जब से आई कनलगो, तब से छूटी थनलगो

 जब से आई कनलगो, तब से छूटी थनलगो

- अशोक शर्मा ‘कटेठिया’

भूमिका:

भारतीय समाज की जड़ें परिवार और रिश्तों की मिट्टी में गहराई तक फैली हुई हैं। यहाँ रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, भावना के होते हैं, और हर संबंध एक धागे की तरह पूरे पारिवारिक ताने-बाने में गुंथा होता है। विवाह उस धागे में एक नई गाँठ जोड़ता है — कभी मज़बूत, तो कभी उलझी हुई। इन्हीं रिश्तों की जटिलता को गाँव की सीधी-सादी मगर चुभती हुई भाषा में कहती है एक चर्चित लोकोक्ति — “जब से आई कनलगो, तब से छूटी थनलगो।”

मेरी बुआ इस कहावत को अक्सर दोहराया करती थीं। उनके चेहरे पर कोई कटाक्ष तो नहीं होता था, लेकिन आवाज़ में छुपा दर्द कभी छुप नहीं पाता। 

इस लोकोक्ति का शाब्दिक अर्थ तो सरल है — "जब से बहू (कनलगो) घर में आई, तब से माँ (थनलगो) की दूरी बढ़ गई।” लेकिन इसका भावार्थ कहीं अधिक गहरा है: 

* "थनलगो" — यानि वह जिसने स्तनों से पाला, जीवन के हर मोड़ पर सहारा दिया।

* "कनलगो" — यानि वह जो हाथ में कंगन पहनकर आई, और अब जीवन की नई साथी बनी। जिसका शाब्दिक अर्थ- कान भरने वाली होता है। 

यह कहावत किसी एक व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाती, बल्कि एक सामाजिक और पारिवारिक मनोविज्ञान की ओर संकेत करती है — जब बेटे की प्राथमिकताएँ विवाह के बाद बदल जाती हैं, और माँ, जो जीवन की धुरी रही, हाशिए पर चली जाती है।

सामाजिक संदर्भ: रिश्तों की रस्साकशी

गाँव-देहातों और पारंपरिक संयुक्त परिवारों में यह कहावत जैसे घर-घर की कहानी है। यहां: कभी बहू अपने पति के कान भरती है, कभी बेटा खुद ही माँ से दूरी बना लेता है, और कभी माँ को लगता है कि बहू ने उसका बेटा ‘छीन’ लिया है। इन सबके बीच जो गुम हो जाती है, वह है संवाद और संवेदनशीलता। यह स्थिति "माँ के अधिकार बनाम पत्नी का स्नेह" नहीं है, बल्कि एक संतुलन की माँग है — जहाँ दोनों अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं।

व्यंग्य और चेतावनी

यह लोकोक्ति जितनी सरल है, उतनी ही चेतावनी देती है। जिसने जन्म दिया, चलना सिखाया, गिरने पर उठाया — उसके अस्तित्व को एक नया रिश्ता पाकर नज़रअंदाज़ कर देना न इंसाफ़ है, न इंसानियत। यह व्यंग्य समाज के उस ‘आधुनिक’ चेहरे पर तमाचा है, जो रिश्तों को भावनाओं की बजाय सुविधाओं से मापने लगा है।

आज के संदर्भ में प्रासंगिकता

आज जब संयुक्त परिवार धीरे-धीरे ‘संयमित संवाद’ वाले व्हाट्सएप समूहों में बदल रहे हैं, यह लोकोक्ति और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो गई है। अब माँ-बेटे की बातचीत भी "व्यस्त हूँ" के संक्षिप्त मार्ग (शॉर्टकट) में सिमटने लगी है। और बहुओं की भूमिका कई बार “व्यतिक्रम न करें” (डिस्टर्ब न करो) जैसे व्यवहार में बदल जाती है। इन बदलते सामाजिक परिदृश्यों में यह जरूरी है कि: बेटा रिश्तों के बीच सेतु बने, दीवार नहीं। माँ को ‘बीते समय की कहानी’ नहीं, आज की ज़रूरत माना जाए। और पत्नी को भी यह एहसास हो कि माँ उसका भी रिश्ता है, सिर्फ़ पति की नहीं।

निष्कर्ष

वस्तुतः संतुलन ही समाधान है। “जब से आई कनलगो, तब से छूटी थनलगो” — यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि एक भावनात्मक दस्तावेज़ है। यह हमें याद दिलाती है कि नए रिश्ते पुराने रिश्तों को निगल न जाएं, और मूल रिश्ते नए रिश्तों के विकास में बाधा न बनें। माँ और पत्नी — दोनों स्त्रीत्व के दो पक्ष हैं, जिनके बीच संतुलन, समझ और स्नेह ही एक सुखद पारिवारिक जीवन की कुंजी है।

अंत में यही कहूँगा कि रिश्ते बनाना आसान है, निभाना कठिन, और संतुलन बनाए रखना सबसे कठिन। पर जब दिल में जगह हो, तो रिश्ते बोझ नहीं लगते — चाहे वो थनलगो हो या कनलगो।

-अशोक शर्मा 'कटेठिया'

जयपुर. 

१५.१२.२०२५ 

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