मैं गरल का घूंट पीकर रह गया हूँ...
मैं गरल का घूँट पीकर रह गया हूँ,
देख कर
उस न्याय को सहमें हुए
अन्याय के जयघोष पर
अफ़सोस ही कर रह गया हूँ ,,
रह गया हूँ और कितनी बार यूँ ही
पूँछ कर तुम क्या करोगे ?
हो चुकी पंडल प्रवर इंसानियत
बीमार सी, अब आदमी को क्या कहोगे ?
देख कर इस मनुज की शैतानियत
मैं क्षोभ ही कर रह गया हूँ...
रह गया हूँ – देखते क्रंदन
प्रक्लिन्न नयनों से बहते नीर जो,
प्रस्वेद जो अपना बहाते खेत में
पर नग्न भूखें, हैं लुटाते क्षीर जो,
चाहिए जिनको हमारा योग
उनको दया ही कर रह गया हूँ...
जो सोचता था विश्व के कल्याण में,
उस अयन से वह मुड़ा निज स्वार्थ में,
उद्यत खड़ा वह श्रष्टि के विध्वंस को
यह सोंच अब कैसे मिले परमार्थ में ?
आरजू लेकर तुम्हारे सामने
मैं अनेकों बार आकर कह गया हूँ...
रह गया हूँ सोंचते –ललकार दूं-
अन्याय के अधिपति! ठहर जाता कहाँ ?
पर अभय यह हर प्रधन में
उत्स पर इसके प्रलय आता कहाँ ?
सोंचता हूँ- मोड़ दूंगा धार इसकी
पर स्वयं ही मैं ढरक कर बह गया हूँ...
रह गया हूँ सोंचते - कि दूँ जगा
दूँ बता कि रो रहा है भाई अपना,
उस गली के मोड़ पर अंजलि पसारे
देखता जीवन का अपना श्वेत सपना,
पर भाग्य में है आज उन तक न पहुँचना
रद्दी के बर्तन में पड़ा ही रह गया हूँ...
सोंचता हूँ – उस ज़माने की कथा ,
बेचैन हो उठती स्वयं मेरी व्यथा,
उस मधुरिमा की कूक तू क्यों गा रही
अलि ! अब हुआ संगीत तेरा यह वृथा,
त्वरित जीवन काल में सुर कौन बाँचे
मैं उपेक्षित स्वयं होकर रह गया हूँ...
---------अशोक शर्मा “कटेठिया”