समय के साक्ष्यकार : भोलानाथ जी और उनका नवगीत

 

समय के साक्ष्यकार : भोलानाथ जी और उनका नवगीत

हिंदी नवगीत परंपरा में आदरणीय भोलानाथ जी का नाम एक सजग, प्रतिबद्ध और निर्भीक रचनाकार के रूप में लिया जाता है। उनकी कविता न तो आत्ममुग्ध सौंदर्य में उलझती है और न ही तात्कालिक वाहवाही की आकांक्षी होती है। वे उन कवियों में हैं जिनके लिए रचना स्वांतः सुखाय नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का बोध है। उनके नवगीतों में समय की धड़कन, विसंगतियों की पहचान और मूल्यबोध की स्पष्ट चिंता दिखाई देती है।

करीब दो वर्ष पूर्व, एक साहित्यिक संदर्भ में की गई एक पोस्ट पर त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने यह नवगीत प्रेषित किया था। यह त्वरित प्रतिक्रिया होते हुए भी किसी क्षणिक आवेग की उपज नहीं, बल्कि लंबे अनुभव और गहरे निरीक्षण का परिणाम है। विषय वही पुराना, पर आज भी उतना ही प्रासंगिक—“शामियाने में जो हैं, वही चर्चित हैं; बाकी सबका क्या?” देखें-

और हैं न शामियाने में

लोग बाग

ले रहे मजे जो

औरों की दाद का!

 

नक्कारखाने में

चर्चा नकारों की

चिंतन है

गीत नवगीत के वाद का !

 

स्वांतः सुखाय का यह

दस्तवेज नहीं

चिंतन है युग युगीन

स्वच्छ सरोकार का,

 

क्या पढ़ा परखा उन्हें

महिमा मंडित किया

पढ़ा नहीं जिनने  

पाठ संस्कार का,

 

बेपता औरों के पंजीबद्ध

प्रकरण में

पढ़ते हैं

मुद्दा परिवाद का !

-      भोलानाथ

यह नवगीत केवल एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि हमारे समय के साहित्यिक-सांस्कृतिक यथार्थ का तीखा दस्तावेज़ है। आदरणीय भोलानाथ जी ने जिन पंक्तियों में “शामियाने, “नक्कारखाने, “दाद, “परिवाद” जैसे बिंब रखे हैं, वे आज के रचनात्मक परिदृश्य की संरचना को उघाड़कर रख देते हैं।

प्रस्तुत नवगीत की पंक्तियाँ केवल व्यक्तिगत अनुभव या किसी एक साहित्यिक स्थिति की ओर संकेत नहीं करतीं, बल्कि समकालीन साहित्यिक परिदृश्य की संरचनात्मक विडंबनाओं को उजागर करती हैं। यहाँ ‘शामियाना’ महज़ एक मंच नहीं, बल्कि वह सत्ता-केन्द्र है, जहाँ कुछ चयनित नाम, समूह और विचारधाराएँ परस्पर प्रशंसा के माध्यम से अपनी उपस्थिति को निरंतर पुष्ट करती रहती हैं। इस चकाचौंध के भीतर रचनात्मक मूल्यांकन का स्थान धीरे-धीरे आपसी समीकरणों ने ले लिया है, जहाँ ‘दाद’ आलोचनात्मक विवेक से नहीं, बल्कि पारस्परिक स्वीकृति से उपजती है।

इसके विपरीत, शामियाने के बाहर खड़े वे रचनाकार हैं जिनकी साधना प्रामाणिक है, जिनकी रचनाएँ समय-सापेक्ष और श्रमसाध्य हैं, किंतु जिनकी उपस्थिति साहित्यिक विमर्श के केंद्र में दर्ज नहीं हो पाती। यह विभाजन केवल मंचीय अवसरों का नहीं, बल्कि साहित्यिक चेतना के भीतर बनते हुए एक अदृश्य वर्गीकरण का संकेत देता है।

नक्कारखाने में चर्चा नकारों की” पंक्ति इस विडंबना को और अधिक तीव्र कर देती है। जो स्वर मुख्यधारा की सुविधा और आत्मतुष्टि को चुनौती देते हैं, जो सजावटी भाषा के बजाय सारगर्भित प्रश्न उठाते हैं, उन्हें ‘नकारात्मक’ ठहराकर हाशिये पर ढकेल दिया जाता है। उनकी चर्चा भी यदि होती है, तो वह नक्कारखाने तक सीमित रह जाती है—ऐसी जगह, जहाँ सुनने से अधिक अनसुना करना नियति बन जाता है। यहाँ कवि का स्वर आत्मरति नहीं, बल्कि युग-युगीन स्वच्छ सरोकारों से जुड़ा चिंतन है; वह साहित्य की नैतिक दिशा को लेकर एक सजग चिंता प्रकट करता है।

नवगीत का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘बिना पढ़े महिमामंडन’ की प्रवृत्ति पर प्रहार करता है। आज रचना को पढ़ने-परखने का धैर्य घटता जा रहा है। नाम, पद, निकटता या विचारधारा—ये सभी पाठ और संस्कार पर भारी पड़ते दिखते हैं। यह स्थिति केवल ईमानदार रचनाकार के प्रति अन्याय नहीं, बल्कि साहित्य की आत्मा के क्षरण का संकेत है, जहाँ मूल्यांकन की प्रक्रिया सतही हो गई है।

इसी क्रम में, ‘परिवाद बनता विमर्श’ की अवधारणा सामने आती है। जिनके पास संस्थागत पहचान नहीं, जिनके प्रश्न सत्ता-केन्द्रों तक नहीं पहुँचते, उनके मुद्दे या तो दर्ज ही नहीं होते या फिर उन्हें विवाद का रूप दे दिया जाता है। परिणामस्वरूप, समाधान और सार्थक संवाद पीछे छूट जाते हैं, और शोर प्रमुख हो उठता है।

समग्रतः, भोलानाथ जी का यह नवगीत समकालीन साहित्यिक समाज के लिए एक कठोर किंतु आवश्यक आईना है। यह हमसे पूछता है—क्या हम रचना से अधिक मंच को महत्व दे रहे हैं? क्या हम पाठ से पहले पहचान पढ़ रहे हैं? और क्या हमने असुविधाजनक किंतु आवश्यक स्वरों को सुनने का साहस खो दिया है?

यह रचना चेतावनी देती है कि यदि साहित्य केवल शामियाने की चकाचौंध तक सीमित रह गया, तो बाहर खड़े स्वर धीरे-धीरे मौन में बदल जाएंगे। और जब मौन बढ़ता है, तब संस्कृति का खोखलापन अनिवार्य हो जाता है। इस अर्थ में, यह नवगीत साहित्य को उसकी मूल भूमिका की याद दिलाता है—दाद बटोरने के लिए नहीं, बल्कि समय से ईमानदार और निर्भीक संवाद स्थापित करने के लिए।

सादर.

अशोक शर्मा ‘कटेठिया

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