मुकुट सक्सेना की नवगीत चेतना

 

मुकुट सक्सेना की नवगीत चेतना

-      अशोक शर्मा ‘कटेठिया

प्रायः यह सर्वमान्य है कि गीतकाव्य की परंपरा लगभग आदिकाल से ही रही है। इस क्रम में गीत ने अलग-अलग कालखण्डों में अपने उत्तरोत्तर विकास को निहारा है. किन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति या यूँ कहें कि सन १९५० के बाद आधुनिक प्रगति के परिपेक्ष्य में गीत की चेतना में वैचारिक रूप से आमूलचूल परिवर्तन आया. इस नयी चेतना में जहाँ आशावादी यथार्थोन्मुखता थी, वहीं विकास की नयी संभावनाओं के बीच सामाजिक रुढ़ियों एवं अतार्किक परंपराओं के प्रति आक्रोश या कहें विद्रोह भी था. धीरे-धीरे शहरीकरण के दौर में प्रगति के साथ-साथ जीवन में आयी यांत्रिकता, विसंगतियाँ, संत्रास, कुंठा के साथ-साथ ग्राम्य जीवन की यादों को सहेजने की उत्कंठा भी तीव्र हुई. क्योंकि शहरों की ओर हुए पलायन ने उसके जीवन से उसकी सरसता और माटी से उसकी जड़ें छीन ली थी. उसके बाद यथार्थ जीवन में जिस तरह से सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए, जिनमें प्रमुखता से जब लोकतंत्र का खोखलापन, परिवर्तन के प्रति निराशा, या आपातकाल के डर से उपजी अनास्था, घुटन, पारिवारिक विघटन आदि से मनुष्य का सामना हुआ तो अभिव्यक्ति का एक नया तेवर गीत ने धारण कर लिया. जिसे नवगीत आन्दोलन के रूप में जाना गया.

कहना न होगा कि नवगीत ने समय की नब्ज़ को संजीदगी से खंगाला और रोमानियत, कपोल-कल्पना, चाटुकारिता आदि का विग्रह त्याग कर मुखर होकर प्रतिरोध का स्वर तेज किया. इस अलख को जगाने में जो अग्रणी रहे, उनमें सर्वश्री राजेन्द्र प्रसाद सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, ठाकुर प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, कुँवर बेचैन, अनुप अशेष, मयंक श्रीवास्तव, देवेद्र शर्मा इंद्र, वीरेन्द्र मिश्र, योगेद्रदत्त शर्मा, ज़हीर कुरेशी, माहेश्वर तिवारी, उमाकांत मालवीय, बुध्दिनाथ मिश्र, श्रीराम सिंह, पाल भसीन, नचिकेता, विद्यासागर वर्मा, रमेश रंजक आदि बड़े नाम हैं. (हालाँकि बाद की पीढ़ी के नवगीतकारों का भी नवगीत के विकास में बड़ा योगदान है, किन्तु उन सबका उल्लेख करना यहाँ ध्येय नहीं है). इस बीच नई कविता के रचनाकारों और उनके तथाकथित समर्थकों ने गीत को ही नकारना आरंभ कर दिया था, या यूँ कहें कि छान्च्द्सिक कविता को ही नकारने लगे. नामी समालोचकों ने भी नई कविता के बनिस्बत नवगीत पर उतनी चर्चा नहीं की, जितने का वह अधिकारी था. स्वयं नचिकेता भी यह मानते हैं कि “नवगीत को हिंदी की समकालीन आलोचना गंभीर काव्य मानने से ही इंकार कर रही है और समकालीन कविता के पाठ्यक्रमों से वहिष्कृत करके शनैः – शनैः आने वाले समय में विशाल पाठक वर्ग से दूर करने के षड़यंत्र में सफल होती जा रही है.” (प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत : पृष्ठ- ११७). इन चुनौतियों के बीच गीतकारों ने भी नई कविता के तेवर या संवेदन को गीत में ढाल कर नई कविता के रचनाकारों के छंद न साध पाने की असमर्थता को रेखांकित किया. ऐसे तमाम गीत जो व्यष्टि परक न होकर समष्टि परक थे, ‘नवगीत’ नाम से जाने गए. आज यह स्थापित हो चुका है कि नवगीत भी साठोत्तरी हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है.

बहरहाल, छंद साधना की इस चुनौती को जिन नवगीतकारों ने स्वीकार किया या यूँ कहें- बीड़ा उठाया, उनमें मुकुट सक्सेना का विशिष्ट स्थान है. अलीगढ (उ. प्र.) के बसावनपुर सिल्ला में जन्मे मुकुट सक्सेना जी की आजीविका और साहित्यिक यात्रा की कर्मभूमि जयपुर शहर रही. सम्प्रति जयपुर शहर ही अब उनका स्थायी ठिकाना है.

विगत ५० (लगभग) वर्षों से स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित होने के साथ-साथ गीत-नवगीत (हालाँकि अब तक उनका केवल एक ही गीत-ग़ज़ल संग्रह ‘शब्द यात्रा पर हैं’ का प्रकाशन हुआ है) के कई बहुचर्चित समवेत संकलनों में मुकुट सक्सेना की उल्लेखनीय उपस्थिति है. जिनमें दिनेश सिंह द्वारा सम्पादित- ‘नए पुराने गीत-अंक ४’, वीरेन्द्र आस्तिक द्वारा सम्पादित- ‘धार पर हम’,  नचिकेता द्वारा सम्पादित- ‘गीत वसुधा’ एवं ‘समकालीन गीतकोश’, राधेश्याम बन्धु द्वारा सम्पादित- ’नवगीत के नए प्रतिमान’, डॉ. रणजीत पटेल द्वारा सम्पादित- ‘सहयात्री समय के’, मधुकर गौड़ द्वारा सम्पादित- ‘बीसवीं सदी के श्रेष्ठ गीत’ और ‘गीत और गीत- भाग-४’, निर्मल शुक्ल द्वारा सम्पादित- ‘शब्दायन’ और ‘शब्द्पदी’, एवं  डॉ. ओम प्रकाश सिंह द्वारा सम्पादित ‘नयी सदी के नवगीत- भाग २’, आदि प्रमुख संकलन हैं.

यहाँ यह महत्वपूर्ण ख़बर है कि डॉ. ओम प्रकाश सिंह द्वारा सम्पादित “नयी सदी के नवगीत” के प्रथम तीन खंडों का महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में नवगीत के स्वतंत्र विधा के रूप में स्थान देने हेतु बुद्धिनाथ मिश्र जी द्वारा गंभीर प्रयास किये गए, जिनमें  अन्य नवगीतकारों के साथ-साथ मुकुट सक्सेना जी के सभी १० नवगीत भी शामिल थे. इसका उल्लेख नचिकेता जी ने भी अपनी विवेचना “ ’नयी सदी के नवगीत’ का दृष्टि संकट ” (प्रतिरोध में खड़ा समकालीन गीत: पृष्ठ- ११७) के शुरुआत में ही किया है.

समकालीन कविता कोश” में मुकुट सक्सेना का परिचय देते हुए डॉ. गुरचरण सिंह लिखते हैं कि- “कवि ने गीत और गज़लें लिखी हैं. उनकी कविता में राजनीति, परिवेश की विसंगति, कविता का भौतिकवादी दृष्टिकोण, मनुष्य का शोषण, दमन, उत्पीड़न के साथ-साथ प्रेम, प्रकृति, परिवार, जीवन संघर्ष के विविध चित्र उभरते हैं. उसकी कविता में विषयगत विविधता है. वह तर्क और विवेक पर बल देता है. उसकी कविता में प्रामाणिकता तथा ईमानदारी है. उसकी कल्पना और संवेदना अति का स्पर्श नहीं करती. उसका सरोकार आज के समय तथा मनुष्य के साथ है. उसकी संवेदना यथार्थ से जुड़ी हुई है. वह कम से कम शब्दों में अधिक  व्यक्त करने में समर्थ है. पारिवारिक बिंबों का उसने अधिक चित्रण किया है. उसके गीतों में गेयता के साथ विचारों का क्रम भी उभरता है. संवाद शैली उसके गीतों को अधिक आकर्षक तथा रोचक बनाती है. वह शब्द के महत्त्व को समझता है. वह उसके प्रयोग में सजग, सतर्क और सचेत है.”

संवेदनात्मक आलोक” के व्हाट्सएप समूह में मुकुट सक्सेना पर एकाग्र ६२ वां अंक प्रस्तुत करते हुए राम किशोर दाहिया लिखते हैं- “मुकुट सक्सेना जी की कलम में धार है स्वर का आवेग है, उनका अपना अलग मिज़ाज है. स्वयं की उनकी कहन शिल्प शैली उन्हें भीड़ से उन्मुक्त करती है. उनकी रचनाएँ आम जनजीवन की व्यथा-कथा के बीच से कुछ नई अनुभूतियाँ तलाश करती हैं..

नवगीत की अवधारणा में मुकुट सक्सेना का अपना मत है कि- “प्रकृति हर क्षण परिवर्तनशील रहते हुए भी यथावत है. समय गतिशील रहते हुए भी स्थिर है. जल प्रवाहमान रहते हुए भी स्थानस्त है; तो ऐसी वास्तविकताओं को हम कैसे परिभाषित करें ? मुझे नवगीत भी ऐसी ही अवस्था में स्थित लगता है. वह समय सापेक्ष रह, निरपेक्ष भाव से, बाहरी संसार की स्थितियों के प्रहारों से आंतरिक जगत में उत्पन्न संवेदी तरंगों की छटपटाहट की अभिव्यक्ति के लिए आवश्यकता पड़ने पर ‘शब्द’ को स्थापित अर्थ की कारा से मुक्ति दिलाते हुए, भाषा की वर्जनाओं को लाँघ, अनुभूति की तीव्रता के सत्यनिष्ठ सम्प्रेषण हेतु, लीक से हटने का साहस जुटा, भाषातीत अभिव्यक्ति को गीतात्मकता प्रदान कर, रचनाकार को प्रसव पीड़ा की असहयनीयता के भार से रचना के रूप में मुक्ति दिला देता है. वस्तुतः नवगीत वर्तमान समय की दग्धता की संवेदना को गीत हो जाने की हद तक उकेर कर सुकून प्रदान करता है.”

वहीं “राजस्थान में गीत परम्परा" का उल्लेख करते समय मुकुट सक्सेना कहते हैं कि "गीत स्वयं एक परम्परा है और यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो परम्परा भी एक गीत है. परम्परा समय के साथ विकसित होती है तो गीत समय के प्रवाह में अवस्थित रहता है. वरन वह तो परम्परा से पूर्व में भी रहा होगा.” 

उन्होंने आगे कहा कि- “यदि हम उसे गहराई से पहचान सकें तो प्रकृति के सौंदर्य और उसके खुरदुरेपन में भी गीत मौजूद है. सूर्य की प्रथम किरण जब अपना आँचल फैलाती है, तब वहाँ कोई शब्द नहीं होता, उसकी ध्वनि भी नहीं होती और भाषा भी नहीं। पर, वहाँ गीत की उपस्थिति का आभास होता है. गाय एक पालतू पशु है लेकिन जब अपने बछड़े को वह ममतामयी दृष्टि से देखती है उस वक्त उसकी आँखों से गीत झरता सा प्रतीत होता है. यह प्रतीति यदि गीत है तो मुझे गीत परिभाषातीत लगता है। वह एक ऐसा अव्यक्त (abstruse) तत्व है जो भाषा की लय छन्द संरचना में जब ढल जाता है, तब हम समझ पाते हैं कि इसे गीत कहते हैं. इस रूप-ग्रहण के फलस्वरूप ही तो वह परम्परा का पथगामी होकर कभी वीर गाथा काल, कभी भक्ति काल, कभी रीति काल, छायावाद और अब नवगीत काल की संज्ञाओं में प्रवाहित होकर सनातन या पुरातन सोच के दायरे से मुक्त होता हुआ सा प्रतीत होता है. जैसे- नदी में लहरें उठती हैं, आती हैं और चली जाती हैं. पर, जल प्रवाह यथावत अस्तित्व में रहा आता है तो यह प्रवाह ही तो गीत है और परम्परा भी"  

प्रकृति की इसी समीपता को मुकुट सक्सेना निम्न तरह से व्यक्त करते हैं- “सूर्य नित्य करता है / पृथ्वी पर हस्ताक्षर / और प्रकृति पढ़ती है / उसका हर-हर अक्षर / कालचक्र गतिमय है / क्षण-क्षण नव सर्जन हित / मैंने तो देखा है / तुमने भी देखा क्या ?

दिन और रात, सुख और दुःख, जय और पराजय, लाभ और हानि आदि कुछ ऐसे तत्व हैं जो काल के अनुक्रम और व्युत्क्रम में आते-जाते रहते हैं. समय का यही कालचक्र हमें कभी सुख देता है, तो कभी दुःख. गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भले ही स्थितप्रज्ञ होने का ज्ञान लोगों को दिया हो, किन्तु आम जन की नियति में तो बस यही मयस्सर  जान पड़ता है- “कभी-कभी दिन / छोटे पड़ते / और कभी हैं लम्बी रातें / मौन कभी कह / जाता सब कुछ / कभी न / कुछ कह पाती बातें / कभी समय को / हम ढोते हैं / कभी समय हमको ढोता है”, क्योंकि जीवन में स्थितप्रज्ञ होना सबके लिए संभव नहीं है.

किन्तु, जीवन का यही विरोधाभास मनुष्य का न केवल भाग्य है, अपितु उसके पुरुषार्थ की कुंजी भी है. क्योंकि रात दिन का, दुःख सुख का,  पराजय जय का और हानि लाभ की प्रेरणा प्रदान करते हैं. यहाँ तक कि जीवन के ढलान पर भी वह अपने अनुभव और साहस के बल पर कभी हताश नहीं होता- “थक गए सही / हमारे हाथ-पाँव / दे गया सही / अंग-अंग जवाब / फिर भी जब तक आता है हमें अनुभव बोना / तुम निराश नहीं होना / तुम हताश नहीं होना.”

फिर भी कभी-कभी मानव नैराश्य की मनोदशा से गुज़रता है. तब क्या केवल अपना-अपना दुखड़ा रो लेने या निराशा के गर्त में समां जाने मात्र से ही कोई मार्ग निकल सकता है ?  नहीं न. क्योंकि मनुष्य पुरुषार्थी है और मनुष्य का यही पुरुषार्थ उसे कभी हार मानने नहीं देता है. ऐसे में मुकुट सक्सेना के निम्न उदगार अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं- “पानी के रेले ने सड़कों  को तोड़ दिया / मेघों ने अपने को विघटन से जोड़ लिया / मानव के कीर्तिमान पुल टूटे नदियों के / प्रकृति की धरोहर थे पेड़ गिरे सदियों के / पानी विकराल-रूप आतंकी बन आया / मानव ने उस को भी आखिर ललकार दिया.”

मुकुट सक्सेना गीत को भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक स्थितियों से भी जोड़ते हैं. वे कहते हैं कि उक्त स्थितियों का भाषा के संस्कार पर गहरा प्रभाव पड़ता है. राजस्थान की मरुधरा से गहराई से जुड़े होने के कारण इसे निम्न बिम्बों से समझा जा सकता है- “इच्छा के मरुथल में / तृष्णा है अन्तहीन / खोज रहे तृप्ति मगर / पास नहीं दूरबीन / सरस्वती जल बहता / अब भी मरु के तल में / मैंने तो देखा है / तुमने भी देखा क्या?

इसके अलावा भूमंडलीकरण के दौर में राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक शक्तियों का जिस तरह से केन्द्रीयकरण और विकेन्द्रीयकरण की घटनाओं से सामना हुआ, उसका समकालीन गीत में प्रभाव नज़र आता है. केंद्रीयकरण जहाँ केंद्रीय बिंदुओं पर प्राधिकरण की व्यवस्थित और सुसंगत एकाग्रता है, वहीं विकेंद्रीकरण एक संगठन में प्राधिकरण का व्यवस्थित प्रतिनिधिमंडल है. महालेखाकार कार्यालय जयपुर में वेलफेयर असिस्टेंट रहते हुए अर्थशास्त्र के पहलुओं को बारीकी से समझते हुए मुकुट सक्सेना का यह गीत “विनिवेश” तथा उसकी पंक्तियाँ - “न जाने हमने अपनेपन का / क्यों विनिवेश किया / शुभ मुहूर्त के समय / लग्न दिखलायी थी हमने / समतामूलक स्वस्थ नीति / अपनायी थी हमने / फिर राहू-केतु ने कब क्यों / पांसे पलट दिए / यानि जोड़-गुणा-बांकी हित / सब अधिशेष किया.” इस क्षेत्र की शब्दावली को, समतामूलक समाज की अवधारणा को और उसकी प्राप्ति के अवरोधक अवयवों या तत्वों को प्रभावी ढंग से समकालीन सन्दर्भों से जोड़ता है. डॉ. वीरेन्द्र सिंह तो इस गीत से इतने प्रभावित दिखते हैं कि वे अपनी समालोचना कृति “समकालीन गीत : अन्तः अनुशासनीय विवेचन ” (पृष्ठ-५५) में मुकुट सक्सेना के इस गीत की महत्ता को प्रमुखता से रेखांकित करते हुए लिखते हैं- “इस गीत की संरचना इस प्रकार की है कि यथार्थ और कल्पना का संयोग इसे अद्भुत रूप प्रदान करता है. इस प्रकार का गीत-संरचना मुझे अन्यत्र नहीं मिली है, जहाँ तक मैंने गीत का अध्ययन किया है. यह गीत परोक्ष रूप से भूमंडलीकरण के प्रभाव को भी संकेतित करता है.” जहाँ तक मुझे लगता है या जितना मैं खंगाल पाया हूँ, मुकुट सक्सेना पर इतनी संज़ीदगी से डॉ. वीरेन्द्र सिंह से अधिक किसी और ने नहीं लिखा है. यहाँ तक कि उपरोक्त पुस्तक में भी उन्होंने मुकुट सक्सेना के गीत या गीत खण्डों को भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में सबसे अधिक बार (मुकुट सक्सेना- १४, नचिकेता- १२, दिनेश सिंह- ९ और वीरेन्द्र आस्तिक- ८ बार) (पृष्ठ-९७) उद्धृत किया है. हाँ, तारादत्त ‘निर्विरोध’ ने मुकुट सक्सेना के साहित्यिक अवदान पर अवश्य लिखा है किन्तु वह मेरे पढने में नहीं आया.

नवगीत का सरोकार वैज्ञानिक सत्यता की कसौटी पर खरा उतरना भी है. आज पर्यावरण की चिंता हरेक सजग एवं  चिन्तनशील मनस्वी की पहली प्राथमिकता है. किन्तु यह भी सच है कि अधिकांश लोग आज भी पर्यावरण के प्रति असंवेदनशील ही हैं. वैज्ञानिक सत्य है कि ओज़ोन परत सूरज की परा बैंगनी किरणों को धरती पर आने से रोकती है. किन्तु कार्बन उत्सर्जन की अधिकता के कारण यह परत दिन पर दिन कमज़ोर होती जा रही है या फिर इसमें छेद होते जा रहे हैं. जिनसे सूरज से निकली ये किरणें धरती के वातावरण में प्रवेश कर मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती  हैं. इस सबके बाद भी हम स्वार्थ के चश्में से देखते हुए सन्निकट खतरों से आँख मीचे हुए हैं. यहाँ सावन के अंधे की गहन व्यंजना ‘हरा लेंस पहने’ में अभिव्यक्त होती है. यह अजूबा नहीं तो और क्या है? “अब करील की कुँजें सपने / कंकरीट, के जंगल हैं / हुआ प्रकृति के हाथों मंगल / अपने हाथ अमंगल हैं / तार-तार ओज़ोन हो गई / और प्रदूषित दिशा-दिशा / फिर भी हरा-लेंस पहने हम / कितने बड़े अजूबे हैं ?

नवगीत की एक विशेषता है- समय की नब्ज़ को टटोलना और विषमता को प्रतिकार के स्वर तक रेखांकित करना. सामाजिक वैषम्य चाहे वह ऊँच-नीच का हो, नर-मादा का हो या सबल-निर्बल का, संवेदना के धरातल पर नवगीतकारों ने जन सरोकारों को ही प्रमुखता दी है. नर-मादा की विषमता तो प्रकृति जनित है. श्रृष्टि का आधार है, किन्तु नर के स्वयं की अहम् संतुष्टि के कारण जो कष्ट या यंत्रणा स्त्री को प्राप्त होती है. उसका वर्णन करना स्वयं कष्टकारी है. इतिहास ऐसी अनगिन यंत्रणाओं से भरा पड़ा है. मुकुट सक्सेना ने भी न जाने कितनी यंत्रणा का अनुभव किया होगा इस गीत को रचने में.- “गर्भवती यदि हुई विषमता कुंठा जन्मेगी / लाचारी की बाँझ कोख पर / तब क्या बीतेगी / सहनशक्ति के भोलेपन का / यह परिणाम हुआ / पथ के बने प्रदर्शक अनगिन / रूप लुटेरों  के.” और “बचपन से विधवा इच्छाओं के संवेदन को / बधिर हो गए श्रवण शक्ति के / सुना न क्रंदन को / इस से है अनभिज्ञ मीन / अंधी अभिलाषा की / सारे जल में फैल चुके हैं / जाल मछेरों  के.”

किन्तु कुतूहल तो देखिये- गीत का आरम्भ यहाँ से नहीं होता. उसका आरम्भ होता है संशय से. वह उल्कापात गिने या नई सुबह के स्वप्न देखे- ‘रात-रात भर, जाग-जाग कर / उल्कापात गिनें / या फिर देखें स्वप्न सुनहरे / नए सवेरों  के ?अपनी इस द्विविधा का निराकरण उन्होंने स्वयं कर दिया-“संशय के चौराहे पर ही / साँझ उतर आई / दिशाहीन पीढ़ी को कोई / राह न मिल पाई / इस से पहले और घनेरा / अंधकार छाए / अब भी रख दो दीप वक्ष पर / घिरे अंधेरों के.”

नवगीत में समय सापेक्षता एक बड़ा मुद्दा है. मानव मूल्यों में जिस तरह से दिन प्रति दिन ह्रास होता जा रहा है, उससे एक संवेदनशील कवि अपना मुँह नहीं मोड़ सकता है. इस सन्दर्भ में मुकुट सक्सेना का “यह कैसा त्रासद पड़ाव है” गीत अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता है.  आजकल औलादें समर्थ होकर भी अपने माता-पिता को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं. यही छतनारे वृक्षों के तल शीतल छाया का अभाव उनके ह्रदय को कचोटता है. देखें- “यह कैसा त्रासद पड़ाव है ? / छ्यासी कोस चले आने पर / चलते-चलते थक जाने पर / धूप-ताप से घबराने पर / जी करता विश्राम करें कुछ / पर छतनारे वृक्षों के तल / शीतल छाया का अभाव है.” जहाँ मनुष्य आपसी साहचर्य की प्रधानता में जीता था, अब वह एकाकी चल रहा है. चहुँ ओर स्वार्थ का बोल-बाला है. इन परिस्थितियों ऐसा कोई कन्धा ऐसा नहीं दिखता है जिसके सहारे सर रखकर अपना जी हल्का किया जा सके- चाहें सहयात्री अपना सुख / हमें व्यापते औरों के दुख / उलझन यह कैसी है सम्मुख / निज हित वाली भरी भीड़ में / किस कंधे पर सिर रख रो लें / दर्द बहुत कर रहा घाव है.” मनुष्य-मनुष्य के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं. ऐसे में औरों के दुःख से व्यथित कवि बोझिल है और मनुष्य की इस लक्ष्य विहीनता पर किम्कर्तव्यविमूढ़ है. बीहड़ गैल, अजानी मंज़िल / थके पाँव बढ़ पाते तिल-तिल / लक्ष्य अलक्षित है अति झिलमिल / नहीं हितैषी बने सहारे / नदिया गहरी, दूर किनारे / और भँवर में फँसी नाव है.”

मनुष्य की लक्ष्यविहीनता कहीं न कहीं अपनी आत्म मुग्धता के कारण अधिक है. समसामयिक जरूरतें, निर्णय और उनका ससमय अनुपालन व्यक्ति, राष्ट्र या विश्व को प्रगति की मूल धारा से जोड़े रखता है. अपने अतीत का गुण-गान अपना गाल बजाना भर ही है. समय के लिए उसका कोई योगदान नहीं होता. ऐसे में मनुष्य या तो केवल सपने देखता है या इतिहास के वैभव में खोकर रह जाता है- “जीवन भर हम रहे भटकते / लक्ष्यविहीन प्रयासों में / या तो सपने देखे कल के / या खोए इतिहासों में” मनुष्य का यह विरोधाभास सुबह से लेकर शाम तक चलता ही रहता है- “सतयुग जिए प्रात बेला में / त्रेता ठीक दोपहरी में / द्वापर साँझ ढले अनुभूते / कलयुग रात अँधेरी में / लख चौरासी भरीं चौकड़ी / अकथ विरोधाभासों में.” किन्तु समय के हर कालखंड में मनुष्य की अपनी महत्वाकांक्षाएँ उडान तो भरती ही हैं. ऐसे में यदि लक्ष्य निर्धारित न हों तो एक अनंत भटकाव के सिवा कुछ हासिल नहीं होता. क्योंकि प्रकृति निस्सीम है. उससे पार पाना एक मिथ्या दंभ है- “जितनी ऊँची भरी उड़ानें / उतना दूर गगन पाया / उस असीम के ओर-छोर में / बौराया मन भरमाया / कितना मिथ्या गर्व छिपा था / पँखों के अहसासों में” परन्तु कवि क्या करे?  नियति में घट रही क्रियायों-प्रतिक्रियायों पर उसका नियंत्रण नहीं है. लेकिन वह प्रयास तो करता ही है, परन्तु असहाय है. हताश है. यह सब लक्ष्यविहीनता के कारण है. किन्तु सत्य से साक्षात्कार होने से उसको अहसास होता है कि वह व्यर्थ ही अब तक कीड़े लगी कपास में धवलता खोजते रहे- “जितना सूत कातना चाहा / उतना ही धागा टूटा / चादर पर हम काढ़ न पाए / कोई सुंदर-सा बूटा / व्यर्थ धवलता रहे खोजते / कीड़े लगी कपासों में” मुकुट सक्सेना का यह गीत आत्म-मंथन का बेजोड़ नमूना है.

किन्तु, आधुनिकता की इस दौड़ में जीवन की यांत्रिकता में कहीं न कहीं वर्तमान की खुशियों खोती सी जा रही हैं. मुकुट सक्सेना का सामयिक शब्दों भरा यह गीत अपनी गहरी संवेदना को समाहित किये हुए है- “छा गया है एक आडम्बर / हमारी वेवसाइट  पर / डॉटकामों के घने जंगल / भयावह हो गए हैं / सॉफ्टवेयर के कुहासे में / मानवी संवेदना के चित्र / सारे खो गए हैं / भूल जाने दो  मुझे  ये / वायरस  के दंश अनगिन / मैं समूचे आज को / भरपूर जीना चाहता हूँ.” अपनी इसी जिजीविषा को वे एक और गीत “गीतों के गाँव” में व्यक्त करते हैं- “क्वांरी अभिव्यक्ति के / हृदय से / यौवन का भार / तड़प रहा / मर्यादित छन्दों के / जाने उस पार / डालो मत / जंजीरें ऐसे क्षण / इच्छा के पाँव / कीलो मत / कीलों से / ठौर-ठौर / गीतों के गाँव / पल भर उड़ने दो / सपनों को / पंखों पर / नये क्षितिज पाने” और “स्यानी / अभिलाष का / मनमोहक / मौन मुखर रूप / झुलासाए / नहीं / कहीं चितकबरी / आषाढ़ी धूप / कुंजों में साधों की / छांह घनी / बैठो उस ओर / गाओ फिर / मेघ-राग प्यासे हैं / आशा के मोर / अभी और / रहने दो वंशी को / अधरों पर / गीत मधुर गाने” ऐसे में कोई भी प्रतिबन्ध खुशियों पर बाधक न बने, तो गीत का मुखड़ा गंभीर प्रश्न खड़ा करता है- “तुमने क्यों / खींच दी लकीरें / दर्पण पर / बिना अर्थ जानें?

प्रगति की अंधी दौड़ में मनुष्य के श्रेय-साधन, उसका यथेष्ट, उसका सुख सब भेंट चढ़ रहा है. “हम कोरस में लीन / प्रगति के / गीत गा रहे हैं” समय के सच को बखूबी बाँच रहा है. सामाजिक और आर्थिक वैषम्य को जितना पाटने की कोशिश हो रही है, उतना ही वह बढती जाती है. बिडम्बना तो यह है कि जिनके कन्धों पर व्यवस्था का बोझ है, वही उसका उपभोग कर रहे हैं- “उपचारित / बीजों का कर्ज़ा / अभी नहीं उतरा / खड़ी फसल का / कच्चा दाना / कीटों ने कुतरा / पक्षी, ढोरों से / रक्षा हित / खड़ा किया / जिनको / वही बिजूके / पकी फसल का / खेत खा रहे हैं” बाकी जो परिवर्तन नज़र आता है वह अंधी दौड़ का ही नतीजा है, जहाँ नैतिक और अनैतिक का कोई चिंतन नहीं है. बस अन्धानुकरण और अन्धानुकरण है- “हाथों में / मोबाइल, पर / बनियानें फटी हुईं / सूट पहनकर मुदित / हो रहीं / नाकें कटी हुईं / नैतिक और / अनैतिक का / संशय क्या ढोना / वैभव की / गंगा नहा लेंगे / वहीं जा रहे हैं” किन्तु, ऐसा भी नहीं है कि परिवर्तन की बेचैनी नहीं है. वर्षों की दासता, बेड़ियाँ टूटने को छटपटा रही हैं. ऐसे में शोषक वर्ग भी नए-नए रंगों में या यूं कहें कि नए-नए चोले में अपना जाल फेंक रहे हैं. “एक ओर / अपनी माटी ने / ली है अंगड़ाई / और दूसरी / खुली तिजारत / की है चतुराई / कटे पंख की / सोन-चिरैया / फिर से क्या चहकी / रंग-बिरंगे / चिड़ीमार / ले जाल आ रहे हैं.”

किन्तु, मनुष्य अपनी महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत अंतहीन यात्राओं में भटकता रहता है और उनका ओर-छोर न मिलने कारण अंततः वापस लौटता ही है. “आया हूँ लौट / लम्बी पद यात्रा से / साँझ ढले तक.” प्रकारांतर से इसे दिन भर की आपा-धापी से भी जोड़ा जा सकता है. जिनमें कुछ सफलताएँ हैं, तो कुछ असफलताएं. कुछ सफलता जनित दंभ है, तो कुछ ग्लानि भी है. “ग्लानि गले तक” जीवन की इसी आपा-धापी को व्यक्त करता है- “कितने ही चौराहे / कितनी ही पगडंडी / मंज़िल तक आने को / दिनभर में पार करी / कहीं-कहीं धूप मिली / कहीं-कहीं छाँव घनी / बाज़ारों में भटका / बिका मगर कहीं नहीं / प्यासा था किन्तु किसी / पनघट पर नहीं रुका / कोई मर्यादा थी / इसलिये नहीं झुका / पहुँचा निज बस्ती जब / मन ने दम तोड़ दिया / कोई भी चौखट पर / बाट नहीं जोह रहा / दीप जले तक” और “अनगिन थे सहयात्री / बिछड़े कुछ ठहर गये / उनके ही दिये दर्द / किरचों से पैर गये  / मेरा सुख छीन लिया / मुझसे बटमारों ने / जीवन को निगल लिया / थोथे व्यवहारों ने / इने-गिने सपने थे / वे भी मुँह मोड़ गये / दुनिया की कटुता से / मुझको हैं जोड़ गये / मन ने फिर समझाया / और कोई राह चलूँ / पावनता आहत हो / फुफकारी, भर आई / ग्लानि गले तक”

ऐसे में अपने अनुभव से जीवन की विसंगतियों, दुरुहताओं के मध्य समय की नब्ज़ तो टटोलते ही हैं, साथ ही जीवन के कुछ मन्त्र भी समाज को दे रहे होते हैं- “तुझ पर जो भी पड़े / उसे तू धीरज धर कर सह / बहुत तेज़ है हवा / मगर तू उस के सँग मत बह” क्योंकि आज का मनुष्य अपने में ही मगन है. व्यस्त है. उसे किसी और की चिंता करने की न फुर्सत है और न ही नैतिक रूप से वह तैयार है. अतः मुकुट सक्सेना सर्वांगीण त्याग या समर्पण की बात नहीं करते अपितु वे कहते हैं कि जितना तू कर सकता है, कम से कम उतना योगदान तो कर.  किस को पड़ी ,तेरे दर्द को / कोई क्यों कूते / अपना कर दायित्व निर्वहन / अपने ही बूते / जितना तुझ से बने यज्ञ में / समिधा बन कर दह” जीवन की इस जद्दोजहद में अन्याय को हरहाल में सहन करना उनका ध्येय नहीं है. यहाँ वे अपनी बात या विरोध को संयत रूप से रखने की सीख देते हैं. यह ठीक वैसा ही है-एक सांप ने किसी संत के कहने पर यह निर्णय किया कि वह अब किसी को नही काटेगा. वह यह निर्णय अपने जीवन में आत्मसात कर काटना बंद कर देता है. धीरे-धीरे जब लोगों को पता चलता है कि यह सांप तो किसी को काटता ही नहीं है तो लोग उसे तंग करने लगते हैं. तब दुखी होकर वह सांप उन संत या महात्मा के पास जाकर अपनी व्यथा व्यक्त करता है. तब वे संत उससे कहते हैं कि मैंने तो तुझे केवल काटने के लिए ही मना किया था, फुफकारने के लिए नहीं.  यह आज की स्थिति का सही रूपायन करती है, यह तब जबकि विरोध करने का तरीका नितान्त अमर्यादित होता जा रहा है- “सहन-शक्ति का अर्थ नहीं है / सब कुछ सह लेना / कभी-कभी अच्छा होता है / मन की कह लेना / कर प्रतिरोध अवांछित का तू / पर संयत भी रह” किन्तु, अंतिम सत्य तो यही है कि जग लबार है, मिथ्या है. जन्म और मरण के कालचक्र का हिस्सा है. यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है, सब चलायमान है. आज जो महल है, कल को खंडहर में बदल जायेंगे. परन्तु मन नहीं मानता. वह तो कस्तूरी मृग की तरह वर्ताव करता है- “यह तो जग की रीति महल को / खण्डहर होना है / पर कस्तूरी सपने देखे / मन मृग-छोना  है / सत्य बहुत निर्मम होता है / जीवन से मत कह”. प्रकारांतर से मुकुट सक्सेना यहाँ “सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं” का ही उद्घोष करते हैं.

अपनी तमाम वर्जनाओं, प्रतिबध्यताओं, विद्रूपताओं और विसंगतियों से इतर जीवन महत्वपूर्ण है. जान है तो जहान है. इस लिए आज को भरपूर जी लेना ही प्रासंगिक है. मुकुट सक्सेना कहते हैं- “आओ सपनों से आंज लें नयन / साफ साफ देखें दो पल जीवन” यही युग सत्य होगा. क्योंकि यही एक नयी उम्मीद को भी जन्म देगा- “जीवन के बाद की बातें हैं अर्थहीन / तरुणाई के मन को रहने दो कुछ युगीन / मानव को रहने दो जीवन से ओत-प्रोत / चित्रयुक्त जीवन ही जीने का मधुर स्रोत / जीवन ही नापेगा/अम्बर की ऊँचाई /  जीवन ही पाटेगा / दोषों की हर खाई / इस युग की अभिलाषा को देखो / अंतरिक्ष-कॉलर में टांकती बटन

नवगीतकारों के गीत में तुकबंदी की मर्यादा को तोड़ना अक्सर चर्चा में आता रहा है.  मुकुट सक्सेना ने भी इस तरह के प्रयोग किये हैं. जिसमें लय भी है और भरपूर वैचारिकता भी. एक मुक्त छंद देखें-“भट्टी में झोंक दिया / लोहे सा / अग्नि से लड़ाई / अस्मिता की थी / धधक-धधक द्रव्य / हो गया आखिर / किंतु कोई आकृति पाए बिन / एक और बीत गया दिन / क्षोभ की नदी के किनारे”और “दौड़ लिया धमनियों / शिराओं में / एक सतत परिक्रिमा / रही सम्मुख / कोई गंतव्य नहीं था गति का / इसी लिए मात्र परिभर्मण में ही / एक और बीत गया दिन / बिना किसी लक्ष्य को पुकारे.”

एक और मुक्तछंद का गीत ‘काल-सन्धि पर हम’ देखें. नवगीत को एक और पायदान खड़ा करना और आने वाली पीढ़ी को उसकी विरासत सौपना एक बड़ी भूमिका है. यह उस सन्दर्भ में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जब कि नवगीतकारों में मठाधीश बनने की ललक प्रायः देखी जाती है. उम्र के इस पड़ाव पर जबकि “पक गए हैं अब हमारी कनपटी के बाल / आओ तुम सँभालो / ये नया संसार तुम को टेरता है” के साथ ही एक सक्षम परवर्ती पीढ़ी का निर्माण होते हुए देखते हैं तब वे अपनी भूमिका को नयी पीढ़ी को सौपते हुए उसका आह्वान भी करते हैं-“विगत का जो कुछ नया था / और था जीवंत, हम ने ही गृहण कर / यत्न से उस को सजाया था, सँवारा / और अपने स्वेद-श्रम को/आँख भर हर दिन निहारा/एक आभा दी समय को/और गति इतिहास को दी / रौशनी बाँटी अँधेरों में / छटा मधुमास को दी / आ गए जूते हमारे अब तुम्हारे पाँव / आओ तुम सँभालो / ये नया संसार तुम को टेरता है.” और “हम हमारे समय के सूरज रहे जब / तब अजिर में धूप से संस्कार बाँटे / दूर तक सन्तति सुसंस्कृति-पथ चले यूँ / रास्ते भर के कुटिल सब झाड़ काटे / शक्ति भर नव चेतना का / शँख फूंका था चहों-दिश / सभ्यता के भाल को उत्तुंग / रक्खा था अहर्निश / हो गए कँधे-भुजाएँ अब तुम्हारे पुष्ट / आओ तुम सँभालो / ये नया संसार तुम को टेरता है.” यहाँ “आ गए जूते हमारे अब तुम्हारे पाँव” और “हो गए कँधे-भुजाएँ अब तुम्हारे पुष्ट” विरासत का सहज हस्तांतरण ही परिलक्षित होता है. जिसमें विश्वास भी है और नैतिक धर्म भी.

परवर्ती पीढ़ी का यह विश्वास “दादा” गीत में एक नयी उम्मीद जगाता है- दादा मेरी उंगली पकड़ो / तुम को चलना सिखलाऊँगा उसे अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की चिंता है- हाथ तुम्हारे कॉंप रहे हैं / टोस्ट छिटक कर गिर जाता है / फिर धरती पर गिरे हुए को / टॉमी झट-पट आ खाता है / रुको! अभी तुम कुल्ला कर लो / गरम चाय मैं पिलवाउँगा आगे की पंक्तियाँ अधिक मार्मिक हैं. एक तिरस्कृत वृद्ध की विवशता का बोध उस बालक के स्नेहलेप से सना पड़ा है- मैँ ने देखा सारे दिन तुम / बच्चों जैसी बातें करते / दोपहरी में सो जाते, पर / हुए अकेले, आँसू झरते / रुको! अभी तुम आँसू पोंछो / फिर मेँ गीता पढ़वाऊँगा यहाँ यह कहना उल्लेखनीय है कि एकल परिवार में जहाँ माँ-बाप जीविका की जद्दोजहद में व्यस्त होते हैं वहां बच्चों को वे संस्कार नहीं मिल पाते, जो दादा-दादी के सान्निध्य में बच्चों को सहज हस्तांतरित होते हैं. ऐसे परिवारों में बुजुर्ग अमूमन उपेक्षित रहते हैं. वस्तुतः दादा-पोते का यह दृश्य न केवल आनंद का विषय है, अपितु समाज और बच्चे की क्रमिक विकास की कड़ी भी है.

मनुष्य की आयु जब अपनी परिपक्वता की परिधि में होती है, तब उसे क्षणभंगुरता का आभास होता है. उसके देखने का नजरिया बदल जाता है. तब अनुभव की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ मनुष्य सत्य के उस शिखर पर पहुँच जाता है, जहाँ से चीजें साफ़-साफ़ नज़र आने लगती हैं. तब स्वः मूल्याङ्कन की अंतर्दृष्टि जागृत होती है तथा जीवन की तमाम संचित भौतिक उपलब्धियां निस्सार समझ में आने लगती हैं. उसके द्वारा किये गए सारे उद्यम अर्थहीन से जान पड़ते हैं. अपने एक गीत ‘क्षमाबाण’ में मुकुट सक्सेना का यह रूप साफ़-साफ़ नज़र आता है- “काहे की हार-जीत / यहाँ-वहाँ सभी मीत / वर्तमान क्षण भर है / रहता है फिर अतीत / विकृति से मिले त्राण” या “कैसा वर्चस्व यहाँ / कैसा अधिपत्य / क्षणभंगुरता अपनी / है शाश्वत सत्य/कहता है हर पुराण”. इस अवस्था में आध्यात्मिक प्रवृत्ति का जागृत होना कोई अचरज की बात नहीं है- “प्रकृति के अनेक रूप / कहीं छांह कहीं धूप / तुम तो निमित्त मात्र / काहे के रंक भूप / एक नहीं सौ प्रमाण”. सवाल यह है कि इसमें नवगीत कहाँ है?  तो वह गीत के मुखड़े में पहले ही अभिव्यक्त हो जाता है-“हाथों में इंद्र-धनुष / तर्कश में क्षमा-बाण / ले कर ही चलो प्राण.”

समकालीन कवियों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कविता को मानवीय आत्मीयता और रागात्मक समृद्धि प्रदान करने के लिए इन्होंने भरपूर संघर्ष किया है. वे अपने सृजन में जीवन और जगत की वास्तविकता के साथ-साथ निश्छलता, भोलापन, खोई स्मृतियाँ, रचे गए सपने, जैविक और नैसर्गिक आसक्तियों को पुनः प्राप्त करने को व्यग्र नज़र आते हैं. वे प्रकृति के समीप विमुग्ध होने या विस्मित होने के लिए नहीं आते हैं. वे अपनी जिजीविषा, अपने संघर्ष और अपनी मूलगामी संवेदना को जानने के लिए जाते हैं और कहीं न कहीं अपनी आत्म संतुष्टि के लिए भी. अपने गीत “आत्म निरीक्षण” में मुकुट सक्सेना का इशारा शायद इसी ओर है- “थोथा बोझ अहम का / ढोते रहने से ज़्यादा / सुख मिलता है कहीं / प्रकृति-प्रति आत्म-समर्पण में” परन्तु, ढके हुए जीवन के अपराध एक अनजाने भय के साये की तरह मनुष्य के चेहरे में प्रतिबिंबित रहते हैं- “कच्चा-चिट्ठा गोपनीय होकर भी मौन नहीं / शंकित मन की शंकाओं से अवगत कौन नहीं / इस से और अधिक क्या / विज्ञापित होने को था / अपना चेहरा ही प्रतिबिंबित / है हर दर्पण में” अपनी आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया के उपरांत एक अलक्षित मृग मरीचिका में जी रहे लोंगों के लिए सत्य उभर कर सामने आ ही जाता है- “अंधा दर्प भटकता यश के गाँव और शहरों / भटकन ही को लक्ष्य समझ कर मुदित हुआ पहरों / अल्प-ज्ञान के चक्रवात में / घिरा न समझेगा / कितना सत्य उभर आता है / आत्म-निरीक्षण में” परन्तु, अपनी आत्मा की आवाज़ को दरकिनार कर अपने पापों के प्रति ग्लानि न महसूस करना समाज के लिए किचित उचित नहीं है. ऐसे व्यक्ति की छाया और शोषण में कोई भेद या अंतर नहीं है- “आत्म-ग्लानि की हत्या कर वैभव पाया तो क्या / यही विकल्प भला कब सम्मानित होने को था / बन कर वट का वृक्ष / फैलने को क्या संज्ञा दें / भेद नहीं कुछ उस की छाया में औ शोषण में

प्रकृति की इसी समीपता को वे आगे भी गाते हैं- “हम तो जीव-जंतु जंगल के / जाने क्या आचार-संहिता / पर यह संहिता भी क्या संहिता / जहां कपट ही जीवन शैली / कृत्य अकेला ही कब ऐसा / हर कोई है नीयत मैली / इस से भला हमारा जीवन / चाहे जितना हिंस्र रहा हो / किन्तु क्षुधा के बिना कभी भी / नहीं हुआ है रक्त बहा हो / इसी लिए संतुष्ट रहे हम / अपने जीवन की पशुता से / क्यों कि प्रकृति की मर्यादा का / हम को हर दम भास रहा है” जहाँ हिंसा भी भूख जनित है. यदि भूख नहीं है तो हिंसा भी नहीं. जहाँ स्वाभिमान, प्रतिस्पर्धा, अपमान या श्रेष्ठता जनित कोई हिंसा भी नहीं है. “हम तो कुसुम विजन के ठहरे / गुलशन की संस्कृति से बेसुध / पर यह संस्कृति भी क्या संस्कृति / जहाँ कैक्टस चुभन बिखेरें / और जहाँ के पंछी केवल / अपने नीड़ों का हित टेरें / इस से भला हमारा जीवन / भले किसी के काम न आते / तब भी धरती,पर्वत, जंगल / गंध हमारी से गंधियाते / इसी लिए संतुष्ट रहे हम / अपने प्राणों की गरिमा से / चाहे कितना मूक हमारा / जीवन का इतिहास रहा है

समकालीन कवियों की पीढ़ी एक सचेतन पीढ़ी है. समझदार है. सामाजिक और राजनैतिक संकीर्णता को पहचानने की उनकी दृष्टि साफ़ है. भले ही वह जीविका के लिए मनुष्य, समाज, संस्कृति और राजनीति से जुड़ने के प्रपंच में संलिप्त है. वह अपनी मनोव्यथा को व्यक्त भी करता है और स्वीकारता भी है. जहाँ “मुझे मिले विश्रांति किसी ने माना कब / कभी किसी ने प्यास मेरी को जाना कब / मैं जब-जब भी जितना जिस के पास गया / हर परिचित चेहरा बदला सा लगा नया / मुझ को बन्द मिले सब खिड़की दरवाज़े / मेरे लिए कहीं पर कोई घर कब था ?” में अपनी मनोदशा का सजीव चित्रण है, वहीं “मैं था कहाँ कबीर / कि साखी कह-कह अलख जगाता ?” एक इमानदार स्वीकारोक्ति है. “बचपन में इक सहपाठी की रबड़ चुराई थी / घर वालों से छिप-छिप कर ही मिट्टी खाई थी / माँ रहती थी मुझे डपटती हर शैतानी पर / मैं था कहाँ कबीर / कि मंत्र जो ठोकर से पा जाता ?” ऐसे में जीवन में जब सारे विकल्प शून्य हों, कृतिमता हावी हो और अपेक्षाएँ बहुत हों, तब वह अपनी अक्षमता को असहाय होकर देखता है- “मैं हूँ खाली हाथ नहीं अब चरखा-तकली है / जाने कितने चेहरों वाला जीवन नक़ली है / मुझ से रही अपेक्षा, अब है मांग रही उत्तर / मैं था कहाँ  कबीर / कि मुझ से सूत कातना आता ?” यहाँ मुकुट सक्सेना का विसंगति के प्रति बेचैनी को साफ़-साफ़ देखा और महसूसा जा सकता है. डॉ. विमल के शब्दों में- “संकट बोध, मूल्यगत गत्यामकता और युग की बदलती हुई मांगों के बीच रचयिता अपनी संवेदना के भीतर बड़ी संवेदना खोजता है.” मुकुट सक्सेना कुछ ऐसा ही करते प्रतीत होते हैं.

परन्तु, कुछ तो है जो मुकुट सक्सेना के गीतों / नवगीतों में (कुछ अपवादों को छोड़कर जैसे- “मेरे गाँव कहाँ अब छप्पर / कंक्रीट के घर हैं / अल्गोजों की धुनें कहाँ है / बंदूकों के डर हैं.) कम ही दिखता है, वह है- ग्राम्य जीवन और उसमें विद्यमान अन्धविश्वास, कुरीतियाँ, सामाजिक विसंगतियाँ, जीवन यापन के सीमित साधन, असुविधाएँ, कठिनताएँ तथा स्थानीय राजनीति के खेल, जिन्हें बहुधः परंपरा के नाम पर गाँवों में पावन करार दिया जाता रहा. यह दीगर बात है कि शहरी संस्कृति ग्राम्य संस्कृति को संक्रांत कर रही है. और शहरों का नवअभिजात्य वर्ग गाँवों में शांति खोज रहा है. परन्तु इससे मुकुट सक्सेना की संवेदनाएँ कम नहीं हो जाती हैं.

रही बात छंद की, तो गीत हो या नवगीत, लय और रिद्धम की मांग तो रहती ही है. इस पर ज्यादा लिखना विवाद का कारण हो सकता है. सबकी अपनी-अपनी मान्यता है. परन्तु स्वरों का उच्चारण यदि मात्राओं के अनुरूप हो सके, तो बेहतर है. यूँ उच्चारण में बहुधः हम दीर्घ को लघु और लघु को दीर्घ कर गा तो लेते हैं, परन्तु तकनीकी रूप से है तो गलत ही. नीचे दिए गए पदबंध में यदि छंद के अनुसार उच्चारण किया जाय तो “नदी का” में यदि “नदी” को लघु दीर्घ मान कर पढ़ा जाय तो “का” को लघु में पढ़ना पड़ता है. यदि “का’ को दीर्घ में पढ़ा जाता है तो अटकाव का आभास होता है- “इस नदी का पार / उतरना ही / है भवसागर का / तरना भी / मिल जाय खुला यदि द्वार बंधु / जीवन के दिन हैं चार बंधु.” इसी तरह  किस को पड़ी ,तेरे दर्द को / कोई क्यों कूते / अपना कर दायित्व निर्वहन / अपने ही बूते / जितना तुझ से बने यज्ञ में / समिधा बन कर दह” में ‘किस को पड़ी, तेरे दर्द को’ में अटकाव महसूस होता है. इसका कारण संभवतः यह है कि मुकुट सक्सेना जी का प्रारम्भिक लेखन उर्दू ग़ज़लों से हुआ था, जहाँ मात्रा पतन मान्य है तो उनका वही स्वभाव / प्रभाव कुछ गीतों में भी परिलक्षित होता है. हालाँकि यह मेरे लिए भी सहज परिमार्जन का विषय है.

परन्तु, इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हम नवगीत में मात्राएँ गिनने बैठ जाएँ. क्योंकि नवगीत में कथ्य के स्तर पर थोड़ा लचीलापन तो अनुमन्य होता ही है. जिसे कई नवगीतकारों ने पूरे अधिकार और ठसक के साथ प्रयोग किया है और कर रहे हैं. यहाँ मैंने ‘थोड़ा’ कहा है, ‘थोड़ा-बहुत’ नहीं. यह ‘थोड़ा’ भी अनायास है, सायास नहीं. वस्तुतः बात यह भी नहीं है. यह गीत का कथ्य, नवगीतकार की मनोदशा और उसकी सम्प्रेषण की शब्दशक्ति तय करती है.

उपरोक्त सन्दर्भों में यदि मुकुट सक्सेना जी की रचनाधर्मिता का आंकलन किया जाये तो मुझे वे एक चिन्तक या दार्शनिक की भूमिका में अधिक प्रतीत होते हैं. समय से मुठभेड़ की उनकी प्रवृति सांकेतिक है. समसामयिक विषमता के प्रति प्रतिकार का उनका  स्वर विनम्र है. डॉ. विमल के शब्दों में अवमूल्यन के हर दौर में पतनोंमुख समाज में एक दृष्टि संपन्न रचनाकार विकास के बीज संचित सुरक्षित रखता है .“ वे सारे गुण अपनी सम्पूर्ण अभिलाषा के साथ मुकुट सक्सेना में मौजूद हैं. एक और गुण जो उनमें प्रचुरता से विद्यमान है, वह है– सहृदयता. उनका समस्त काव्य “योSर्थः सहृदयश्लाघ्य: काव्यातिमेति व्यवस्थितः” की अवधारणा में निहित है. अभिनवगुप्त के शब्दों में “सर्वस्य न सर्वत्र ह्रदयसंवादः” मुकुट सक्सेना के गीत मुख्यतः ह्रदय के संवाद ही अधिक प्रतीत होते हैं. जिनका आधार मानवमात्र की उन्नति है. मानव उन्नयन के प्रति उनका सृजन प्रेरक और अनुशीलन योग्य है. मैं उनकी सदिच्छा “अभी आस्था तो / रक्षित है / और अस्मिता / अभिमंत्रित है / तू क्यारी में बीज कुमति के / बो मत जाना रे” को गाते हुए  उनके दीर्घायु होने की कामना करता हूँ.

संपर्क:- चंद्रप्रभा विला’

४१७,    रॉयल रेजीडेंसी- प्रथम फेस
सारंगपुरा, बड के बालाजी
अजमेर रोड, जयपुर- ३०२०२६
दूरभाष:- ०१४१-२९५८६४२, चलभाष:- ८२०९९०९३०९

संक्षिप्त परिचय एवं उपलब्धियाँ:-

मुकुट सक्सेना जी यूँ तो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं, फिर भी उनका संक्षिप्त परिचय निम्नवत है;

नाम                  : मुकुट सक्सेना

जन्म                 : ०२ अक्टूबर सन् १९३८ ई.

पिता                 : स्व. देवी दयाल सक्सेना

माता                 : स्व. गंगा सक्सेना

लेखन विधाएं     : गीत, ग़ज़ल, कविता, कहानी, लघुकथा, निबन्ध, समीक्षाएं, भूमिका लेखन आदि

प्रकाशन            : १- जुड़वा-भौहें (कहानी संग्रह) - शब्द यात्रा पर हैं (गीत ग़ज़ल संग्रह) - कपोत, कुर्सियां   और चन्दनवन  (कविता संग्रह) - प्रति प्रहार (लघुकथा संग्रह, राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत)

अन्य प्रकाशन   : प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में ५० वर्षों से रचनाओं के प्रकाशन के साथ-साथ अनेक चर्चित गीतिकाव्य संग्रहों में रचनाएँ संगृहीत व प्रकाशित तथा कुछ रचनाओं का अन्य भाषाओँ में अनुवाद.

प्रसारण             : आकाशवाणी व दूरदर्शन से भी रचनाओं का प्रसारण

शोधकार्य          : राजस्थान विश्वविद्यालय के दो लघु शोध ग्रंथों में अध्याय एवं समकालीन हिन्दी कविता कोष में संपादकीय अभिमत

अन्य                 : विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्व पर कार्य. “काव्य गुंजन” सहित अनेक काव्य संग्रहों का संपादन कार्य. विभिन्न सामजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत, सम्मानित एवं अभिनन्दित

विशेष               १. वीरेन्द्र आस्तिक जी के संपादन में “धार पर हम” का प्रकाशन १९९८ में हुआ था. इसमें मुकुट सक्सेना जी के पांच नवगीत शामिल हैं. इस पुस्तक का बडौदा विश्व विद्यालय के वर्ष १९९९-२००५ के लिए एम्. ए. पाठ्यक्रम में निर्धारण.

२. डॉ. ओम प्रकाश सिंह द्वारा सम्पादित “नयी सदी के नवगीत” में प्रकाशित सभी १० नवगीत महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में नवगीत के स्वतंत्र विधा के रूप  में स्थान देने हेतु अन्य नवगीतकारों के साथ चयन के प्रयास. इसका उल्लेख नचिकेता जी ने अपनी विवेचना “ ’नयी सदी के नवगीत’ का दृष्टि संकट” के शुरुआत में किया है.

संपर्क सूत्र         : 0517, जवाहर नगर, जयपुर-302004 (राजस्थान)

दूरभाष             : 0141-2652195 चलभाष: 9828089417

ई. मेल.              : mukutsaxena17@gmail.com,

 

 

 

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