संरचना के भीतर अभिव्यक्त करता है। यहाँ नवगीत केवल सौंदर्य या अनुभूति की विधा न रहकर समय-साक्ष्य के रूप में उपस्थित होता है।

इन गीतों में सामाजिक यथार्थ और वर्गीय चेतना की स्पष्ट अभिव्यक्ति है; राजनीतिक विडंबनाओं और सत्ता-संरचनाओं पर आलोचनात्मक दृष्टि है; सांप्रदायिकता, हिंसा और मानवीय संकट के प्रति संवेदनशील चिंता है; स्त्री, परिवार और निजी जीवन से जुड़े प्रश्नों की तीक्ष्ण प्रस्तुति है; पर्यावरण, प्रकृति और आधुनिक सभ्यता से उत्पन्न संकटों का बोध है; साथ ही आशा, प्रतिरोध और भविष्य-दृष्टि का स्वर भी विद्यमान है। इसके अतिरिक्त, यह संग्रह नवगीत-परंपरा के भीतर अपनी स्थिति और प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है।

सामाजिक यथार्थ और वर्गीय चेतना

नवगीत-संग्रह “जहाँ नहीं उजियार” का केन्द्रीय सरोकार सामाजिक यथार्थ की उस कठोर भूमि से जुड़ा है, जहाँ विकास, लोकतंत्र और समृद्धि के तमाम दावे हाशिए पर खड़े मनुष्यों के जीवन में उजाला नहीं ला सके हैं। इस संग्रह के नवगीतों में कवि की दृष्टि स्पष्टतः श्रमशील, वंचित और बहुजन समाज की ओर उन्मुख है—पर यह दृष्टि करुणा तक सीमित न रहकर प्रश्नाकुल और हस्तक्षेपकारी बन जाती है।

संग्रह का शीर्षक गीत “जहाँ नहीं उजियार” ही इस वर्गीय चेतना का घोषवाक्य प्रतीत होता है—

देख रहा हूँ उस बस्ती को
जहाँ नहीं उजियार,
भूखे–नंगे बच्चे सारे
घर भी हैं बीमार—
(गीत: “जहाँ नहीं उजियार”)

इन पंक्तियों में ‘बस्ती’ केवल भौगोलिक इकाई नहीं रह जाती, बल्कि वह उस सामाजिक संरचना का प्रतीक बन जाती है, जहाँ गरीबी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है। कवि आगे कहता है—

जुटा नहीं है कभी पास में

इतना-सा धन भी,

हिस्से में यूँ आते इनके

सुविधा–साधन भी—

(गीत: “जहाँ नहीं उजियार”)

यहाँ “इतना-सा धन” और “सुविधा–साधन” जैसे शब्द नवगीत की संवेदनात्मक भाषा में वर्गीय असमानता को तीखे ढंग से उभारते हैं। यह गरीबी भावुक विवरण नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभियोग है।

संग्रह के कई गीतों में श्रमिक वर्ग की चेतना संघर्षशील रूप में सामने आती है। गीत “हम कर्मठ इंसान” में श्रम की गरिमा और आत्मसम्मान को स्वर दिया गया है—

हमने काटे हैं पहाड़ तो
तोड़ी है चट्टान,
देख रहे हैं आँखों से सब
हम कर्मठ इंसान—
(गीत: “हम कर्मठ इंसान”)

यह श्रमिक वर्ग का आत्मबोध है—वह अपने श्रम को पहचानता है और व्यवस्था से प्रश्न करता है कि फिर भी वह वंचित क्यों है। यह चेतना नवगीत को केवल यथार्थ-वर्णन से आगे ले जाकर वर्गीय आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति बनाती है।

बहुजन समाज की ऐतिहासिक पीड़ा और निरंतर दमन का स्वर नवगीत हम ‘बहुजन’ हैं में और अधिक स्पष्ट तथा मुखर होकर उभरता है—

हम “बहुजन” हैं हमीं?
प्रताड़ित होते आए हैं,
वर्षों से हम
इस दुनिया में रोते आए हैं—

(गीत: “हम ‘बहुजन’ हैं”)

इन पंक्तियों में ‘बहुजन’ शब्द मात्र सांख्यिकीय पहचान नहीं रह जाता, बल्कि वह संघर्ष, पीड़ा और ऐतिहासिक अन्याय से निर्मित एक सामूहिक चेतना का प्रतीक बन जाता है। गीत में उपस्थित प्रश्नवाचक स्वर बहुजन अस्मिता की उस विडंबना को उजागर करता है, जिसमें संख्या में बहुल होने के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक हाशियाकरण बना रहता है। यह पंक्ति आत्मदया नहीं, बल्कि इतिहास-बोध है।

इस प्रकार यह नवगीत बहुजन पहचान को पुनः परिभाषित करता है और सामाजिक इतिहास से सीधा संवाद स्थापित करता है। यहाँ नवगीत स्मृति, प्रतिरोध और आत्म–स्वीकृति की प्रक्रिया का हिस्सा बनकर उभरता है—जो केवल अतीत का शोक नहीं, बल्कि वर्तमान के अन्याय पर एक सजग टिप्पणी भी है।

दलित–वंचित वर्ग के अधिकारों तथा उनकी ऐतिहासिक अनुपस्थिति को नवगीत ऊँची चारदीवारी” में तीव्र राजनीतिक प्रतीकात्मकता के साथ प्रस्तुत किया गया है—

शोषित, वंचित और उपेक्षित
की हो भागीदारी,
इस संसद के नए भवन की
यह भी ज़िम्मेदारी—
(गीत: “ऊँची चारदीवारी”)

इन पंक्तियों में नवगीत सत्ता–संरचना पर सीधा और असंदिग्ध प्रश्न खड़ा करता है। यह हस्तक्षेप केवल सामाजिक संवेदना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राजनीतिक और वर्गीय चेतना के स्पष्ट स्वर में रूपांतरित हो जाता है। नया संसद भवन यहाँ केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहभागिता की कसौटी के रूप में उपस्थित है।

नवगीतकार की यह अपेक्षा कि दलित–वंचित और उपेक्षित वर्गों की वास्तविक भागीदारी संसद के वैचारिक और नैतिक दायित्व का हिस्सा हो, न केवल उचित है, बल्कि समकालीन लोकतांत्रिक परिस्थितियों में समय–सापेक्ष भी है। इस प्रकार यह गीत नवगीत को सत्ता–विमर्श से जोड़ते हुए उसे प्रतिरोध और जवाबदेही की कविता में रूपांतरित करता है।

बाल-श्रम और बचपन की छिनी हुई संभावनाओं को गीत “बचपन बीत रहा है” में मार्मिक किन्तु सटीक ढंग से उकेरा गया है—

नचा रही मजबूरी यहाँ
उँगलियों पर,
ध्यान किसी का जाता नहीं
सिसकियों पर—
(गीत: “बचपन बीत रहा है”)

यह गीत बताता है कि वर्गीय शोषण किस तरह बचपन तक को निगल जाता है। यहाँ करुणा के साथ-साथ व्यवस्था के प्रति तीखा आक्रोश भी निहित है।

संग्रह के नवगीतों की विशेषता यह है कि वे वंचित वर्ग को ‘दया का पात्र’ नहीं बनाते, बल्कि चेतन, संघर्षशील और प्रश्नाकुल मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। कवि की वर्गीय चेतना किसी वैचारिक नारेबाज़ी में नहीं ढलती, बल्कि जीवन की ठोस स्थितियों से उपजती है—भूख, श्रम, विस्थापन, बेरोज़गारी और असमानता से।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि “जहाँ नहीं उजियार” के नवगीत सामाजिक यथार्थ को उसकी पूरी कठोरता और सच्चाई के साथ सामने लाते हैं। यह संग्रह नवगीत को एक ऐसी विधा के रूप में स्थापित करता है, जो न केवल समय को दर्ज करती है, बल्कि वर्गीय अन्याय के विरुद्ध संवेदनात्मक और वैचारिक हस्तक्षेप भी करती है। यही इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक और सामाजिक उपलब्धि है।

राजनीतिक विडंबनाएँ और सत्ता–समीक्षा

नवगीत-संग्रह जहाँ नहीं उजियार” की एक अत्यंत सशक्त और विचारोत्तेजक धारा उसकी राजनीतिक चेतना है। यह चेतना किसी दलविशेष या वैचारिक खेमे की वकालत नहीं करती, बल्कि सत्ता की समूची संरचना को आम आदमी के अनुभवों के धरातल पर परखती है। कवि के यहाँ राजनीति एक अमूर्त विमर्श नहीं, बल्कि भय, हिंसा, अन्याय और छल के रूप में प्रत्यक्ष जीवन-सत्य बनकर सामने आती है।

गीत क्या हुआ” से लेकर क्रूर समय का पिंजरा”, जनता का कारिंदा है”, “आवाज़ उठायी है” और ऊँची चारदीवारी” तक सत्ता के विभिन्न रूप उजागर होते हैं—कभी युद्धोन्माद में, कभी लोकतंत्र के नाम पर चलने वाले छल में, तो कभी न्याय-व्यवस्था की निष्क्रियता में।

राजनीति के भयावह और हिंसक चेहरे को कवि इस तरह रूपायित करता है—

रोज़ डराता राजनीति
का तेवर है,
खुलेआम सड़कों पर
होता फ़ायर है
(गीत: “आवाज़ उठायी है”)

यहाँ ‘तेवर’ और ‘फ़ायर’ लोकतंत्र के उस विकृत रूप के प्रतीक हैं, जहाँ सत्ता संवाद के बजाय दमन की भाषा बोलती है। राजनीति आम नागरिक के लिए सुरक्षा नहीं, बल्कि निरंतर भय का कारण बन जाती है।

न्याय-व्यवस्था और सत्ता की सांठगाँठ पर कवि जिस प्रश्न को उठाता है, वह आक्रोश का क्षणिक विस्फोट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर जड़ जमा चुकी नैतिक विकृति की सघन पहचान है।

किसने कितनी देह

नोचकर खाई है,

‘जस्टिस’ मिलने में

कितनी कठिनाई है—

(गीत: आवाज़ उठायी है)

यहाँ “देह” केवल शारीरिक इकाई नहीं रह जाती, बल्कि वह मानव गरिमा, श्रम, अस्मिता और जीवन-अधिकार का समग्र रूपक है। “नोचकर खाना” सत्ता और न्याय-तंत्र की उस हिंसक प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है, जहाँ पीड़ित की पीड़ा को मुद्दा नहीं, साधन बना लिया जाता है। यह भाषा नवगीत की परंपरागत कोमलता से हटकर सचेतन रूप से खुरदरी और असुविधाजनक है—क्योंकि यथार्थ स्वयं खुरदरा है।

‘जस्टिस’ शब्द का अंग्रेज़ी में आना भी महत्वपूर्ण है। यह न्याय के औपनिवेशिक, संस्थागत और औपचारिक स्वरूप की ओर संकेत करता है—ऐसा न्याय जो काग़ज़, तारीख़, फीस, वकील और सत्ता-संपर्कों की भूलभुलैया में उलझकर आम आदमी की पहुँच से बाहर हो जाता है। न्याय यहाँ नैतिक मूल्य न रहकर प्रशासनिक उत्पाद बन जाता है, जिसकी उपलब्धता वर्ग, पूँजी और पहुँच से तय होती है।

इन पंक्तियों में न्याय-व्यवस्था और सत्ता की सांठगाँठ एक अनकही स्वीकृति की तरह उपस्थित है। कवि यह प्रश्न नहीं पूछता कि “न्याय क्यों नहीं मिला”, बल्कि यह कि न्याय मिलने से पहले कितनी देहें चुकानी पड़ीं—अर्थात न्याय की प्रक्रिया स्वयं कितनी अमानवीय हो चुकी है। यह प्रश्न व्यवस्था की वैधता पर सीधा आघात करता है।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह नवगीत अनुभूति नहीं, अभियोग है। यह लोकतंत्र के उस मिथक को तोड़ता है जिसमें न्याय को स्वाभाविक, निष्पक्ष और सुलभ मान लिया जाता है। यहाँ न्याय एक दूरस्थ, लगभग अप्राप्य अवधारणा बन जाता है—विशेषकर शोषित, वंचित और हाशिये के समुदायों के लिए, जिनके लिए न्याय सपना है, प्रक्रिया नहीं।

इस प्रकार, गीत “आवाज उठायी है” की ये पंक्तियाँ नवगीत को केवल संवेदना की विधा नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे प्रतिरोध की वैचारिक भूमि पर खड़ा कर देती हैं—जहाँ कवि न्याय की माँग नहीं करता, बल्कि उसकी अनुपस्थिति को ऐतिहासिक अपराध के रूप में दर्ज करता है।

गीत ऊँची चारदीवारी” में संसद और सत्ता-प्रतिष्ठानों की भव्यता के पीछे छिपी विडंबना सामने आती है—

शोषित, वंचित और उपेक्षित
की हो भागीदारी,
इस संसद के नये भवन की
यह भी ज़िम्मेदारी—

(गीत: ऊँची चारदीवारी)

यहाँ ‘नया भवन’ लोकतंत्र के दिखावटी विकास का प्रतीक है, जबकि वास्तविक लोकतंत्र—भागीदारी और प्रतिनिधित्व—अब भी अधूरा है। नवगीत सत्ता से यह सीधा सवाल करता है कि यदि वंचितों की भागीदारी नहीं, तो यह लोकतंत्र किसका है?

राजनीतिक पाखंड और जनप्रतिनिधियों की दोहरी भूमिका को गीत जनता का कारिंदा है” में व्यंग्यात्मक तीखेपन के साथ रेखांकित किया गया है—

कई कलाओं में
माहिर ये बंदा है,

अथवा

लोग कह रहे
जनता का कारिंदा है
(
गीत: “जनता का कारिंदा है”)

यह ‘कारिंदा’ जनता का सेवक कम और सत्ता का कुशल अभिनेता अधिक है। भाषण, आँसू और वादे—सब एक योजनाबद्ध अभिनय का हिस्सा हैं। कवि यहाँ बिना प्रत्यक्ष आरोप लगाए पूरी राजनीतिक नाटकबाज़ी को बेनकाब कर देता है।

गीत क्रूर समय का पिंजरा” में राजनीति समय के रूप में सामने आती है—एक ऐसा समय जो साँस लेने की जगह तक सीमित कर देता है—

राजनीति ने सिक्का
अजब उछाला है,
ज़िंदगियों में खलल
आज फिर डाला है—

(गीत: क्रूर समय का पिंजरा)

यह पंक्तियाँ बताती हैं कि राजनीति केवल सत्ता-केन्द्रों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामान्य जन-जीवन की लय को भी विकृत कर देती है।

इस पूरे संग्रह की विशेषता यह है कि राजनीतिक आलोचना कहीं भी नारेबाज़ी या प्रचारात्मक भाषा में नहीं ढलती। कवि प्रतीक, बिंब और व्यंग्य के माध्यम से सत्ता की संरचना पर प्रश्न उठाता है। यही कारण है कि नवगीत अपनी काव्यात्मक गरिमा बनाए रखते हुए एक सशक्त राजनीतिक हस्तक्षेप बन पाता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जहाँ नहीं उजियार” के नवगीत लोकतंत्र की विडंबनाओं, सत्ता के छल और न्याय-व्यवस्था की विफलताओं का निर्भीक पाठ प्रस्तुत करते हैं। यह सत्ता–समीक्षा किसी वैचारिक शोर में नहीं, बल्कि जीवन-सत्य से उपजी संवेदनात्मक चेतना में रूपांतरित होकर सामने आती है—और यही इस संग्रह को समकालीन नवगीत परंपरा में विशेष महत्व प्रदान करती है।

सांप्रदायिकता, हिंसा और मानवीय संकट

नवगीत-संग्रह जहाँ नहीं उजियार” का एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय पक्ष उसका सांप्रदायिकता, जातिगत विद्वेष और हिंसा के विरुद्ध खड़ा होना है। कवि यहाँ केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता की पहचान करता है जो धर्म, जाति और सत्ता के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से अलग कर देती है। इस विभाजन की परिणति हिंसा, भय और सामूहिक असुरक्षा के रूप में सामने आती है—और नवगीत इन्हीं परिणामों से टकराते हैं।

एक गीत में कवि स्पष्ट रूप से समकालीन सामाजिक कटुता पर प्रश्न उठाता है—

ठीक नहीं है दुनिया में जो
पनप रही कट्टरता,
जाति–धर्म में बैठकर–कटकर
मानव है नित मरता
(गीत: “फैला एक तनाव”)

इन पंक्तियों में ‘मरता’ शब्द केवल शारीरिक मृत्यु का संकेत नहीं देता, बल्कि मानवीय मूल्यों, सहअस्तित्व और संवेदना की निरंतर होती हत्या का भी प्रतीक है। जाति और धर्म यहाँ पहचान नहीं, बल्कि हिंसा के औज़ार बनकर उभरते हैं।

हिंसा के दृश्य और उसके भावनात्मक प्रभाव को कवि अत्यंत सधे हुए बिंबों में रचता है—

फैला एक तनाव
एक तरफ आँसू के गोले
एक तरफ है पत्थर,
(
गीत: “फैला एक तनाव”)

आँसू’ और ‘पत्थर’ के द्वंद्व में समकालीन समाज का पूरा मनोविज्ञान समाहित है। एक ओर पीड़ित मनुष्यता है, दूसरी ओर उन्माद और क्रूरता। यह द्वंद्व किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज को ग्रस लेता है।

आगे कवि समय के अमानवीय चेहरे को और गहराई से उभारता है—

थम जाती है साँस देखकर
आज वक्त का मंजर
(गीत: “फैला एक तनाव”)

यह पंक्ति बताती है कि हिंसा अब अपवाद नहीं रही; वह समय का ‘मंजर’ बन चुकी है। भय इतना गहन है कि वह मनुष्य की सहज साँसों तक को रोक देता है। नवगीत यहाँ एक गवाह की तरह नहीं, बल्कि एक व्यथित मनुष्य की तरह बोलता है।

संग्रह की विशेषता यह है कि कवि सांप्रदायिकता और हिंसा को किसी एक धर्म, जाति या विचारधारा तक सीमित नहीं करता। उसकी दृष्टि व्यापक मानवीय है। वह बार-बार संकेत करता है कि जब भी राजनीति और सत्ता मनुष्य की मूल पहचान पर हावी होती है, तब सबसे पहले मनुष्यता ही बलि चढ़ती है।

इन नवगीतों में युद्ध और सामाजिक संघर्ष केवल बाहरी घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि आंतरिक मानवीय विघटन के संकेत हैं। टूटता विश्वास, भयभीत बचपन, उजड़ते घर—ये सभी हिंसा के ऐसे परिणाम हैं जिन्हें कवि मौन लेकिन सघन संवेदना के साथ उकेरता है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि कवि समाधान का दावा नहीं करता, न ही उपदेश देता है। उसका प्रतिरोध कविता की संवेदनात्मक शक्ति में निहित है। वह घृणा के सामने मनुष्यता को, हिंसा के सामने करुणा को और विभाजन के सामने सहअस्तित्व को खड़ा करता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जहाँ नहीं उजियार” के नवगीत सांप्रदायिकता और हिंसा के विरुद्ध एक गहरे मानवीय हस्तक्षेप के रूप में सामने आते हैं। यह संग्रह याद दिलाता है कि यदि उजाला कहीं संभव है, तो वह सत्ता या उन्माद से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जीवित संवेदना से ही आएगा। यही इसकी वैचारिक और काव्यात्मक सार्थकता है।

स्त्री, परिवार और निजी संवेदना

नवगीत-संग्रह जहाँ नहीं उजियार” का मुख्य स्वर भले ही सामाजिक यथार्थ और सामूहिक संघर्षों से निर्मित हो, किन्तु इसके भीतर निजी और पारिवारिक संवेदनाओं की एक सशक्त, आत्मीय और विश्वसनीय उपस्थिति भी दिखाई देती है। ये गीत यह स्पष्ट करते हैं कि समाज की बड़ी संरचनात्मक समस्याएँ—गरीबी, विस्थापन, असुरक्षा—अंततः परिवार और व्यक्ति के जीवन में ही सबसे पहले और सबसे गहरे स्तर पर घटित होती हैं।

माँ, पिता, बचपन, स्मृति और संबंध यहाँ किसी भावुक आदर्श की तरह नहीं आते, बल्कि जीवनानुभव से उपजी सच्चाइयों के रूप में उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि इन गीतों में निजी भावनाएँ भी सामाजिक संदर्भ से कटकर नहीं, बल्कि उससे जुड़कर अर्थ ग्रहण करती हैं।

पारिवारिक जीवन की टूटन और बदलते समय की विडंबना को कवि इन पंक्तियों में अत्यंत सजीव रूप में उकेरता है—

घर जिसमें गूँजी शहनाई,
गूँजी किलकारियाँ,
लिये आज आँखों में आँसू
जीता लाचारी
(गीत: “गाँवों में सूनापन जीते”)

यहाँ ‘शहनाई’ और ‘किलकारियाँ’ सुख, सामूहिकता और जीवन की पूर्णता के प्रतीक हैं, जबकि ‘आँसू’ और ‘लाचारी’ सामाजिक-आर्थिक दबावों के परिणामस्वरूप उपजी वर्तमान की विवशता को सामने लाते हैं। एक ही घर में यह समयगत परिवर्तन बताता है कि परिवार भी व्यवस्था की मार से अछूता नहीं रहता।

स्मृति इन नवगीतों में एक महत्वपूर्ण भावतत्त्व के रूप में उभरती है—

खट्टी–मीठी यादें कितनी
भीतर–बाहर हैं
(
गीत: “गाँवों में सूनापन जीते”)

ये स्मृतियाँ केवल अतीत की ओर लौटने का भाव नहीं रचतीं, बल्कि वर्तमान की पीड़ा को और तीक्ष्ण बना देती हैं। अतीत और वर्तमान का यह द्वंद्व नवगीत को भावुक होने से बचाता है और उसे गहन अनुभूति से भर देता है।

इस संग्रह में स्त्री-संवेदना विशेष उल्लेखनीय है। यहाँ स्त्री केवल करुणा या सहानुभूति का विषय नहीं है, बल्कि श्रम, त्याग और मौन पीड़ा की प्रतीकात्मक उपस्थिति बनकर सामने आती है। उसकी चुप्पी स्वयं एक भाषा है—ऐसी भाषा, जो सामाजिक उपेक्षा, पारिवारिक जिम्मेदारियों और अनकहे दुःखों को अपने भीतर समेटे हुए है।

कवि स्त्री-पीड़ा को न तो अतिरंजित करुणा में बदलता है, न ही उसे वैचारिक नारे में ढालता है। वह उसे सहज, लगभग निर्विकार भाव में प्रस्तुत करता है—और यही सादगी उसे अधिक मार्मिक और विश्वसनीय बनाती है। स्त्री का श्रम यहाँ घरेलू दायरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की पूरी संरचना को सँभालने वाली अदृश्य शक्ति के रूप में उभरता है।

इन निजी और पारिवारिक गीतों के माध्यम से संग्रह की भावभूमि संतुलित होती है। सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विडंबनाएँ और हिंसा के बीच ये गीत यह संकेत करते हैं कि बड़े सामाजिक संकटों की वास्तविक कीमत घर, रिश्ते और स्त्री चुकाती है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जहाँ नहीं उजियार” में स्त्री, परिवार और निजी संवेदना सामाजिक यथार्थ की पूरक बनकर सामने आती है। ये नवगीत बताते हैं कि सार्वजनिक और निजी, समाज और व्यक्ति—इनके बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। यही समन्वय इस संग्रह को संवेदनात्मक गहराई और कलात्मक संतुलन प्रदान करता है।

पर्यावरण, प्रकृति और आधुनिक संकट

नवगीत–संग्रह जहाँ नहीं उजियार” का एक उल्लेखनीय और समकालीन सरोकार उसकी पर्यावरणीय चेतना है। यह चेतना किसी रोमानी प्रकृति–चित्रण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आधुनिक विकास–मॉडल की आत्मघाती प्रवृत्तियों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। कवि प्रकृति को केवल सौंदर्य का उपादान नहीं मानता, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन–संघर्ष का अनिवार्य सहचर और नैतिक आधार के रूप में प्रस्तुत करता है।

इन नवगीतों में प्रकृति और मनुष्य के संबंध को टूटी हुई कड़ी के रूप में देखा गया है। खेत, मेड़, खलिहान, फ़सल—ये शब्द ग्रामीण जीवन की स्मृतियाँ भर नहीं हैं, बल्कि उस संतुलित जीवन–पद्धति के प्रतीक हैं, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच सहजीवन संभव था—

खेत, मेड़, खलिहान, फ़सल के
साथ रहे उल्लास,
बचा रहेगा इस धरती पर
थोड़ा–सा मधुमास
(गीत: “साथ रहे उल्लास”)

यहाँ ‘मधुमास’ केवल ऋतु नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और मानवीय उल्लास का रूपक है। कवि संकेत करता है कि यदि प्रकृति के साथ यह सहचर्य बना रहा, तो जीवन में आनंद और संतुलन की संभावना शेष रहेगी।

इसके विपरीत, आधुनिक विकास की क्रूरता को कवि तीखे प्रश्न में बदल देता है—

हम पेड़ों की गर्दन पर
क्यों चलती आरी है,
(
गीत: “यह माँग हमारी है”)

यह पंक्ति प्रकृति–विनाश के हिंसक चरित्र को नग्न रूप में सामने लाती है। ‘गर्दन’ शब्द पेड़ को निर्जीव वस्तु से उठाकर सजीव प्राणी में रूपांतरित कर देता है, जिससे वृक्ष–कटान एक नैतिक अपराध के रूप में अनुभूत होता है।

आगे कवि सत्ता और व्यवस्था को संबोधित करते हुए कहता है—

राजा जी तुम न्याय करो
यह माँग हमारी है
(गीत: “यह माँग हमारी है”)

यह माँग केवल पेड़ों या जंगलों के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए है। यहाँ पर्यावरणीय संकट सामाजिक और राजनीतिक संकट से जुड़ जाता है, और नवगीत एक प्रतिरोधात्मक स्वर ग्रहण करता है।

इस संग्रह में प्रकृति सजावटी बिंब नहीं, बल्कि अस्तित्व–संघर्ष का प्रतीक बनकर सामने आती है। प्रदूषण, कटते जंगल, उजड़ते खेत—ये सभी संकेत हैं उस सभ्यता की ओर, जो अपने ही जीवन–स्रोतों को नष्ट कर रही है। कवि की चिंता केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहती; वह भविष्य की ओर भी संकेत करती है—कि यदि यह विनाश जारी रहा, तो ‘उजियार’ की कोई संभावना शेष नहीं बचेगी।

महत्वपूर्ण यह है कि कवि पर्यावरणीय प्रश्नों को भी उपदेशात्मक भाषा में नहीं रखता। वह जीवनानुभव, ग्रामीण स्मृति और संवेदनात्मक बिंबों के माध्यम से अपनी बात कहता है। यही कारण है कि उसकी पर्यावरणीय चेतना नवगीत की काव्यात्मक गरिमा को बनाए रखते हुए पाठक के भीतर गहरा नैतिक प्रश्न छोड़ जाती है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जहाँ नहीं उजियार” में पर्यावरण और प्रकृति आधुनिक संकटों के संदर्भ में एक गंभीर मानवीय विमर्श का रूप ग्रहण करते हैं। यह संग्रह स्पष्ट करता है कि प्रकृति का संकट दरअसल मनुष्य के अस्तित्व का संकट है—और इस सच को नवगीत जितनी संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करते हैं, वही इसकी समकालीन प्रासंगिकता का मूल है।

आशा, प्रतिरोध और भविष्य–बोध

नवगीत–संग्रह जहाँ नहीं उजियार” में पीड़ा, संघर्ष, हिंसा और असमानता की छवियाँ जितनी सघन हैं, उतनी ही महत्त्वपूर्ण उसकी आशा–चेतना भी है। कवि अंधकार का यथार्थ स्वीकार करता है, पर उसके आगे निःशब्द या निरुपाय नहीं होता। यही कारण है कि यह संग्रह निराशा का आख्यान बनकर नहीं रुकता, बल्कि प्रतिरोध और परिवर्तन की संभावनाओं को जीवित रखता है।

इन नवगीतों की आशा किसी भावुक या अवास्तविक विश्वास से नहीं जन्म लेती। वह जीवन–संघर्ष, श्रम और सामूहिक चेतना से उपजी है। कवि जानता है कि सामाजिक अन्याय और विभाजन की दीवारें ऊँची हैं, फिर भी वह उनके गिरने की ऐतिहासिक संभावना पर भरोसा करता है—

गिर जाएगी ‘भेद–भाव’ की
ऊँची चारदीवारी
(
गीत: “ऊँची चारदीवारी”)

यह पंक्ति केवल आश्वासन नहीं, बल्कि प्रतिरोध का घोष है। यहाँ ‘चारदीवारी’ उस समूची व्यवस्था का प्रतीक है, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है—जाति, वर्ग, धर्म और सत्ता के नाम पर।

इसी क्रम में भविष्य–बोध को कवि सूरज और सबेरे के बिंब से रचता है—

सूरज देगा नया सबेरा
हों कितनी भी रातें
(
गीत: “ऊँची चारदीवारी”)

रातें चाहे कितनी ही लंबी और अंधेरी क्यों न हों, सूरज का उगना समय और संघर्ष की ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में सामने आता है। यह आशा प्रकृति के नियमों की तरह स्वाभाविक और अडिग है।

महत्वपूर्ण यह है कि कवि आशा को निष्क्रिय प्रतीक्षा में नहीं बदलता। वह स्पष्ट रूप से सक्रिय हस्तक्षेप की बात करता है—

आगे आना होगा
(
गीत: “आगे आना होगा”)

यह पंक्ति पूरे संग्रह का वैचारिक निचोड़ कही जा सकती है। यहाँ आशा कर्म से जुड़ती है, और भविष्य केवल प्रतीक्षित नहीं, बल्कि निर्मित किया जाने वाला सत्य बनता है।

इस तरह जहाँ नहीं उजियार” के नवगीत यह स्पष्ट करते हैं कि प्रतिरोध केवल नकारात्मक असहमति नहीं, बल्कि रचनात्मक विश्वास भी है—मनुष्य पर, श्रम पर और सामूहिक संघर्ष पर। अंधकार की स्वीकृति के साथ उजाले की संभावना को बनाए रखना ही इस संग्रह की वैचारिक परिपक्वता है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यह संग्रह पीड़ा का दस्तावेज़ होते हुए भी निराशा का घोष नहीं है। इसमें निहित आशा संघर्षजन्य है, प्रतिरोध सजग है और भविष्य–बोध मानवीय। यही तत्व जहाँ नहीं उजियार” को समकालीन नवगीत–परंपरा में एक संतुलित, प्रगतिशील और प्रेरक कृति के रूप में स्थापित करते हैं।

नवगीत–परंपरा में संग्रह का स्थान

“जहाँ नहीं उजियार” विषय–वस्तु और काव्यात्मक दृष्टि—दोनों स्तरों पर नवगीत की उस सुदीर्घ परंपरा से गहरे जुड़ाव का प्रमाण है, जिसमें गीतात्मकता और सामाजिक यथार्थ के बीच संतुलन को केंद्रीय महत्त्व प्राप्त रहा है। यह संग्रह इस धारणा को दृढ़ करता है कि नवगीत केवल भावात्मक लय की विधा नहीं, बल्कि अपने समय के प्रश्नों से सीधा संवाद करने वाली एक सशक्त, जीवंत और हस्तक्षेपकारी काव्य–परंपरा है।

नवगीत की परंपरा में जन–जीवन, श्रम, संघर्ष और सामाजिक विडंबनाओं को स्वर देने वाले रचनाकारों की एक सशक्त शृंखला रही है। यह संग्रह उसी परंपरा को समकालीन संदर्भों में आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है। कवि न तो गीतात्मकता से समझौता करता है, न ही यथार्थ की तीक्ष्णता को कुंद होने देता है। लय, बिंब और संवेदना—तीनों तत्व यहाँ संतुलित रूप में उपस्थित हैं।

इस परंपरागत चेतना को निम्न पंक्तियाँ सारगर्भित ढंग से अभिव्यक्त करती हैं—

हर मौसम से हम लड़ते हैं
हमीं हमेशा ढाल रहे हैं—
पीछे मुड़कर कब देखा है
आगे चलना सीखा है—

(गीत: “आते-जाते साल रहे हैं”)

यहाँ ‘मौसम’ समय की सामाजिक–राजनीतिक चुनौतियों का रूपक है और ‘ढाल’ प्रतिरोध की प्रतीक। संघर्ष के बीच आगे बढ़ने की जिद—नवगीत की मूल प्रवृत्ति—इन पंक्तियों में सघन होकर उभरती है।

महत्वपूर्ण यह है कि यह संग्रह यह सिद्ध करता है कि नवगीत आज भी समकालीन प्रश्नों—सामाजिक असमानता, राजनीतिक छल, सांप्रदायिक हिंसा, पर्यावरणीय संकट और मानवीय पीड़ा—को वहन करने में पूर्णतः सक्षम है, बशर्ते कवि की संवेदना ईमानदार और दृष्टि स्पष्ट हो। यहाँ नवगीत न तो घोषणापत्र बनता है, न ही आत्ममुग्ध लिरिसिज़्म में सिमटता है।

परंपरा और नवता के द्वंद्व में यह संग्रह एक सेतु की भूमिका निभाता है। यह अतीत की गीतात्मक विरासत से ऊर्जा ग्रहण करता है और वर्तमान की चुनौतियों से टकराते हुए भविष्य की ओर संकेत करता है। इस दृष्टि से “जहाँ नहीं उजियार” नवगीत की जीवंतता और समकालीन प्रासंगिकता का प्रमाण बनकर सामने आता है।

इन उद्धृत पंक्तियों और विश्लेषण से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है कि “जहाँ नहीं उजियार” केवल गीतों का संकलन नहीं, बल्कि समकालीन समाज, राजनीति और मनुष्य की पीड़ा का एक सघन काव्यात्मक दस्तावेज़ है। उद्धरणों की यह प्रस्तुति समालोचना को प्रमाणिक, संदर्भित और अकादमिक रूप से सुदृढ़ बनाती है।

समग्र मूल्यांकन : नवगीत–संग्रह “जहाँ नहीं उजियार”

समग्रतः जहाँ नहीं उजियार विषय–वस्तु की दृष्टि से समकालीन समाज का एक बहुपक्षीय काव्यात्मक दस्तावेज़ है। इसमें सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक चेतना, सांप्रदायिक हिंसा, मानवीय संवेदना, पर्यावरणीय चिंता और भविष्य–बोध—ये सभी तत्व परस्पर गुँथे हुए दिखाई देते हैं। यह संग्रह नवगीत को केवल परंपरा–निर्वाह की विधा नहीं, बल्कि समय से मुठभेड़ करने वाली एक सजग काव्य–विधा के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

यह संग्रह समकालीन समाज के अंधेरे पक्षों को केवल दर्ज ही नहीं करता, बल्कि उन्हें प्रश्न, प्रतिरोध और नैतिक आग्रह के साथ कविता में रूपांतरित करता है। इसकी मूल शक्ति कवि की सामाजिक प्रतिबद्धता, मानवीय संवेदना और समय के संकटों से सीधे संवाद करने की ईमानदार जिद में निहित है। कवि अपने गीतों के माध्यम से वंचित, शोषित और हाशिए पर खड़े मनुष्य की पीड़ा को स्वर देता है और नवगीत को यथार्थ की कसौटी पर खड़ा करता है।

समालोचकीय दृष्टि से यह स्वीकार करना आवश्यक है कि इस संग्रह में कुछ सीमाएँ भी उपस्थित हैं। इनमें विषयगत एकरूपता की प्रवृत्ति, निराशा के स्वरों की अपेक्षाकृत अधिकता, कुछ प्रतीकों की परिचित और पूर्वप्रचलित संरचना तथा कुछ गीतों में वक्तव्यात्मकता का आग्रह उल्लेखनीय है। कहीं–कहीं लयात्मक कसाव और संपादनगत संतुलन का अभाव भी अनुभूत होता है, जिससे गीतात्मक प्रभाव क्षीण पड़ता है।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि तकनीकी या समकालीन जीवन से जुड़े शब्द—जैसे लैपटॉप—भाषा में स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य हैं, क्योंकि उनके लिए या तो कोई सर्वमान्य हिंदी विकल्प उपलब्ध नहीं है या प्रचलन स्वयं उन्हें मान्यता प्रदान कर चुका है। किंतु “मैथ, रसायन और भौतिकी” (गीत— सूरज कितने प्रेशर में है) जैसे संदर्भ में ‘मैथ’ और ‘प्रेशर’ का प्रयोग किसी अनिवार्य भाषिक आवश्यकता के बजाय सजावटी आधुनिकता का आभास देता है। यहाँ ‘गणित’ और ‘दबाव’ जैसे शब्द न केवल अर्थ की दृष्टि से पर्याप्त हैं, बल्कि गीत की भाषिक संप्रेषणीयता और सांस्कृतिक निरंतरता को भी अधिक सुदृढ़ कर सकते थे।

इस प्रकार ऐसे शब्द-चयन नवगीत की विधागत अपेक्षाओं—विशेषतः उसकी भाषिक स्वायत्तता, लयात्मक अनुशासन और सांस्कृतिक संदर्भबोध—के आलोक में विचारणीय हो उठते हैं। ये बिंदु किसी एक रचना तक सीमित न रहकर नवगीत की विधागत अपेक्षाओं—विशेषतः उसकी भाषिक संप्रेषणीयता, सांस्कृतिक जड़ों और गीतात्मक अनुशासन—के संदर्भ में विचारणीय बनते हैं। परंतु यह भी उतना ही सच है कि ये सीमाएँ कवि की रचनात्मक असमर्थता का संकेत नहीं देतीं, बल्कि उसके वैचारिक आग्रह और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उसकी तीव्र संलग्नता से उपजी हैं। कवि सजावटी सौंदर्य या भावुक पलायन के बजाय अपने समय की सच्चाइयों से जूझना चुनता है—और यही चयन उसे कहीं–कहीं काव्यात्मक जोखिम की ओर भी ले जाता है।

यह संग्रह समकालीन नवगीत की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो सौंदर्य–बोध को सामाजिक यथार्थ से अलग नहीं करती, बल्कि उसे उसकी सबसे तीखी परिस्थितियों में पहचानती है। जहाँ नहीं उजियार केवल अँधेरे का आख्यान नहीं, बल्कि उस अँधेरे के सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक कारणों की खोज भी है। संग्रह के गीतों में उजाला एक रूपक है—न्याय, अवसर, मानवीय गरिमा और सहभागिता का; और जहाँ यह नहीं है, वहीं कवि की दृष्टि सबसे अधिक ठहरती है।

इस दृष्टि से जहाँ नहीं उजियार नवगीत की समकालीन यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में सामने आता है—ऐसा पड़ाव जहाँ कविता मनोरंजन नहीं, बल्कि समय की साक्षी और मनुष्यता की खोज बन जाती है। अपनी सीमाओं के बावजूद यह संग्रह नवगीत की सामाजिक भूमिका को सशक्त करता है और समकालीन हिंदी कविता में अपने विचारोत्तेजक, प्रतिबद्ध और संवेदनशील स्वर के कारण उल्लेखनीय ठहरता है।

कुल मिलाकर, जहाँ नहीं उजियार समकालीन नवगीत में लोक–यथार्थ और उत्तरदायित्व की परंपरा को सुदृढ़ करता है। यह करुणा से आगे बढ़कर जवाबदेही तक, और प्रतिरोध को संवैधानिक नैतिकता से जोड़ते हुए लोक, समाज और सत्ता—तीनों से संवाद कराने वाला एक सशक्त काव्यात्मक हस्तक्षेप सिद्ध होता है।

शुभकामनायें!

पुस्तक: जहाँ नहीं उजियार

(नवगीत संग्रह)

प्रथम संस्करण – 2025

कवि: योगेन्द्र प्रताप मौर्य

प्रकाशक: कलमकार पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली

मूल्य: 350 रूपये

 

चंद्रप्रभा विला

417, रॉयल रेजीडेंसी- प्रथम फेस,

सारंगपुरा, बड के बालाजी,

अजमेर रोड, जयपुर- 302042

 

 

Popular posts from this blog

अंधकार की त्वचा पर आशा की रोशनी : 'अँधेरा कुछ तो होगा दूर'

सहज संप्रेषण के नवगीत कवि: जयप्रकाश श्रीवास्तव

यात्रा-वृत्तांत : नवगीत, इतिहास और आस्था का त्रिवेणी संगम - अशोक शर्मा ‘कटेठिया’