जीजा

 जी जा !!!

भारतीय लोक परंपराएँ और रीति-रिवाज़ समाज की जीवनधारा से जुड़े हुए होते हैं, और प्रत्येक रस्म में एक गहरी अर्थवत्ता और सांस्कृतिक बोध छिपा होता है। विवाह, जो कि भारतीय समाज में एक पवित्र बंधन के रूप में देखा जाता है, न केवल दो व्यक्तियों को जोड़ता है, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो दुनियाओं का मिलन होता है। इस मिलन की विभिन्न रस्में, चाहे वे शादी से पहले की हों या बाद की, न सिर्फ वैवाहिक जीवन की शुरुआत होती हैं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत भी करती हैं।

वरिक्षा, फलदान, सात फेरे—ये सब भारतीय विवाह की शास्त्रीय और सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इन रस्मों में गहरा प्रतीकवाद है, जहां विवाह के प्रत्येक चरण में एक नई दार्शनिकता, सांस्कृतिक मूल्य और लोकविश्वास समाहित होते हैं। खासतौर पर उत्तर भारत में, जहाँ अवधी, ब्रज और अन्य लोक भाषाएँ प्रचलित हैं, इन रस्मों में हास्य और व्यंग्य की अद्भुत झलकियाँ देखी जा सकती हैं।

विवाह के इन रस्मों को लोककवियों, गीतों और नाटकों के माध्यम से जीवित रखा जाता है। इन रस्मों में जाने-अनजाने में हास्य, ठहाके, और मजाक का मिलाजुला स्वरूप दिखता है, जो न सिर्फ परंपरा को हल्का-फुल्का बनाता है, बल्कि रिश्तों में भी मिठास भर देता है। यह हास्य उस समय का भी प्रतीक है, जब मान्यताएँ और रीतियाँ समाज के कठोर दायरों से बाहर निकलकर सामान्य जीवन के रंगों से मिश्रित हो जाती हैं।

यही रीतियाँ लोककविता में न केवल विवाह की महत्ता और उसकी रस्मों को उजागर करती हैं, बल्कि इन रस्मों को एक हास्य के रूप में प्रस्तुत करके सामाजिक संबंधों और रिश्तों की जटिलताओं को सरलता से व्यक्त करती हैं।

इस साहित्यिक प्रस्तुति के माध्यम से, हम इन विवाह की रस्मों में समाहित हास्य और व्यंग्य को भारतीय लोक रीति के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि विवाह के इन पवित्र बंधनों में छिपे हंसी के पहलू को भी सही संदर्भ में देखा जा सके।

लोक की चौपाल में, पीढ़ियों से चली आती कथाओं के बीच, हमारे बुजुर्ग मुस्कराकर यह दोहा सुनाते रहे हैं-

"लक्ष्य वरिक्षा में भये      फलदाने मा बाण

भौंरी सातो जब फिरी, निकसन लागे प्राण।।

यह दोहा विवाह नहीं, वर की नियति का वृत्तांत है। वरिक्षा होते ही मानो तरकश से तीर निकल आता है-अब लड़का लक्ष्य बन चुका है फलदान में वह तीर सटीक लग जाता है; अर्थात टीका लगते ही बचने का हर मार्ग बंद। और जब सात भांवरें पूरी होती हैं, तो लोकहास्य कहता है-

“लो भइया, अब तो प्राण ही निकलने लगे...

पर यहीं से कथा और रस लेती है। दुल्हन के भाई-बहन कहते हैं—“जी, जा!” अर्थात-

अरे जीजा, मर ही रहे हो तो ठीक से जी भी जाओ! अब तो हमारे हो गए!

सार यह है कि यह मृत्यु नहीं, स्वतंत्रता की हास्यात्मक बलि है। यह प्राणांत नहीं, रिश्तों का जन्म है।

भारतीय लोक परंपरा में विवाह बंधन नहीं- एक ऐसा रंगमंच है जहाँ व्यंग्य भी प्रेम है, और ठिठोली भी अपनापन। जीजा का “मरना” और सालों का “जिलाना”- इसी खट्टे-मीठे हास्य में रिश्तों की उम्र बढ़ती है।

-अशोक शर्मा ‘कटेठिया

जयपुर।

२१.१२.२०२५

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