करुणा से प्रतिरोध तक: भीमराव झरबडे के गीतों की संवेदनात्मक संरचना
करुणा से प्रतिरोध तक: भीमराव झरबडे के गीतों की
संवेदनात्मक संरचना
-अशोक शर्मा ‘कटेठिया’
भीमराव झरबड़े भीमराव 'जीवन' बैतूल के नाम से हिंदी कविता और गीतों के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। उनका जन्म 19 अगस्त 1963 को बैतूल जिले के मदनी गाँव में हुआ और वे श्री जनकलाल झरबड़े तथा श्रीमती जया झरबड़े के पुत्र हैं। वे वाणिज्य स्नातकोत्तर (एम.कॉम.) हैं तथा उन्होंने पी. एम. श्री. एकीकृत शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, पाधाखेड़ा, विकास खंड-घोड़ाडोंगरी में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दी हैं।
भीमराव झरबड़े जी की रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों की अभिव्यक्ति करती हैं। उनकी
काव्यशैली में सरलता के साथ गहनता, भावनाओं की स्पष्टता और लोकजीवन की
झलक दिखाई देती है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं: “तुहिन कण “ और “दोहा
प्रसंग” , जो साझा संग्रह के रूप में प्रकाशित
हुए हैं। उनका एक नवगीत संग्रह “मदनी की महक” 2024 में श्वेतवर्णा
प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हो चूका है। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ देश की अनेक
प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों का ध्यान आकर्षित कर चुकी
हैं। “गुंजित हुए दिगंत” उनका दूसरा गीत-नवगीत संग्रह है।
साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए उन्हें अनेक सम्मान
प्राप्त हुए हैं। इनमें छंद शिल्पी, कवितालोक भूषण, शब्द-श्री, मुक्तक-श्री, छंद-श्री, गीतिका-श्री, गीत-श्री
मुक्तकलोक और पोएट ऑफ
द ईयर (उपविजेता, कलम के जादूगर मंच) प्रमुख हैं। ये
पुरस्कार उनके सृजनात्मक योगदान और काव्यात्मक दक्षता का प्रमाण हैं।
भीमराव झरबड़े जी की कविताएँ और गीत न केवल साहित्यिक
मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि समाज और जीवन की सकारात्मक दृष्टि और संदेश भी
प्रदान करती हैं। उनकी लेखनी में लोक-संस्कार, मानवता और संवेदनशीलता की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यह उन्हें आधुनिक
हिंदी साहित्य में एक सम्मानित और विशिष्ट स्थान दिलाता है।
हिंदी साहित्य की परंपरा में गीत केवल
काव्यात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि वह लोकजीवन, सामूहिक स्मृति और सामाजिक चेतना का संवाहक भी रहा है।
कबीर के पदों से लेकर विद्यापति, सूर, मीरा, निराला, नागार्जुन और धूमिल तक गीत और
गीतात्मक कविता ने समय–समय पर समाज की अंतर्धाराओं को स्वर दिया है। प्रस्तुत
गीत–संग्रह इसी परंपरा में स्थित होते हुए भी समकालीन समय की जटिलताओं, विसंगतियों और विडंबनाओं से सीधे संवाद करता है। हिंदी गीत–परंपरा अत्यंत
समृद्ध और विविधतापूर्ण रही है। कबीर के निर्गुण पदों से लेकर सूर–मीरा की
भक्ति–परंपरा, विद्यापति की श्रृंगारिक संवेदना, निराला के प्रयोगशील गीत, नागार्जुन की जनधर्मी कविता और
धूमिल की आक्रामक चेतना तक—गीत ने हर युग में अपने समय से संवाद किया है।
प्रस्तुत गीत–संग्रह “गुंजित हुए दिगंत”
हिंदी गीत–परंपरा का एक सुस्पष्ट समकालीन
विस्तार है, जिसमें गीत अपनी पारंपरिक माधुर्यात्मक संरचना को
अक्षुण्ण रखते हुए वर्तमान समय की जटिल सामाजिक, राजनीतिक और
सांस्कृतिक विडंबनाओं से आलोचनात्मक टकराव स्थापित करता है। यह संग्रह
भावुकता–प्रधान काव्याभिव्यक्ति की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए गीत को विचार, प्रतिरोध और
प्रश्नाकुल चेतना के सशक्त माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करता है। कवि जिस
समय–संदर्भ में सृजनरत है, वह शब्दों की विश्वसनीयता के क्षरण, मूल्यों के
बाजारूकरण और कविता की हस्तक्षेपकारी भूमिका के संकुचन से चिह्नित समय है, जहाँ कविता से
अपेक्षा की जाती है कि वह सामाजिक विवेक के निर्माण के स्थान पर केवल मनोरंजन का
साधन बने। ऐसे संदर्भ में प्रस्तुत गीत–संग्रह कविता के नैतिक और सामाजिक दायित्व
को पुनर्स्थापित करने का सचेत रचनात्मक प्रयास प्रतीत होता है।
पचासी (८५) गीतों का यह गीत–संग्रह “गुंजित हुए
दिगंत” समकालीन हिंदी कविता में संवेदना, प्रतिरोध और विवेक की सशक्त उपस्थिति का प्रमाण है। संग्रह के गीत केवल भावात्मक अभिव्यक्ति तक
सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज, राजनीति, व्यवस्था और मनुष्य के आंतरिक संघर्षों का गहन साक्ष्य
प्रस्तुत करते हैं। कवि ने अपने समय को न तो सजावटी भाषा में ढका है और न ही उसे
मात्र व्यक्तिगत पीड़ा में सीमित रखा है, बल्कि अनुभव की आग में तपे शब्दों
को लोकबोध के धरातल पर उतारा है।
इस संग्रह का केंद्रीय स्वर मानवीय चेतना का क्षरण
और उसके विरुद्ध उठता प्रश्नबोध है। ‘प्रेम दीप’, ‘देह दीप’, ‘शब्दों का संयम’ जैसे गीत जहाँ करुणा, प्रेम और आत्मालोकन की ओर ले जाते हैं, वहीं ‘जुमलों की गारंटी’, ‘गाफ़िल रामधनी’, ‘व्यंग्यों का गठजोड़’ और ‘व्यवस्था की इल्ली’ जैसे गीत सत्ता, पाखंड और नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि की दृष्टि सजग है- वह केवल
दृश्य नहीं देखती, बल्कि उसके पीछे सक्रिय छल-छद्म को भी उजागर करती है।
भाषा की दृष्टि से यह संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय
है। यहाँ लोकभाषा, देशज शब्द, मुहावरे और प्रतीक कविता को जीवन के निकट लाते हैं। गीतात्मकता के साथ-साथ व्यंग्य और आक्रोश का
संतुलन बना हुआ है। बिंब कभी खेत-खलिहान से उठते हैं तो कभी संसद, बाजार और मीडिया की गलियों तक पहुँचते हैं। यह बहुलता कवि की सामाजिक समझ और
रचनात्मक विस्तार का परिचायक है।
इस संग्रह में नारी, श्रमजीवी, किसान, वृद्ध, बालक और हाशिए पर खड़ा मनुष्य बार-बार उपस्थित होता है। ‘रामकली’, ‘भार हुई अम्मा’, ‘भैया कुछ मजबूरी
है’ जैसे गीत संवेदना
के चरम बिंदु पर पहुँचते हैं और पाठक को भीतर तक झकझोरते हैं। वहीं ‘सपनों का
पिंजरा’, ‘खाल हुई मोटी’, ‘गीत हुए चारण’ जैसी रचनाएँ
चेतावनी देती हैं कि जब कविता सत्ता की चाकरी में लग जाती है, तब उसका नैतिक पतन अवश्यंभावी हो जाता है।
कुल मिलाकर यह गीत–संग्रह अपने समय का दस्तावेज
है—ऐसा दस्तावेज जो केवल दर्ज नहीं करता, बल्कि प्रश्न करता है, प्रतिरोध करता है और मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है। यह संग्रह पाठक से सहज
संवाद स्थापित करता है और उसे आत्ममंथन के लिए विवश करता है। समकालीन हिंदी गीत
परंपरा में यह कृति अपनी वैचारिक दृढ़ता, भाषिक ऊर्जा और सामाजिक सरोकारों के
कारण एक महत्वपूर्ण और स्मरणीय योगदान मानी जाएगी।
समकालीन हिंदी गीत: संकट और संभावना
समकालीन हिंदी कविता में गीत की स्थिति विरोधाभासी है।
एक ओर गीत को “लोकप्रिय” मानकर गंभीर आलोचना से बाहर कर दिया गया है, तो दूसरी ओर गीत को मंचीय मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है। इस दोहरे संकट में
गीत की वैचारिक क्षमता लगभग विस्मृत होती जा रही है। यह संग्रह ऐसे समय में सामने
आता है, जब कविता से उसकी हस्तक्षेपकारी भूमिका छीनी जा
रही है। बाजार, सत्ता और मीडिया के गठजोड़ ने भाषा को जुमलों में बदल
दिया है, संवेदना को उपभोग में और प्रतिरोध को प्रदर्शन में।
ऐसे समय में गीत लिखना अपने आप में एक जोखिम भरा रचनात्मक निर्णय है। प्रस्तुत
संग्रह इस जोखिम को स्वीकार करता है और गीत को पुनः सामाजिक विवेक की विधा के
रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है।
रचनात्मक चेतना की वैचारिक भूमि
इस संग्रह की रचनात्मक चेतना किसी एक घोषित विचारधारा
की अनुयायी नहीं है, बल्कि वह अनुभवजन्य विवेक से निर्मित है। कवि
का दृष्टिकोण न तो पूर्णतः निजी है, न ही अमूर्त वैचारिक। वह जीवन के
ठोस अनुभवों से उपजे प्रश्नों को गीतात्मक रूप देता है। यह चेतना तीन स्तरों पर
सक्रिय दिखाई देती है—व्यक्तिगत अनुभव से उपजा सामाजिक बोध, समकालीन राजनीति और
व्यवस्था की आलोचनात्मक समझ, नैतिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता। कवि
का “मैं” आत्मकेंद्रित नहीं है। वह बार–बार समाज के “हम” में रूपांतरित होता है।
यही कारण है कि यहाँ निजी पीड़ा भी सामूहिक अनुभव का रूप ले लेती है।
समय–बोध और ऐतिहासिक संदर्भ: प्रस्तुत गीत–संग्रह का समय–बोध अत्यंत स्पष्ट है। यह
कोई कालातीत काव्य नहीं, बल्कि अपने समय में धँसी हुई कविता
है। यहाँ—जुमलों की राजनीति, झूठे आश्वासन, सत्ता का छल, आम आदमी की असहायता
लगातार उपस्थित हैं। कवि समय को केवल दर्ज नहीं करता, बल्कि उसका विश्लेषण करता है। यह समय–बोध इतिहास से भी जुड़ता है। कवि
जानता है कि वर्तमान अचानक नहीं आया है; यह लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का
परिणाम है। इसलिए गीतों में केवल वर्तमान का क्रोध नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता भी दिखाई देती है।
कवि का सामाजिक दायित्व: इस संग्रह में कवि स्वयं को केवल सौंदर्य–सृजनकर्ता
नहीं मानता। वह कविता को एक नैतिक कर्म के रूप में देखता है। ‘गीत हुए
चारण’ जैसी रचनाएँ स्पष्ट संकेत देती हैं कि कवि उस कविता से असहमत है जो सत्ता के
दरबार में खड़ी होकर प्रशंसा के पद गाती है। यह आत्मालोचनात्मक दृष्टि संग्रह को
विशिष्ट बनाती है। कवि स्वयं से प्रश्न करता है—क्या कविता आज भी सच बोल पा रही है? क्या कवि सत्ता से दूरी बनाए रख पा रहा है? क्या गीत जनता के पक्ष में खड़ा है? इन प्रश्नों के कारण यह संग्रह
आत्मसंघर्ष की कविता भी बन जाता है।
जनपक्षधरता की अवधारणा: प्रस्तुत गीत–संग्रह की केंद्रीय अवधारणा जनपक्षधरता
है। लेकिन यह जनपक्षधरता नारेबाज़ी में नहीं बदलती। कवि जनता को “भीड़” या “वोट
बैंक” की तरह नहीं देखता, बल्कि जीवंत मनुष्यों के रूप में
प्रस्तुत करता है। यहाँ स्त्री, वृद्ध, श्रमिक, किसान, बेरोज़गार युवक—सब अपने वास्तविक
रूप में उपस्थित हैं। कवि उनकी पीड़ा को भुनाता नहीं, बल्कि साझा करता है। यही कारण है कि गीत करुणा जगाते हैं, सहानुभूति नहीं माँगते।
प्रतिरोध की प्रकृति: इस संग्रह का प्रतिरोध आक्रामक घोषणाओं में नहीं, बल्कि संयमित व्यंग्य और तीखे संकेतों में प्रकट होता है। कवि जानता है
कि सीधा नारा जल्दी थक जाता है, लेकिन व्यंग्य देर तक चुभता है।
प्रतिरोध यहाँ तीन रूपों में दिखाई देता है—सत्ता की भाषा का विखंडन, सामाजिक
पाखंड का अनावरण, कविता की आत्मशुद्धि। यह प्रतिरोध संग्रह को वैचारिक गहराई
प्रदान करता है।
गीतात्मकता और विचार का संतुलन: अक्सर यह माना जाता है कि गीत और विचार एक–दूसरे के
विरोधी हैं। प्रस्तुत संग्रह इस धारणा को खंडित करता है। यहाँ गीतात्मकता विचार की
वाहक बनती है, बाधक नहीं। लय, तुक और प्रवाह पाठक को बाँधते हैं, जबकि विचार उसे भीतर तक झकझोरता है।
यह संतुलन साधना आसान नहीं, लेकिन कवि इसे सफलतापूर्वक साधता
है।
इस संग्रह की मूल रचनात्मक चेतना मानव–केंद्रित
है। कवि किसी विचारधारा का घोषणापत्र नहीं रचता, बल्कि जीवन के अनुभवों से उपजे प्रश्नों को गीतों में रूपांतरित करता है। यह
चेतना तीन स्तरों पर सक्रिय दिखाई देती है—
- व्यक्तिगत पीड़ा और आत्मसंघर्ष
- सामाजिक–राजनीतिक यथार्थ
- सांस्कृतिक एवं नैतिक विघटन
इसमें कवि का “मैं” आत्मकेंद्रित नहीं है, बल्कि वह समाज के “हम” में विलीन होता हुआ दिखाई देता है। यही कारण है कि व्यक्तिगत दुख भी सामूहिक पीड़ा का प्रतीक बन जाता है।
विषयवस्तु: विषय-वस्तु की बात करें तो संग्रह में तो तीन विषय प्रमुखता से उजागर होते हैं- सत्ता व्यवस्था, आम आदमी और प्रेम। इसे निम्न रूपों में समझना आसन होगा: -
ü सत्ता, व्यवस्था और व्यंग्य: इस संग्रह का एक बड़ा हिस्सा व्यवस्था–आलोचना पर केंद्रित है। ‘जुमलों
की गारंटी’, ‘गाफ़िल रामधनी’, ‘व्यवस्था की इल्ली’, ‘व्यंग्यों का
गठजोड़’ जैसे गीत समकालीन सत्ता-तंत्र की भाषा, रणनीति और नैतिक दिवालियापन को उजागर करते हैं। यहाँ व्यंग्य सतही नहीं है। यह
वह व्यंग्य है जो पाठक को हँसाता नहीं, बल्कि असहज करता है।
ü आम आदमी और हाशिए का जीवन: संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनपक्षधरता है।
‘रामकली’, ‘भार हुई अम्मा’, ‘भैया कुछ मजबूरी है’ जैसे गीत समाज के उस हिस्से को स्वर देते हैं जो अक्सर
साहित्य में भी हाशिए पर रह जाता है। इन गीतों में करुणा है, लेकिन दया नहीं; सहानुभूति है, लेकिन उपदेश नहीं।
ü प्रेम, देह और संवेदना: यह संग्रह केवल प्रतिरोध का घोष नहीं है; यहाँ प्रेम भी है, लेकिन वह प्रेम रोमानी आदर्शवाद से
मुक्त है। ‘प्रेम दीप’, ‘देह दीप’ जैसे गीत
प्रेम को जीवन की ऊर्जा और संघर्ष की ताकत के रूप में देखते हैं। कवि के यहाँ देह
भोग का साधन नहीं, बल्कि संवेदना का विस्तार है।
ü कविता और कवि की आत्मालोचना: ‘गीत हुए चारण’, ‘सपनों का पिंजरा’, ‘खाल हुई मोटी’ जैसी रचनाएँ स्वयं कविता और कवि की भूमिका पर प्रश्न उठाती हैं।
कवि यह स्वीकार करता है कि जब कविता सत्ता के दरबार में खड़ी हो जाती है, तब उसका नैतिक पतन तय है। यह आत्मालोचनात्मक स्वर संग्रह को केवल सामाजिक
आलोचना तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे आत्मसंघर्ष की कविता
बनाता है।
भाषा, शिल्प और गीतात्मकता: भाषा इस संग्रह की प्राणशक्ति है। कवि ने- लोकभाषा, देशज शब्द, मुहावरे, बोलचाल
की लय का अत्यंत सशक्त प्रयोग किया है। इससे गीतों में सहजता और संप्रेषणीयता
आती है।
प्रतीक, बिंब और रूपक: इस संग्रह में
प्रयुक्त प्रतीक अत्यंत जीवन-सापेक्ष हैं- इल्ली, जुमला, पिंजरा, दीप, खाल, ये
प्रतीक पाठक को तुरंत अपनी दुनिया से जोड़ते हैं। बिंब अमूर्त नहीं, बल्कि दृश्यात्मक हैं।
परंपरा और
समकालीनता: यह गीत–संग्रह
हिंदी की लोकगीत, जनगीत और
प्रगतिशील कविता परंपरा से जुड़ता है, लेकिन उसका अनुकरण नहीं करता। यह बहुस्तरीय है-
ü प्रेम और करुणा का स्वर: “अँधेरे में भी दीपक जलता है/ टूटे हुए मन को सहारा देता है।” यह पंक्ति दर्शाती है कि कवि केवल सामाजिक आलोचना
नहीं करता, बल्कि मानवीय संवेदना और आशा का संदेश भी देता है।
संग्रह में निराशा और प्रकाश का यह संतुलन बार–बार दिखाई देता है।
ü सामाजिक–राजनीतिक चेतना: “सत्ता की चुप्पियों में भी/जनता की आवाज़ गूँजती है।” इस पंक्ति के माध्यम से कवि यह बताता है कि सत्ता के
दबावों के बावजूद आम आदमी की चिंता, पीड़ा और संघर्ष कविता का केंद्रीय
विषय है।
ü आत्मालोचनात्मक दृष्टि: “मैं भी उन्हीं गलियों में खोया/जहाँ न्याय की राहें धुँधली हैं।” कवि स्वयं को भी सामाजिक विसंगतियों के घेरे में
रखकर प्रश्न करता है। यह संग्रह की सशक्त आत्मालोचनात्मक विशेषता को स्पष्ट
करता है।
ü परंपरा और नवाचार का मेल: “पुराने गीतों की मिठास/ नए शब्दों की ताजगी में बसी है।” यह पंक्ति संग्रह की परंपरा और आधुनिकता के
संतुलन को दर्शाती है। कवि परंपरागत लोकगीतों की सहजता को अपनाता है, लेकिन उसे समकालीन भाषा और भावनाओं के साथ नया रूप देता है।
- 1. आत्मबोध, प्रेम और मानवीय करुणा
- 2. स्मृति, विरह और व्यक्तिगत पीड़ा
- 3. श्रम, गरीबी और ग्रामीण यथार्थ
- 4. सामाजिक विडंबनाएँ और नैतिक क्षरण
- 5. राजनीति, सत्ता और व्यवस्था–विरोध
- 6. व्यंग्य, प्रतीक और कटाक्ष
- 7. वैचारिक चेतना, ज्ञान और प्रतिरोध
Ø भाग–एक: आत्मबोध, प्रेम और मानवीय करुणा: ये वे गीत आते हैं जिनमें प्रेम, उजास, जीवन-मूल्यों और मानवीय संवेदना का प्रतिनिधित्व है। यहाँ अंतर्मन की ज्योति, प्रेम, आशा, सौहार्द और सृजन की सकारात्मक चेतना मुखर है। जैसे - प्रेम
दीप, फूल रहा अमलतास, कुँवारा मन, घर आये ऋतुराज, स्वागत
करें नववर्ष का, पुस्तकें, जिंदगी की शाम आदि प्रमुख गीत हैं।
जब समाज बाह्य आडंबर, घृणा और हिंसा से घिरा है। कवि प्रेम को निजी भावना
नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखता है।
‘अंतर्मन में दीप’ जलाना आज के नैतिक अंधकार के विरुद्ध आत्मिक प्रतिरोध है। यह
भाव बोध हमें बताता है कि परिवर्तन की शुरुआत सत्ता से नहीं, संवेदना से होती
है।
“प्रेम दीप हम, चलो जलाये, निज अन्तर्मन में।
दंभ द्वेष छल तम मिट जाये, नय अभिनंदन में॥” (प्रेम दीप) अथवा
“खुशियों ने छोड़ पथ उदासी,
कष्ट झाड़ फेंक दिए बासी॥” (फूल रहा अमलतास)
Ø भाग–दो : स्मृति, विरह और व्यक्तिगत पीड़ा: ये वे गीत हैं जिनमें नींद, अकेलापन, पारिवारिक संवेदना मुखर है। यहाँ स्मृति, अभाव, पारिवारिक बोझ और अंतरंग पीड़ा का मार्मिक चित्रण है।
ये गीत हैं- नींद विरागी, आज अगर वे होते, पौष की रात, भार हुई अम्मा और जिंदगी
की ये नदी। यहाँ पीड़ा निजी होकर भी सामाजिक है। ‘नींद का विरागी होना’ आधुनिक
मनुष्य की अनिद्रा-ग्रस्त चेतना का प्रतीक है—जहाँ स्मृतियाँ चैन नहीं लेने देतीं।
‘अम्मा’ का बोझ बन जाना उस समाज की आलोचना है जो उपयोगिता समाप्त होते ही संबंधों
को त्याग देता है। ये गीत हमारे समय की भावनात्मक दरिद्रता को दर्ज करते हैं।
“नींद विरागी गई तपोवन, करके खाट खड़ी।
यादों के घन लगे बरसने, ज्यों हो लगी
झड़ी॥” (नींद विरागी)
अथवा
“रुख़सत होते ही बाबा के, लाचार हुई अम्मा।” (भार हुई अम्मा)
Ø भाग–तीन : श्रम, गरीबी और ग्रामीण यथार्थ: इस वर्ग में ये वे गीत हैं जिनमें मेहनतकश वर्ग के जीवन-संघर्ष अर्थात
श्रमशील समाज, स्त्री–जीवन, किसान और गरीब की विवशताओं को
यथार्थपरक स्वर हैं। ये गीत हैं- साँसें साँसत में, धूप क्वार का, रामकली, भैया
कुछ मजबूरी है, डाकू पीपर-पात आदि। इन गीतों में जीवन का नग्न यथार्थ
दृष्टिगोचर होता है।
“एक कुल्हाड़ी और दराती, मिली विरासत में॥”
(साँसें साँसत में) अथवा
“आ न सकूंगी इस राखी में, भैया कुछ मजबूरी है॥” (भैया कुछ मजबूरी है)
ये पंक्तियाँ विकास–कथाओं के समानांतर चल रहे हाशिये
के भारत को सामने लाती हैं। विरासत में औज़ार मिलना, सपने नहीं—यह पीढ़ीगत श्रम की नियति है। ‘मजबूरी’ यहाँ व्यक्तिगत नहीं, संरचनात्मक असहायता है। उत्सव, रिश्ते और भावनाएँ भी अर्थतंत्र की
शर्तों पर जी रही हैं।
Ø भाग–चार : सामाजिक विडंबनाएँ और नैतिक क्षरण: सामाजिक दोहरापन, बौद्धिक पतन और नैतिक खोखलेपन पर तीखा प्रहार करते ये वे गीत हैं जिनमें पाखंड, चाटुकारी, अवसरवाद कहीं
न कहीं हमारी लोक संवेदना के अंग बन गए हैं। जैसे शब्द गूँगे और बहरे, चाटुकारी
रस, खाल हुई मोटी, तुक्कड़ बना अमीर, गीत हुए चारण और गाली भरे खजाने।
“शब्द गूँगे और बहरे हो गए जब,
कौन फिर पीड़ा हृदय की कह सकेगा॥” (शब्द गूँगे और बहरे) या फिर
“गीत हुए हैं चारण सारे, अब क्या करे
कबीर॥” (गीत हुए चारण)
ये पंक्तियाँ आज के बौद्धिक पतन की तीखी शिनाख्त हैं।
जब शब्द सत्ता के सेवक बन जाते हैं, तब सत्य अनाथ हो जाता है। ‘कबीर’
यहाँ केवल कवि नहीं, बल्कि नैतिक निर्भीकता का प्रतीक है। कवि प्रश्न करता
है—जब गीत भी दरबार में बिक जाएँ, तब प्रतिरोध कहाँ बचे?
Ø भाग–पाँच : राजनीति, सत्ता और व्यवस्था–विरोध: लोकतंत्र, हिंसा, छल, दमन आदि की पृष्ठभूमि के ये वे गीत हैं जो सत्ता-संरचनाओं की क्रूरता, लोकतांत्रिक विफलता और जनविरोधी
राजनीति को उजागर करते हैं। जैसे- जिंदगी की ये नदी (राजनीतिक पक्ष), गाफ़िल
रामधनी, मुखिया जी, व्यवस्थाकी इल्ली, जुमलों की गारंटी, समय हुआ हत्यारा, कातिल
घटा और सौहार्द के कुछ बीज। भीमराव झरबडे यहाँ समय से सीधी मुठभेड़ करते हैं-
“कुर्सियों के कान बहरे, चीख सुन पाते
नहीं।” (जिंदगी की ये
नदी) या फिर
“समय हुआ हत्यारा साधो, नफरत पाले चाकू॥”
(समय हुआ हत्यारा)
यहाँ राजनीति अमूर्त नहीं, हिंसक यथार्थ बनकर आती है। ‘बहरे कान’ लोकतंत्र की विफलता का रूपक हैं। समय
स्वयं ‘हत्यारा’ हो जाना इस बात का संकेत है कि अन्याय अब अपवाद नहीं, नियम बन चुका है। गीत अपने समय को केवल देखता नहीं—कटघरे में खड़ा करता है।
Ø भाग–छह : व्यंग्य, प्रतीक और कटाक्ष: ये वे गीत हैं जो केवल हास्य नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक चोट का माध्यम
हैं। जैसे व्यंग्यों का गठजोड़, अरे! कबूतर, बासंती बंगा, महँगा है मौत से कफ़न
और सोने जैसे दिन । हँसी में छुपा आक्रोश इन गीतों में सहज ही अनुभूत
होता है।
“फटेकान के पर्दे
सुन-सुन, जुमलों की गारंटी॥” (जुमलों की गारंटी) अथवा
“अरे! कबूतर दड़बे
में रह, ये दिन गरियाते॥” (अरे! कबूतर)
यह व्यंग्य मनोरंजन नहीं, राजनीतिक चेतावनी है। ‘जुमलों की
गारंटी’ समकालीन भाषण-तंत्र की पोल खोलती है। ‘कबूतर’ निरीह नागरिक है जिसे डराकर
दड़बे में रहने की सीख दी जा रही है। व्यंग्य यहाँ प्रतिरोध का सबसे तीखा औज़ार
बनता है।
Ø भाग–सात : वैचारिक चेतना, ज्ञान और प्रतिरोध: ये गीत विवेक, प्रश्नाकुलता और बौद्धिक प्रतिरोध की चेतना से सम्पन्न
हैं। जैसे- ज्ञान पर ताला, शब्दों का संयम, देह दीप और मिला न पुण्यछदाम।
इन गीतों में आशा का अवशेष है-
“ठोकना मत पोथियों के, ज्ञान पर ताला।” (ज्ञान पर ताला।) या फिर
“पुस्तकें हैं स्रोत अमरित पान की॥” (पुस्तकें)
जब समाज भीड़ में बदल रहा हो, तब ज्ञान और पुस्तकें अंतिम आश्रय बनती हैं। ये पंक्तियाँ
अज्ञान-आधारित सत्ता के विरुद्ध बौद्धिक संघर्ष का घोष हैं। कवि स्पष्ट करता है कि
प्रतिरोध केवल सड़क पर नहीं, विचार में भी होता
है।
इस संग्रह का
केंद्रीय स्वर मानवीय चेतना का क्षरण और उसके विरुद्ध
उठता प्रश्नबोध है। ‘प्रेम दीप’,
‘देह दीप’, ‘शब्दों
का संयम’ जैसे गीत जहाँ करुणा, प्रेम
और आत्मालोकन की ओर ले जाते हैं, वहीं
‘जुमलों की गारंटी’, ‘गाफ़िल
रामधनी’, ‘व्यंग्यों का
गठजोड़’ और ‘व्यवस्था की इल्ली’ जैसे गीत सत्ता,
पाखंड
और नैतिक पतन पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि की दृष्टि सजग है—वह केवल दृश्य नहीं
देखती, बल्कि उसके पीछे
सक्रिय छल-छद्म को भी उजागर करती है।
इस संग्रह में नारी,
श्रमजीवी,
किसान,
वृद्ध,
बालक
और हाशिए पर खड़ा मनुष्य बार-बार उपस्थित होता है। ‘रामकली’,
‘भार हुई अम्मा’,
‘भैया कुछ मजबूरी है’ जैसे गीत संवेदना के चरम बिंदु पर
पहुँचते हैं और पाठक को भीतर तक झकझोर देते हैं। वहीं ‘सपनों का पिंजरा’,
‘खाल हुई मोटी’, ‘गीत
हुए चारण’ जैसी रचनाएँ चेतावनी देती हैं कि जब कविता सत्ता की चाकरी में लग जाती
है, तब उसका नैतिक पतन
अवश्यंभावी हो जाता है।
प्रस्तुत गीत–संग्रह इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि
इसमें अभिधा की स्पष्टता, लक्षणा की प्रतीकात्मकता और व्यंजना
की गहनता—तीनों का सर्जनात्मक सह-अस्तित्व दिखाई देता है। अभिधा
में कही गयी पंक्तियाँ “एक कुल्हाड़ी और
दराती, मिली विरासत में” या फिर “आ न सकूंगी इस राखी में, भैया कुछ मजबूरी है” सामाजिक यथार्थ, श्रम, गरीबी, स्त्री–जीवन और राजनीतिक विडंबनाएँ को बखूबी बयां करती हैं। यहाँ शब्द किसी
अलंकारिक आवरण में नहीं, बल्कि सीधे जीवन–सत्य को उद्घाटित
करते हैं। ‘कुल्हाड़ी’ और ‘दराती’ श्रम के ठोस उपकरण हैं, जो बिना किसी रूपक के ही शोषण और पीढ़ीगत निर्धनता को अभिव्यक्त कर देते हैं।
अभिधा की यह प्रखरता गीतों को लोकधर्मी और संप्रेषणीय बनाती है।
“कुर्सियों के कान
बहरे, चीख सुन पाते नहीं” अथवा “गीत हुए हैं चारण सारे, अब क्या करे कबीर” यहाँ ‘कुर्सियाँ’ सत्ता का और ‘कान बहरे होना’ सत्ता की असंवेदनशीलता का
लक्षणात्मक संकेत है। इसी प्रकार ‘चारण’ दरबारी कवियों का प्रतीक बनकर सामने आता
है। लक्षणा के माध्यम से कवि प्रत्यक्ष आरोप से बचते हुए भी तीखी सामाजिक
आलोचना करता है, जिससे गीतों की अर्थ-व्याप्ति बढ़ जाती है।
व्यंजना इस संग्रह की सबसे सशक्त काव्य-शक्ति है। यहाँ शब्द अपने कहे से अधिक अनकहे
अर्थों को उद्घाटित करते हैं। यही शक्ति गीतों को साधारण कथन से उठाकर वैचारिक
कविता के स्तर पर स्थापित करती है। उदाहरणत:“समय हुआ हत्यारा साधो, नफरत पाले चाकू” या फिर “शब्द गूँगे और बहरे हो गए जब…” यहाँ ‘समय का हत्यारा होना’ कोई प्रत्यक्ष घटना नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक परिवेश की हिंसक मानसिकता की व्यंजना है। इसी प्रकार
‘शब्दों का गूँगा हो जाना’ अभिव्यक्ति की मृत्यु का संकेत है। व्यंजना के माध्यम
से कवि पाठक को केवल देखने नहीं, अनुभव करने के लिए विवश करता है।
कह सकते हैं कि इस गीत–संग्रह की विशेषता यह है कि अभिधा गीतों को
जनसाधारण से जोड़ती है, लक्षणा उन्हें बौद्धिक ऊँचाई देती है, और व्यंजना उन्हें समय का नैतिक दस्तावेज़ बना देती है। तीनों
शब्द-शक्तियाँ परस्पर विरोध में नहीं, बल्कि पूरक रूप में प्रयुक्त
हुई हैं। यही कारण है कि ये गीत न तो केवल नारा बनते हैं, न ही केवल सौंदर्यात्मक विलास—वे संवेदनशील प्रतिरोध का रूप ग्रहण करते
हैं। निष्कर्षत: प्रस्तुत गीत–संग्रह में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का ऐसा संतुलित और सजग प्रयोग है जो समकालीन हिंदी गीत को
उसकी सशक्त पहचान प्रदान करता है। इन गीतों की काव्यात्मक शक्ति इसी में निहित है
कि वे—जो कहते हैं, उससे अधिक अर्थ
रचते हैं।
आलोचनात्मक संतुलन की दृष्टि से किसी भी कृति के प्रबल और दुर्बल पक्षों पर
विचार आवश्यक है। प्रस्तुत गीत–संग्रह के प्रबल पक्षों की चर्चा करते हुए
सर्वप्रथम उसकी समय–साक्ष्य बनने की क्षमता उल्लेखनीय है। ये गीत अपने समय
का केवल भावात्मक प्रतिरूप नहीं रचते, बल्कि उसे नैतिक और ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में दर्ज
करते हैं। राजनीति, सत्ता, श्रम, गरीबी, स्त्री–वेदना और सामाजिक विडंबनाएँ यहाँ अमूर्त
संकेतों के रूप में नहीं, बल्कि जीवित यथार्थ की तरह उपस्थित हैं। “समय
हुआ हत्यारा साधो…” जैसी पंक्तियाँ गीत को समकालीन इतिहास का संवेदनशील दस्तावेज़
बना देती हैं। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष शब्द–शक्ति का संतुलित प्रयोग है। अभिधा, लक्षणा और व्यंजना
का संयमित एवं उद्देश्यपूर्ण उपयोग गीतों को न तो नारेबाज़ी की सीमा में बाँधता है
और न ही उन्हें मात्र सौंदर्यात्मक प्रदर्शन तक सीमित करता है। यह भाषिक संतुलन
इन्हें समकालीन हिंदी गीत–परंपरा में एक सशक्त और विश्वसनीय उपस्थिति प्रदान करता है।
लोकधर्मिता और संप्रेषणीयता इस संग्रह की केंद्रीय शक्ति है। भाषा सहज, बोलचाल की और
अनुभव–सिद्ध है। ‘अम्मा’, ‘भैया’, ‘दराती’, ‘कुर्सी’ और ‘जुमला’ जैसे शब्द पाठक को तत्काल उसके
सामाजिक और जीवनगत संदर्भों से जोड़ देते हैं। यह लोक–संवेदना गीतों को जनपक्षधर
बनाती है और उन्हें व्यापक पाठक–समुदाय तक पहुँचने योग्य बनाती है। इसी क्रम में
व्यंग्य की तीक्ष्णता भी उल्लेखनीय है। यहाँ व्यंग्य सतही मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और
सत्ता–भाषा की विसंगतियों को उघाड़ने वाला उपकरण है। वह हँसाने से अधिक चुभता है
और पाठक को असहज करते हुए सोचने के लिए बाध्य करता है। यही तीक्ष्णता इन गीतों को
समकालीन सामाजिक यथार्थ से गहरे जोड़ती है। समग्रतः, ये गुण प्रस्तुत
गीत–संग्रह को वैचारिक, भाषिक और संवेदनात्मक स्तर पर सुदृढ़ बनाते हैं तथा
उसे समकालीन हिंदी गीत–कविता में एक अर्थपूर्ण और महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में
प्रतिष्ठित करते हैं।
यद्यपि प्रस्तुत गीत–संग्रह वैचारिक और संवेदनात्मक रूप से सशक्त है, तथापि इसके कुछ
पक्ष ऐसे भी हैं जहाँ और अधिक संतुलन की संभावना दिखाई देती है। सर्वप्रथम, संग्रह में
व्यवस्था–आलोचना, विडंबना और पीड़ा के स्वर अत्यंत सघन रूप में उपस्थित
हैं। यह सघनता जहाँ एक ओर रचनात्मक प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, वहीं कुछ स्थलों
पर भावात्मक विविधता के सीमित होने का आभास भी कराती है। परिणामतः प्रतिरोध का
स्वर कहीं–कहीं दोहराव–सा प्रतीत हो सकता है। इसी क्रम में, कुछ गीतों में
वैचारिक आग्रह इतना प्रबल हो जाता है कि गीतात्मक लय और गेयता अपेक्षाकृत पीछे
छूटती प्रतीत होती है। ऐसे स्थलों पर कविता की संगीतात्मकता क्षीण नहीं होती, बल्कि वह कथ्य की
गंभीरता के अधीन हो जाती है, जिससे कथन कभी–कभी गीत से अधिक वक्तव्य का रूप ग्रहण
कर लेता है। प्रतीक–योजना की दृष्टि से भी संग्रह सामान्यतः प्रभावी है, किंतु कुछ
प्रतीकों- जैसे ‘कुर्सी’, ‘जुमला’ या ‘कबीर’- का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक होने के
कारण उनके अर्थ–विस्तार की संभावनाएँ पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं। यदि इन
प्रतीकों को नए संदर्भों और कोणों से और अधिक विस्तार मिलता, तो अर्थ–संवेदना
और गहन हो सकती थी। इसी प्रकार, प्रतिरोध और विडंबना की प्रधानता के बीच आशा, स्वप्न और
वैकल्पिक भविष्य के संकेत अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं। यद्यपि यह गंभीरता संग्रह
को वैचारिक रूप से दृढ़ बनाती है, फिर भी कहीं–कहीं पाठक को निराशा का बोध हो सकता है।
इन सीमाओं के बावजूद यह स्पष्ट है कि ये पक्ष रचनात्मक दुर्बलता से अधिक कवि की
गहन प्रतिबद्धता और वैचारिक आग्रह का परिणाम हैं। समग्रतः ये संभावनाएँ संग्रह के
मूल्य को कम नहीं करतीं, बल्कि उसके आगे के विस्तार और विकास की दिशा की ओर
संकेत करती हैं।
फिर भी यह दुर्बलताएँ रचनात्मक ईमानदारी को कम नहीं करतीं। बल्कि यह
कहा जा सकता है कि इन गीतों की शक्ति उनकी बेचैनी में है, और उनकी सीमा भी। इस सबके बीच बीच प्रस्तुत
गीत–संग्रह की अपनी अलग पहचान उभरती है। यह- न तो पूरी तरह गीतात्मक पलायन है, न ही केवल राजनीतिक नारा। बल्कि यह बेचैन समय का ईमानदार गीत
है। समकालीन
नवगीत परंपरा में इसकी जगह एक ऐसे रचनाकार के रूप में
बनती है जो
पहले जवाबदेह
है, फिर सौंदर्यप्रिय।
आइए “गुंजित हुए दिगन्त” शीर्षक पर संक्षेप में
विचार करें। इस संग्रह में “गुंजन” किसी एक भाव का नहीं, बल्कि
करुणा,
प्रेम, पीड़ा, प्रतिरोध, प्रश्न और
आशा के संयुक्त स्वर का रूप है। वहीं “दिगन्त” केवल भौगोलिक दिशा नहीं, बल्कि
व्यक्ति से समाज, अंतस से व्यवस्था और वर्तमान से समय-विस्तार
तक फैली अनुभूति का संकेत है। इस प्रकार शीर्षक उस काव्य-स्थिति को रेखांकित करता
है जहाँ गीत व्यक्तिगत होकर भी सीमाएँ तोड़ देता है। संग्रह की यात्रा अंतर्मन से
आरंभ होती है—“प्रेम दीप हम, चलो जलाएँ”—जहाँ आत्मशुद्धि का आग्रह
है,
किंतु
यह साधना व्यक्तिगत स्तर पर ठहरती नहीं। “दिग-दिगंत तक कण-कण उज्ज्वल हो” की कामना
में वह सामूहिक प्रकाश का रूप ले लेती है। यही इस शीर्षक का केंद्रीय आशय है। “नींद
विरागी” में अनिद्रा केवल व्यक्ति की नहीं, पूरे समय
की बेचैनी है—सामाजिक चैन और सुरक्षित भविष्य के अभाव की प्रतीक। “साँसें साँसत
में” श्रम,
भूख
और शोषण को पीढ़ीगत विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी गूँज
गाँव से राजनीति तक फैलती है। “कुहरेवाले दिन” में भय, भ्रम और
अंधापन समय की पहचान बनकर सर्वदिशात्मक हो जाता है। “शब्द गूँगे
और बहरे” मौन और असंवेदनशीलता के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध का बिंदु है—जहाँ दबाई
गई आवाज़ और दूर तक गूँजती है। “आज अगर वे होते” स्मृति और मानवीय ऊष्मा की क्षति
को सामूहिक अनुभव के रूप में सामने लाता है, जो अतीत, वर्तमान और
भविष्य तीनों में फैलती है। इन गीतों से स्पष्ट होता है कि कवि का स्वर नारा नहीं, अनुभूति
है—जो सीमित नहीं की जा सकती। “गुंजित” (प्रतिध्वनि) और “दिगन्त” (विस्तार) मिलकर
संग्रह की आत्मा को पकड़ते हैं।
यदि इस गीत–संग्रह
की तुलना समकालीन हिंदी गीत–कविता से की जाए,
तो
इसकी कुछ विशिष्टताएँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं। सर्वप्रथम,
इसमें
जनपक्षधरता किसी प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सीमित नहीं रहती,
बल्कि
जीवन की ठोस यथार्थभूमि पर प्रतिष्ठित दिखाई देती है। व्यंग्य का प्रयोग तीव्र
होते हुए भी मर्यादित है, जिससे
वह आक्रोश की अभिव्यक्ति बनता है, कटुता
का नहीं। भाषा की संप्रेषणीयता इस संग्रह की प्रमुख शक्ति है—गीत पाठक से सीधे
संवाद करते हैं और केवल अकादमिक दायरे में सिमटकर नहीं रह जाते। साथ ही,
कवि
की आत्मालोचनात्मक दृष्टि उसे नैतिक ऊँचाई प्रदान करती है,
क्योंकि
वह स्वयं को भी प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं रखता।
इस संग्रह में
राजनीति किसी पृथक विषय के रूप में नहीं, बल्कि
जीवन की अनिवार्य संरचना के रूप में उपस्थित है। कवि राजनीति को सत्ता–केन्द्रित
नहीं, मानव–केन्द्रित
दृष्टि से देखता है—जहाँ राजनीति भाषा, संबंधों
और संभावनाओं को प्रभावित करती है। इस दृष्टि से गीत राजनीतिक अवश्य हैं,
किंतु
दलीय नहीं। यही संतुलन इन्हें वैचारिक रूप से विश्वसनीय बनाता है।
नैतिक संवेदना इस
संग्रह की एक और उल्लेखनीय विशेषता है। कवि अन्याय और मूल्य–क्षरण की पहचान करता
है, पर उसका स्वर उपदेशात्मक
नहीं हो जाता। वह परिस्थितियों को इस तरह रचता है कि पाठक स्वयं नैतिक निष्कर्ष तक
पहुँचे। यह साहित्यिक परिपक्वता का संकेत है।
यद्यपि
व्यवस्था–आलोचना और पीड़ा के स्वर प्रबल हैं,
फिर
भी संग्रह निराशा में नहीं डूबता। प्रेम, करुणा,
मानवीय
संबंध और आत्मसम्मान के गीत बार–बार आशा का संचार करते हैं। ‘प्रेम दीप’ जैसे गीत
यह स्पष्ट करते हैं कि अंधकार कितना भी व्यापक हो,
मानवीय
चेतना का प्रकाश पूर्णतः नष्ट नहीं किया जा सकता। इसी कारण यह संग्रह आलोचना के
साथ–साथ संभावना की कविता भी बनता है।
यह कृति आज के पाठक
के लिए इसलिए भी प्रासंगिक है कि यह उसकी रोज़मर्रा की भाषा में बात करती है,
उसकी
उलझनों को पहचानती है और उसके प्रश्नों को स्वर देती है। पाठक यहाँ निष्क्रिय
उपभोक्ता नहीं रहता, बल्कि
सामाजिक और नैतिक रूप से सजग होने के लिए प्रेरित होता है।
समग्रतः
यह गीत–संग्रह समकालीन हिंदी गीत–कविता में एक महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण हस्तक्षेप
के रूप में स्थापित होता है। यह सामाजिक, राजनीतिक
और नैतिक प्रश्नों को गीतात्मक रूप देता है,
परंपरा
और आधुनिकता के बीच संतुलन साधता है तथा पाठक को भावनात्मक ही नहीं,
बौद्धिक
स्तर पर भी सक्रिय करता है। अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह अपने समय की आत्मा
को पकड़ने का एक गंभीर साहित्यिक प्रयास है—ऐसा प्रयास जो प्रमाणित करता है कि गीत
आज भी प्रश्न पूछ सकता है, प्रतिरोध
रच सकता है और मनुष्य को मनुष्य बने रहने की याद दिला सकता है।
अतः
यह गीत–संग्रह “गुंजित
हुए दिगंत” हिंदी साहित्य की सुदीर्घ परंपरा में लोकमंगल,
सत्य
और संवेदना का सशक्त संवाहक सिद्ध हो—यही मंगलकामना है। कवि की लेखनी समय के जटिल
प्रश्नों से टकराते हुए भी मानवीय करुणा, सौंदर्यबोध
और नैतिक विवेक को अक्षुण्ण बनाए रखे। समेकित रूप में यह गीत–संग्रह समकालीन हिंदी
गीत–कविता में एक सार्थक और प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में प्रतिष्ठित होता है,
जो
सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक
प्रश्नों को गीतात्मक संवेदना में रूपांतरित करता हुआ परंपरा और आधुनिकता के मध्य
संतुलन स्थापित करता है। यह संग्रह केवल पठनीय नहीं,
संवादात्मक
है—और अपने वैचारिक साहस, भाषिक
सामर्थ्य तथा मानवीय सरोकारों के कारण दीर्घकाल तक स्मरणीय बने रहने की क्षमता
रखता है। इति शुभम्।
‘चंद्रप्रभा
विला’
417,
रॉयल रेजीडेंसी – प्रथम फेज
सारंगपुरा,
बड़ के बालाजी,
अजमेर
रोड,
जयपुर-302042
#91
82099 09309