“दर्द के फलक से”: संवेदना, करुणा, स्त्री-अनुभव और समकालीन यथार्थ का काव्यात्मक दस्तावेज
“दर्द के फलक से”: संवेदना, करुणा, स्त्री-अनुभव और समकालीन यथार्थ का काव्यात्मक दस्तावेज
— अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
डॉ. ज्योति मिश्रा समकालीन हिंदी कविता की एक
संवेदनशील, विचारशील और सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़ी रचनाकार हैं। उनकी
काव्य-चेतना का केंद्र स्त्री-अनुभव, मानवीय करुणा, सामाजिक अन्याय, पारिवारिक विडंबनाएँ, प्रकृति-संतुलन और भूख जैसे मूलभूत प्रश्न हैं। वे
कविता को केवल भावाभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानतीं, बल्कि उसे संवेदना का सामाजिक हस्तक्षेप बनाती हैं।
उनका काव्य-संग्रह “दर्द के फलक से” इस दृष्टि
से विशेष उल्लेखनीय है कि उसमें ‘दर्द’ निजी अनुभूति तक सीमित न रहकर
सामूहिक मानवीय पीड़ा का प्रतीक बन जाता है। उनकी कविताओं में करुणा है, पर वह निष्क्रिय
नहीं; क्षोभ है, पर वह उग्र न होकर
विवेकपूर्ण है; मौन है, पर वह अर्थगर्भित है। यही संतुलन उनकी रचनाओं को भावुकता से ऊपर उठाकर वैचारिक
ऊँचाई प्रदान करता है।
डॉ. मिश्रा की कविता का स्त्री-पक्ष आत्मदया से मुक्त
है। उनकी स्त्री न केवल सहनशील है, बल्कि सजग, संघर्षशील और चेतावनी देने वाली सत्ता भी है। वे
प्रकृति और स्त्री को समान धरातल पर रखकर देखती हैं और दोनों के साथ हो रहे शोषण
पर कविता के माध्यम से गंभीर प्रश्न उठाती हैं।
भाषा की दृष्टि से उनकी कविताएँ सहज, संप्रेषणीय और
बिंबात्मक हैं। वे जटिल शिल्प या कृत्रिम दुरूहता से बचते हुए सीधी, लेकिन गहरी बात
कहने में विश्वास रखती हैं। रिश्तों की नाजुकता, घर-परिवार की विडंबनाएँ, बाल-मन पर पड़ने वाले आघात और धार्मिक-सामाजिक
पाखंड—ये सभी विषय उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना के साथ उभरते हैं।
समग्रतः, डॉ. ज्योति मिश्रा की रचनाएँ समकालीन हिंदी कविता में
स्त्री-संवेदना, सामाजिक यथार्थ और नैतिक विवेक की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। उनकी कविता
पाठक को केवल भावविभोर नहीं करती, बल्कि संवेदनशील, विचारशील और उत्तरदायी मनुष्य बनने की दिशा में
प्रेरित भी करती है।
यह समय 2017 का था। एक दिन डॉ. ज्योंति मिश्रा जी का
फ़ोन आता है। उस समय उनकी तबियत जरा नासाज़ थी। उन्होंने आग्रह किया कि मैं उनकी
कविताओं पर एक समीक्षा लिख दूँ। मैंने कहा- ठीक है, कवितायें दीजिये. उन्होंने कहा
कि कवितायेँ उनके फेसबुक पेज से ले लूँ. उस दिन रात भर में समीखा लिखी जिसको
उन्होंने ससम्मान किताब में स्थान दिया। आज जब पुनः किताब हाथ में लगी तो सहज ही
उस समीखा को पुनर्गठित करने का मन हो आया।
तो आइये, एक बार फिर से उनकी रचनाओं के विभिन्न पहलुओं पर एक दृष्टिपात
करते हैं-
कवि, संवेदना
और विरोध का स्वर
कवि मूलतः संवेदनशील होता है और उसकी संवेदनाएँ प्रायः अभाव, अन्याय और विसंगतियों के विरुद्ध
प्रतिरोध-स्वरूप जन्म लेती हैं। यह प्रतिरोध कभी करुणा बनकर प्रकट होता है,
कभी क्षोभ के रूप में और कभी सहनशीलता की सीमाएँ लाँघकर टकराव की
मुद्रा भी ग्रहण कर लेता है।
ज्योति मिश्रा की रचनाएँ पढ़ते समय यही अनुभूति बार-बार होती है कि यहाँ कविता
किसी भावुक आत्मविलाप का नाम नहीं, बल्कि अनुभूत यथार्थ से उपजा सजग हस्तक्षेप है।
उनकी कविताओं में दर्द गहरा है—पर वह निष्क्रिय नहीं। यही दर्द जब ‘पेड़’ बन
जाता है, तो दूसरों को छाया देने को भी उद्यत
होता है और अपनी असहायता के बीच ईश्वर से प्रार्थना करता है—
“मुझे धागा तुम ऐसा बना दो कि जिनमें पिरोते हैं मोती…”
यह प्रार्थना आत्म-दया नहीं, बल्कि
आत्म-विसर्जन की चेतना है, जो इस संग्रह की मूल आत्मा बन
जाती है।
दर्द की बहुव्याप्ति:
आत्म से लोक तक
इस संग्रह का दर्द निजी होते हुए भी आत्मकेंद्रित नहीं है। वह स्त्री की पीड़ा
है, प्रकृति का संकट है, भूख की आग है, टूटते रिश्तों की कसक है और सामाजिक
पाखंड का उद्घाटन भी। कवयित्री का आग्रह स्पष्ट है—
“यूँ ही संसार में न रखो तुम, मुझे औरों
का सम्बल बना दो।”
यह पंक्तियाँ कवि की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करती हैं—कवि यहाँ समय-साक्ष्य
भी है और मानवीय करुणा का वाहक भी।
प्रकृति-बोध और
आसन्न संकट
आपने ठीक ही रेखांकित किया है कि कवयित्री की चिंता केवल मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन तक विस्तृत
है—
“पुष्प, पलाश के, दहकते
हैं आग से…”
यह कविता केवल पर्यावरणीय संकेत नहीं देती, बल्कि भविष्य की चेतावनी है। होली जैसे उत्सव में भी जल का
अभाव, आग का दहकना और सूखती बेलें—यह सब उस सभ्यता का चित्र
है जो प्रकृति से संवाद नहीं, केवल दोहन जानती है।
स्त्री: करुणा, संघर्ष
और चेतावनी
आपने सही संकेत किया है कि स्त्री सदियों तक दोयम दर्जे की शिकार रही है, पर अब वह बदल चुकी है। इस संग्रह में
स्त्री न तो निरीह है और न ही केवल विद्रोहिणी—“कम न
समझो हमें, ज़ोर पैदल का, होता कुछ कम
नहीं।” यहाँ ‘पैदल’ शब्द स्त्री की जमीनी ताकत का
प्रतीक बन जाता है। और जब कवयित्री कहती हैं—
“प्रकृति और स्वी
दोनों होतीं एक सी
न करो खिलवाड़ उससे।” —तो यह चेतावनी सत्ता के हर रूप के लिए
है।
रिश्ते, घर
और स्त्री की अदृश्य केंद्रीयता
रिश्तों को सहेजना स्त्री के लिए केवल भावनात्मक दायित्व नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है—“रिश्ते क्या हैं? फिज़ा में बिखरे हर्फ…” आपका यह अवलोकन अत्यंत सार्थक है कि स्त्री स्वयं जानती है—वही इस
घर-संसार की प्राण-शक्ति है। इसी आत्मबोध से यह प्रश्न जन्म लेता है—
“ज्योति बनकर मैं न दहूँगी, तब क्या होगा?”
यह प्रश्न स्त्री की अनुपस्थिति की सामाजिक भयावहता को उद्घाटित करता है।
विखंडन, स्मृति
और आत्मिक पीड़ा
घर का मकान बनकर न रह जाना, खुशियों
का किसी और छत पर बरस जाना—ये सभी बिंब आधुनिक जीवन की भावनात्मक विडंबनाओं को
उजागर करते हैं—
“लो
बदल गया मकाँ मेरा,
जो कभी भी न घर बन
सका।”
यह केवल निजी पीड़ा नहीं, बल्कि
सामूहिक विस्थापन का रूपक है।
हिज्र, व्यक्ति
और भावनात्मक मृत्यु
‘वह व्यक्ति मर गया कल रात’ कविता आधुनिक मनुष्य
की भीतरी मृत्यु का दस्तावेज है। आपका यह कथन बिल्कुल सटीक है कि
“भावनाओं के इस शव को उठाने में
पाठकों के कंधे
समर्थ नहीं होंगे”
यही इस कविता की
सबसे बड़ी शक्ति है।
बाल-मन और
पारिवारिक हिंसा
माँ को पिटता देख बच्चे का जीवन-पथ संकीर्ण हो जाना—यह केवल कविता नहीं, बल्कि सामाजिक अभियोग है।
यहाँ कवयित्री बाल-संवेदना को केंद्र में रखकर पारिवारिक विफलताओं
को उजागर करती हैं।
भूख, धर्म
और पाखंड
यह संग्रह भूख को दर्शन के स्तर तक ले जाता है—“जो भूख होती है, बहुत
नंगी होती है।” मंदिर में ईश्वर से भीख माँगते अमीर और बाहर पत्तलों में भोजन खोजते भूखे—यह
दृश्य सामाजिक व्यवस्था पर तीक्ष्ण प्रहार है। यहाँ कविता नैतिक विवेक का
प्रश्नपत्र बन जाती है।
दर्शन, सम्पूर्णता
और तमन्ना
कविमन और दर्शन का संबंध यहाँ स्वाभाविक है। कवयित्री जानती हैं कि वह क्या
माँग रही हैं—सम्पूर्णता।
‘तमन्नाओं की किताब’ कविता इसी आकांक्षा का काव्यात्मक रूप है,
जहाँ प्रेम, प्रार्थना और कल्पना एकाकार हो
जाते हैं।
मौन से नवगीत की
ओर
दुःख-दर्द से उपजी करुणा जब राग में बदलती है, तब नवगीत की संभावना जन्म लेती है—“मौन टूटें, राग जागे…” “दर्द
के फलक से” समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-संवेदना, सामाजिक चेतना, और नवगीतात्मक संभावना
का एक प्रामाणिक, संतुलित और आवश्यक दस्तावेज है।
यह संग्रह पाठक को केवल भावुक नहीं करता, बल्कि उसे संवेदनशील
और जिम्मेदार मनुष्य बनने का आग्रह करता है—और यही इसकी सबसे बड़ी साहित्यिक
उपलब्धि है।
मैं डॉ. ज्योंति मिश्रा के स्वस्थ और सुदीर्घ जीवन की
कामना करता हूँ।
‘चंद्रप्रभा विला’
417, रॉयल रेजीडेंसी- प्रथम फेज,
सारंगपुरा, बड़ के बालाजी,
अजमेर रोड, जयपुर-302042